
मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार ने 21 जुलाई 2026 को विधानसभा में समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक पास हो गया. यह सिर्फ एक कानून का मसौदा नहीं, बल्कि ऐसी चिंगारी है जो धर्म, संविधान और जीवन जीने के अधिकार की लड़ाई को एक साथ सुलगा सकती है. एक तरफ सरकार का तर्क है कि सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून जरूरी कदम है, तो दूसरी तरफ मुस्लिम पर्सनल लॉ इसे शरीयत और संवैधानिक धार्मिक स्वतंत्रता पर सीधा हमला मान रहा है. बिना किसी लाग-लपेट के UCC और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के तर्क समझते हैं…
MP के UCC बिल की पांच बड़ी बातें जो पूरे खेल को बदल देंगी
मध्य प्रदेश का यह बिल उत्तराखंड की तर्ज पर तैयार किया गया है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि उत्तराखंड का UCC ड्राफ्ट भी सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई ने ही तैयार किया था और मध्य प्रदेश की समिति की अध्यक्ष भी वही हैं. हालांकि, इसमें कुछ प्रावधान और भी सख्त हैं:
- सभी धर्मों के लिए शादी और तलाक के एक जैसे नियम लागू होंगे.
- लिव-इन रिलेशनशिप का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन कराना होगा, न करने पर जेल और जुर्माना.
- सभी धर्मों में बेटे और बेटी को बराबर का हिस्सा मिलेगा.
- हर धर्म के लोगों को गोद लेने का समान अधिकार होगा.
- एक से ज्यादा शादी (बहुविवाह) पर पूरी तरह रोक लगेगी.
- लड़कियों की शादी 18 उम्र और लड़कों की 21 उम्र के बाद होगी.
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने तो यहां तक कह दिया है कि जो लोग सिर्फ एक बार शादी करेंगे, सिर्फ उन्हीं को मध्य प्रदेश में रहने का कानूनी अधिकार होगा. यह बयान अपने आप में काफी विवादित हो चुका है.
UCC बनाम मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की कहानी क्या कहती है?
1. शादी की न्यूनतम उम्र: प्यूबर्टी बनाम कानूनी वयस्कता
UCC बिल में क्या है: लड़कियों के लिए 18 साल और लड़कों के लिए 21 साल उम्र शर्त है. इससे कम उम्र में शादी करना गैर-कानूनी होगा और बाल विवाह के तहत सजा का प्रावधान लागू होगा.
मुस्लिम पर्सनल लॉ में क्या है: मुस्लिम पर्सनल लॉ में लड़की के बालिग होने की उम्र यौवनारंभ (प्यूबर्टी) को माना जाता है, जो आमतौर पर 15 साल की उम्र मानी जाती है. कई इस्लामिक विद्वानों के मुताबिक, 15 साल से कम उम्र की लड़की की शादी भी वैध हो सकती है, बशर्ते उसके माता-पिता या अभिभावक की मंजूरी हो.
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 के मुताबिक, मध्य प्रदेश में 23.1% महिलाओं की शादी 18 साल से पहले हो जाती है. मुस्लिम समुदाय में यह प्रतिशत और ज्यादा है. हालांकि धर्म-वार सटीक सरकारी आंकड़े मौजूद नहीं हैं. UCC का यह प्रावधान नाबालिग निकाह को पूरी तरह अमान्य करार देगा.
2. बहुविवाह: चार शादियों का धार्मिक हक या आपराधिक कृत्य?
UCC बिल: सभी धर्मों के लिए बहुविवाह पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा. एक से ज्यादा शादी करने पर कानूनी कार्रवाई होगी और दूसरी शादी खुद ब खुद अमान्य हो जाएगी.
मुस्लिम पर्सनल लॉ: मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत एक पुरुष को एक साथ चार शादियां रखने की इजाजत है, बशर्ते वह सभी पत्नियों के साथ बराबरी का व्यवहार करे. कुरान की आयत (सूरह अल-निसा 4:3) में इसका उल्लेख मिलता है. हालांकि, 2024 के सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने साफ किया है कि बहुविवाह का अधिकार मौलिक धार्मिक अधिकार नहीं है और इस पर कानून बनाया जा सकता है.
2011 की जनगणना के मुताबिक, मध्य प्रदेश में कुल 2.8% मुस्लिम परिवारों में बहुविवाह की प्रथा पाई गई थी, जो राष्ट्रीय औसत 1.9% से ज्यादा थी. UCC बिल इसी सुप्रीम कोर्ट के फैसले की बुनियाद पर खड़ा है.
3. तलाक का तरीका: मर्द की मर्जी या बराबरी का हक?
UCC बिल: तलाक के लिए सभी धर्मों के लिए एक समान प्रक्रिया होगी. पुरुष और महिला, दोनों को तलाक लेने का बराबर का हक होगा. सिर्फ अदालत के जरिए ही तलाक मान्य होगा. तीन तलाक या मुंह से बोलकर तलाक देने की प्रथा पहले ही गैरकानूनी हो चुकी है और UCC इसे और मजबूती से लागू करेगा.
मुस्लिम पर्सनल लॉ: मुस्लिम पर्सनल लॉ में पुरुष को तलाक देने का एकतरफा अधिकार रहा है. इसके तहत तलाक के 3 तरीके हैं:
- तलाक-ए-हसन (तीन महीने की अवधि में दिया जाने वाला तलाक)
- तलाक-ए-बिद्दत (तीन तलाक, जो 2019 से गैरकानूनी है)
- मुबारत (आपसी सहमति से)
महिला के लिए तलाक लेने का रास्ता ‘खुला’ कहलाता है, जिसमें उसे अपने पति की सहमति लेनी पड़ती है या काजी के जरिए अर्जी देनी पड़ती है. मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 2019 ने तीन तलाक को दंडनीय अपराध बना दिया है, लेकिन तलाक के अन्य तरीकों में असमानता अब भी बनी हुई है. UCC इस असमानता को पूरी तरह खत्म करके दोनों पक्षों को बराबरी का अधिकार देगा.
4. उत्तराधिकार: बेटे को दोगुना या बेटी को बराबर?
UCC बिल: बेटा और बेटी, दोनों को माता-पिता की संपत्ति में बराबर का हक मिलेगा. धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होगा.
मुस्लिम पर्सनल लॉ: मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत उत्तराधिकार के नियम काफी जटिल और असमान हैं. आमतौर पर एक बेटे को बेटी के मुकाबले दोगुना हिस्सा मिलता है. पति या पत्नी को भी एक निश्चित हिस्सा मिलता है. पत्नी को बच्चे होने पर 1/8 और बच्चे न होने पर 1/4; पति को बच्चे होने पर 1/4 और बच्चे न होने पर 1/2. यह बंटवारा शरीयत एक्ट 1937 के तहत तय है. UCC का समान उत्तराधिकार का प्रावधान मुस्लिम पर्सनल लॉ की इस बुनियादी संरचना को पूरी तरह बदल देगा.
5. गोद लेना: कानूनी वारिस या सिर्फ देखभाल?
UCC बिल: किसी भी धर्म का व्यक्ति कानूनी रूप से बच्चा गोद ले सकेगा और उस बच्चे को परिवार की संपत्ति में पूरा कानूनी अधिकार मिलेगा. यह अधिकार हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम 1956 की तर्ज पर सभी धर्मों पर लागू होगा.
मुस्लिम पर्सनल लॉ: मुस्लिम पर्सनल लॉ में ‘गोद लेने’ की अवधारणा नहीं है. इसके बजाय ‘कफालत’ का इंतेजाम है. इसके तहत एक बच्चे की देखभाल और परवरिश तो की जा सकती है, लेकिन वह बच्चा कानूनी रूप से परिवार का सदस्य नहीं माना जाता और न ही उसे संपत्ति में कोई अधिकार मिलता है.
सुप्रीम कोर्ट ने शबनम हाशमी बनाम भारत सरकार (2014) के मामले में कहा था कि गोद लेने का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है, लेकिन जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत कोई भी व्यक्ति, चाहे उसका धर्म कुछ भी हो, बच्चा गोद ले सकता है. UCC अब इसे और स्पष्ट और सशक्त बना रहा है. (स्रोत: शबनम हाशमी केस 2014, कफालत बनाम एडॉप्शन)
6. लिव-इन रिलेशनशिप: निजता का हनन या सामाजिक सुरक्षा?
UCC बिल: यह प्रावधान शायद सबसे ज्यादा विवादित है. बिल के तहत, हर लिव-इन रिलेशनशिप का अनिवार्य रूप से रजिस्ट्रेशन कराना होगा. ऐसा न करने पर छह महीने तक की जेल या 50,000 रुपए तक का जुर्माना हो सकता है. अगर कोई दंपति एक महीने से ज्यादा समय से साथ रह रहा है तो उन्हें जिला कलेक्टर के पास रजिस्ट्रेशन कराना होगा. बिल में यह भी प्रावधान है कि लिव-इन से पैदा हुए बच्चों को माता-पिता की संपत्ति में पूरा अधिकार मिलेगा.
मुस्लिम पर्सनल लॉ: मुस्लिम पर्सनल लॉ में लिव-इन रिलेशनशिप की कोई अवधारणा नहीं है. इस्लाम में बिना निकाह के स्त्री-पुरुष का साथ रहना धार्मिक रूप से मान्य नहीं है और इसे ‘जिना’ (व्यभिचार) की कैटेगरी में रखा जाता है. हालांकि, यह धार्मिक कानून है, न कि राज्य का कानून. UCC का यह प्रावधान सभी धर्मों के लोगों पर समान रूप से लागू होगा.
क्यों मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इस बिल को मानने से इनकार कर रहा है?
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने MP के UCC बिल का कड़ा विरोध किया है:
- शरीयत सबसे ऊपर: IMPLB का मुख्य तर्क है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ कुरान और हदीस पर आधारित है, जो खुदा की मर्जी है. कोई भी सांसारिक कानून इसे नहीं बदल सकता है.
- संवैधानिक संरक्षण: बोर्ड का कहना है कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार मौलिक अधिकार है. सायरा बानो बनाम भारत सरकार (2017) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को असंवैधानिक ठहराया था, लेकिन पूरे पर्सनल लॉ पर कोई फैसला नहीं दिया था.
- अल्पसंख्यक अधिकारों का हनन: बोर्ड का मानना है कि UCC बहुसंख्यकवादी सोच को थोपने की कोशिश है. यह अल्पसंख्यक समुदायों की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को मिटाने की कोशिश है.
- बहुविवाह पर तर्क: बोर्ड का कहना है कि इस्लाम में बहुविवाह एक अधिकार नहीं, बल्कि विशेष परिस्थितियों (जैसे विधवाओं और अनाथों की देखभाल) के लिए एक इजाजत है. इस पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना गलत है.
