
मध्य प्रदेश के दतिया स्थित शासकीय मेडिकल कॉलेज में हुई एक बड़ी भर्ती प्रक्रिया में भारी अनियमितता सामने आई है. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने इस मामले में अहम और कड़ा फैसला सुनाते हुए नर्सिंग अधीक्षक (Nursing Superintendent) के पद पर की गई नियुक्ति को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया है. न्यायालय ने चयन प्रक्रिया के दौरान विज्ञापन की निर्धारित शर्तों से बाहर जाकर दिए गए अतिरिक्त अंकों को पूरी तरह से नियम विरुद्ध और मनमाना माना है. यह विवादित भर्ती मेडिकल कॉलेज के तत्कालीन डीन डॉ. राजेश गौर के कार्यकाल में संपन्न हुई थी, जिस पर अब अदालत के फैसले के बाद गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं.
यह पूरा मामला साल 2018 में जारी किए गए भर्ती विज्ञापन से जुड़ा हुआ है. इस पद के लिए सविता पांडेय ने हाईकोर्ट में एक याचिका दायर कर चयन प्रक्रिया को चुनौती दी थी. सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि चयनित अभ्यर्थी विजि अवस्थी को चयन समिति द्वारा पीएचडी की डिग्री के आधार पर 10 अतिरिक्त अंक (बोनस मार्क्स) प्रदान किए गए थे. जबकि, वर्ष 2018 में जारी किए गए मूल विज्ञापन में पीएचडी के लिए अतिरिक्त अंक देने का कोई भी प्रावधान या जिक्र तक नहीं था. विज्ञापन में नर्सिंग अधीक्षक पद के लिए सिर्फ एमएससी नर्सिंग, बीएससी नर्सिंग अथवा पोस्ट बेसिक बीएससी नर्सिंग जैसी न्यूनतम शैक्षणिक योग्यताएं ही निर्धारित की गई थीं.
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अंक हटते ही बदल गई पूरी मेरिट लिस्ट
कोर्ट में दस्तावेजों की जांच के दौरान यह साफ हुआ कि विजि अवस्थी को पीएचडी के 10 अंक दिए जाने के बाद उनके कुल अंक 79 हो गए थे और इसी आधार पर 9 मई 2019 को उनकी नियुक्ति कर दी गई थी. वहीं, याचिकाकर्ता सविता पांडेय ने अपनी निर्धारित शैक्षणिक योग्यता के आधार पर 75 अंक प्राप्त किए थे. हाईकोर्ट ने पाया कि यदि विजि अवस्थी को दिए गए अवैध 10 अंकों को हटा दिया जाए, तो उनके कुल अंक 79 से घटकर महज 69 रह जाते हैं. इस तरह 75 अंक हासिल करने वाली सविता पांडेय मेरिट लिस्ट में स्वाभाविक रूप से चयनित उम्मीदवार से काफी ऊपर आ जाती हैं.
प्रक्रिया शुरू होने के बाद नहीं बदल सकते नियम
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कानूनी स्थिति सामने रखी है. अदालत ने कहा कि किसी भी सरकारी भर्ती प्रक्रिया के लिए एक बार विज्ञापन जारी होने और चयन प्रक्रिया शुरू हो जाने के बाद, उसके मापदंडों में मनमाने ढंग से बदलाव नहीं किया जा सकता. उम्मीदवारों का मूल्यांकन केवल उन्हीं नियमों और शर्तों के आधार पर होना अनिवार्य है, जो भर्ती विज्ञापन में पहले से स्पष्ट रूप से बताए गए हों. इस आदेश को पुख्ता करने के लिए न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के ‘के. मंजुश्री’ और ‘संदीप श्रीराम वराडे’ जैसे ऐतिहासिक मामलों में दिए गए फैसलों का भी प्रमुखता से उल्लेख किया.
अतिरिक्त योग्यता का स्वतः लाभ नहीं मिलता
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि किसी पद के लिए निर्धारित न्यूनतम योग्यता से अधिक (उच्च) योग्यता रखने वाले अभ्यर्थी को सिर्फ इसी आधार पर अतिरिक्त लाभ या नियुक्ति का अधिकार स्वतः नहीं मिल जाता. इसके लिए भर्ती विज्ञापन में स्पष्ट प्रावधान होना आवश्यक है. इस अहम फैसले ने यह साफ संदेश दिया है कि सरकारी पदों पर चयन के दौरान विज्ञापन की शर्तों की अनदेखी कर किसी को लाभ पहुंचाना सीधे तौर पर न्यायिक जांच के दायरे में आएगा.
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