
हिमाचल प्रदेश विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण परिषद (HIMCOSTE) के अध्ययन के अनुसार अकेले सतलुज बेसिन में 2,292 ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं. इनमें से 487 झीलें किन्नौर के खाब से नीचे भारतीय क्षेत्र में, जबकि 1,335 झीलें तिब्बत क्षेत्र में स्थित हैं. नेपाल में हाल ही में हुई दुखद त्रासदी को लेकर हिमाचल प्रदेश के राजस्व, बागवानी एवं जनजातीय विकास मंत्री जगत सिंह नेगी ने गंभीर चिंता व्यक्त की है.
उन्होंने कहा कि नेपाल की घटना केवल एक देश तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए चेतावनी है. नेगी ने कहा कि भविष्य में ऐसी आपदाओं से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम को मजबूत करना और पड़ोसी देशों के बीच सूचनाओं का समय पर आदान-प्रदान बेहद आवश्यक है.
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हिमाचल में नेपाल जैसी त्रासदी का कितना खतरा?
कैबिनेट मंत्री जगत सिंह नेगी ने कहा कि नेपाल में हुई त्रासदी के दौरान समय पर सूचना साझा नहीं हो सकी, जिसके कारण नुकसान का दायरा बढ़ गया. उन्होंने बताया कि ग्लेशियर टूटने के बाद कृत्रिम झील का निर्माण हुआ और यदि समय रहते निचले क्षेत्रों को चेतावनी जारी कर दी जाती तो जान-माल के नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता था.
नेगी ने कहा कि हिमाचल प्रदेश और पूरे हिमालयी क्षेत्र में भी इस तरह के खतरे मौजूद हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में सतलुज नदी में आई बाढ़ का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय नदी किनारे आबादी कम थी, इसलिए नुकसान अपेक्षाकृत सीमित रहा.
इसके अलावा वर्ष 2005 में तिब्बत के पारछू क्षेत्र में नदी अवरुद्ध होने के बाद आई बाढ़ का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उस समय सैटेलाइट निगरानी और सूचना तंत्र उतना विकसित नहीं था, जिसके चलते खतरे की जानकारी समय पर नहीं मिल सकी.
हिमाचल में बड़ी संख्या ग्लेशियल झीलें मौजूद
कैबिनेट मंत्री ने बताया कि हिमाचल प्रदेश में बड़ी संख्या में ग्लेशियर मौजूद हैं और ग्लेशियरों से बनने वाली झीलों तथा संभावित ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) के खतरे को लेकर सरकार लगातार अध्ययन कर रही है. ग्लोफ योजना के तहत प्रदेश के चार प्रमुख ग्लेशियरों की स्टडी की जा रही है. सिस्सू और सांगला क्षेत्र में भी विस्तृत अध्ययन किया गया है तथा संभावित जोखिम को कम करने के लिए डीपीआर तैयार करने की प्रक्रिया जारी है.
जगत सिंह नेगी ने कहा कि आने वाले समय में अर्ली वार्निंग सिस्टम को और अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता है. किसी भी नदी के अवरुद्ध होने या कृत्रिम झील बनने की स्थिति में उसकी सूचना तुरंत निचले क्षेत्रों तक पहुंचनी चाहिए. उन्होंने बताया कि राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA) इस विषय पर जल्द ही उच्चस्तरीय बैठक आयोजित करेगा.
संभावित खतरों पर निगरानी की योजना पर जोर
इसके साथ ही सैटेलाइट आधारित निगरानी को 24 घंटे सक्रिय रखने और हिमालयी क्षेत्र से जुड़े देशों के बीच बेहतर समन्वय पर भी जोर दिया जाएगा. नेगी ने कहा कि विशेष रूप से चीन सहित पड़ोसी देशों के साथ नदियों और ग्लेशियरों से जुड़े संभावित खतरों की जानकारी समय पर साझा करने की व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए, ताकि हिमाचल प्रदेश जैसे हिमालयी राज्यों में प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान को न्यूनतम किया जा सके.
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