
छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले का सेमरिया गांव विकास की तस्वीर से बिल्कुल अलग एक ऐसी हकीकत बयान करता है, जिसे देखकर किसी का भी मन विचलित हो जाए. यहां जिंदगी आसान नहीं है, लेकिन मौत के बाद का सफर भी कम कठिन नहीं. हाल ही में गांव के एक बुजुर्ग के निधन के बाद ग्रामीणों को उनका शव कंधों पर उठाकर कीचड़ भरे रास्तों और उफनते नाले के बीच से मुक्तिधाम तक ले जाना पड़ा. बरसात के मौसम में यह रास्ता किसी परीक्षा से कम नहीं था. यह दृश्य सिर्फ एक अंतिम यात्रा का नहीं, बल्कि उन बुनियादी सुविधाओं की कमी का प्रतीक है, जिनका इंतजार गांव के लोग सालों से कर रहे हैं.
दुर्ग जिले की बागडूमर ग्राम पंचायत के आश्रित गांव सेमरिया की आबादी करीब 500 है. ग्रामीणों का कहना है कि गांव आज भी सड़क, बिजली, पानी और शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है. बरसात के दिनों में हालात और ज्यादा खराब हो जाते हैं. गांव तक पहुंचने वाले रास्ते कीचड़ और गड्ढों से भर जाते हैं, जिससे लोगों का आवागमन मुश्किल हो जाता है.
3 किलोमीटर की सड़क में 1563 से ज्यादा गड्ढे
सेमरिया गांव को बागडूमर पंचायत और अहिवारा क्षेत्र से जोड़ने वाला सड़क मार्ग ग्रामीणों के लिए सबसे बड़ी परेशानी बन गया है. करीब 3 से 4 किलोमीटर लंबे इस रास्ते पर इतने गड्ढे हैं कि वाहन चलाना भी जोखिम भरा हो गया है. NDTV की पड़ताल में इस सड़क पर 1563 से अधिक गड्ढे गिने. इसी रास्ते से छात्राएं कोचिंग जाती हैं, मजदूर काम पर निकलते हैं और ग्रामीण राशन व अन्य जरूरी कामों के लिए पंचायत पहुंचते हैं.
अंतिम यात्रा में भी उठाना पड़ा जोखिम
गांव के एक बुजुर्ग की मौत के बाद सामने आई तस्वीरों ने ग्रामीणों की परेशानी को उजागर कर दिया. शव को मुक्तिधाम तक ले जाने के लिए लोगों को बरसाती नाला पार करना पड़ा. कई जगह रास्ता पूरी तरह दलदल में तब्दील था. ग्रामीणों ने बताया कि अंतिम संस्कार जैसे संवेदनशील समय में भी उन्हें अपनी सुरक्षा की चिंता करनी पड़ती है, क्योंकि गांव और मुक्तिधाम के बीच कोई सुरक्षित मार्ग उपलब्ध नहीं है.

अर्थी को कंधे पर रखकर नदी पार करते ग्रामीण.
मुक्तिधाम तक पहुंचना बना चुनौती
गांव से मुक्तिधाम तक पहुंचने वाला रास्ता बरसात में लगभग उपयोगहीन हो जाता है. चारों तरफ पानी और कीचड़ के बीच लोगों को पैदल चलना पड़ता है. मुक्तिधाम की स्थिति भी बेहतर नहीं है. वहां पानी भरा हुआ है और कई हिस्से जलमग्न दिखाई देते हैं. ग्रामीणों का आरोप है कि मुक्तिधाम के विकास और रास्ते की मरम्मत के लिए कई बार योजनाएं बनीं, लेकिन धरातल पर कोई ठोस काम नहीं हुआ.
गांव में पेयजल व्यवस्था भी बदहाल
सेमरिया में पेयजल की समस्या भी लोगों के लिए बड़ी परेशानी बनी हुई है. ग्रामीणों के मुताबिक कुछ वर्ष पहले पानी की टंकी का निर्माण तो किया, लेकिन पाइपलाइन जगह-जगह से लीकेज हो चुकी है. नलों से कई बार गंदा पानी निकलता है. गांव के कई हैंडपंप खराब पड़े हैं, जिससे लोगों को साफ पानी के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है.
बिजली की समस्या से बढ़ती कठिनाई
ग्रामीणों का कहना है कि गांव में बिजली व्यवस्था भी संतोषजनक नहीं है. कई स्थानों पर खंभे और बल्ब तो लगे हैं, लेकिन रोशनी नहीं होती. बिजली आपूर्ति बाधित होने पर हालात और खराब हो जाते हैं. ट्रांसफार्मर खराब होने पर कई दिनों तक गांव अंधेरे में डूबा रहता है, जिससे पानी की व्यवस्था भी प्रभावित होती है.

कीचड़ से भरे रास्तों पर चलने के लिए मजबूर ग्रामीण.
जर्जर स्कूल और परेशान बच्चे
गांव में शिक्षा का ढांचा भी कमजोर नजर आता है. स्कूल भवन जर्जर हो चुके हैं और बरसात के दौरान बच्चों को स्कूल आने-जाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. ग्रामीणों का कहना है कि नाला पार करके स्कूल जाने वाले बच्चों की सुरक्षा भी हमेशा चिंता का विषय बनी रहती है.
गांव की महिलाओं ने बताया कि वर्षों से समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं. उनका कहना है कि चुनाव के समय जनप्रतिनिधि गांव पहुंचते हैं और विकास के बड़े-बड़े वादे करते हैं, लेकिन बाद में गांव की सुध लेने कोई नहीं आता. ग्रामीणों का आरोप है कि सड़क, नाला और बुनियादी सुविधाओं की समस्याओं को कई बार उठाया गया, लेकिन समाधान नहीं हुआ.




