
नई दिल्ली:
तृणमूल कांग्रेस के बागी 20 लोकसभा सांसदों ने रविवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर एक गुमनाम राजनीतिक दल नेशनलिस्ट सिटिजन पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय का पत्र सौंपा. उन्होंने यह भी कहा कि वे लोकसभा में इंडिया ब्लॉक से अलग बैठना चाहते हैं. इस पत्र में यह भी कहा गया है कि वे एनडीए को समर्थन देंगे. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में वे असली तृणमूल कांग्रेस होने का दावा भी पेश कर सकते हैं. वरिष्ठ नेता सुदीप बंदोपाध्याय ने कहा कि 20 सांसद दो तिहाई होते हैं. हम पहले दिन ही पार्टी का नाम नहीं मांग सकते. जुलाई में मॉनसून सत्र के समय हम असली तृणमूल कांग्रेस का दावा करेंगे, क्योंकि हम दो तिहाई सांसद हैं. इस पर अदालत फैसला करेगी.
टीएमसी के टूट के पीछे बीजेपी की हाथ!
सूत्रों के अनुसार इस फैसले के पीछे राजनीतिक और कानूनी वजह हैं. दरअसल, मोदी सरकार मॉनसून सत्र में ऐसे कई महत्वपूर्ण संविधान संशोधन विधेयक लाने की योजना बना रही है, जिसके लिए उसे दो तिहाई बहुमत जुटाना जरूरी है. इसी रणनीति के तहत टीएमसी के लोकसभा और राज्य सभा सांसदों को तोड़ा गया है. हालांकि इस पूरी कवायद के पीछे बीजेपी का हाथ अब खुलकर दिखने लगा है. जिस तरह से केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के घर बागी सांसदों की बैठकें हुईं. वहां पर बीजेपी सांसदों निशिकांत दुबे और सी एम रमेश की मौजूदगी और बागी नेता सुदीप बंदोपाध्याय की गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात ने इस धारणा को पुष्ट कर दिया कि टीएमसी सांसदों की बगावत के पीछे बीजेपी ही है.

पश्चिम बंगाल बीजेपी टीएमसी सांसदों के नजदीक आने से असहज
ऐसा सोची-समझी रणनीति के तहत किया गया. दरअसल, जिस तरह से बीजेपी और टीएमसी के सांसद नजदीक आ रहे हैं, इसे लेकर राज्य बीजेपी के नेताओं में बेचैनी है. उन्हें लगता है कि जिन टीएमसी नेताओं के खिलाफ एक महीने पहले तक पार्टी मैदान में थी, उन्हें साथ लाना एक अच्छा राजनीतिक संदेश नहीं दे रहा. यही कारण है कि राज्य में टीएमसी विधायकों की बगावत से बीजेपी ने खुद को दूर रखा हुआ है. केंद्र में दो तिहाई बहुमत की दरकार है, लिहाजा टीएमसी सांसदों को साथ लेना समझ में आता है, लेकिन जिस टीएमसी के खिलाफ इतनी लंबी लड़ाई लड़ी, बंगाल में उसके साथ जाना नुकसान भी कर सकता है. इसी तरह बागी मुस्लिम सांसदों को भी लगता है कि बीजेपी के साथ खुलकर जाने का फैसला उन्हें अपने संसदीय क्षेत्रों में भारी पड़ सकता है.

असली टीएमसी साबित करने के लिए लड़नी होगी लंबी कानूनी लड़ाई
दूसरी ओर, बागी सांसदों को अपनी सदस्यता जाने का भी डर सता रहा है. वे जानते हैं कि असली टीएमसी साबित करने के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी होगी. यह लड़ाई कब अपने मुकाम पर पहुंचेगी, यह भी अंदाजा लगा पाना मुश्किल है. रविवार को टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी की ओर से स्पीकर को जो पत्र दिया गया, उसमें सुभाष देसाई बनाम महाराष्ट्र के राज्यपाल मामले के ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया गया है. इसके अनुसार विधायी दल के ऊपर राजनीतिक दल सर्वोच्च है और सदन में व्हिप या नेता की नियुक्ति का अधिकार केवल मूल राजनीतिक दल के पास ही है. वैध विलय के लिए मूल राजनीतिक दल का किसी दल में विलय होना और विधायी दल के कम से कम दो तिहाई सदस्यों का दलबदल करना अनिवार्य है. इस पत्र में कहा गया है कि अगर केवल सांसद अलग होते हैं और राजनीतिक दल का विलय नहीं होता है तो यह प्रक्रिया अवैध होगी. इसी आधार पर उन्हें अयोग्य घोषित किया जा सकता है.

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अब नजरें स्पीकर ओम बिरला पर टिक गई हैं. उन्हें टीएमसी के दोनों खेमों की ओर से पत्र मिल चुके हैं. वे अंतिम निर्णय करेंगे कि बागी सांसदों के एनसीपीआई में विलय को मंजूरी दी जाए या नहीं और उन्हें लोकसभा में अलग बैठने की अनुमति दी जाए या नहीं. इस बात की पूरी संभावना है कि स्पीकर का जो भी फैसला हो उसे टीएमसी कानूनी चुनौती दे सकती है.
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