धर्म

पितृपक्ष 2026: श्राद्ध करने से उतरता है पूर्वजों का ऋण, जानें तिथियों का महत्व, सही विधि और जरूरी नियम


Pitru Paksha 2026: सनातन परंपरा में पितरों का कर्ज चुकाना एक जीवन में संभव नहीं माना गया है. उनके इस संसार से गमन के बाद भी श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करने से उनका ऋण चुकाने की परंपरा है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो षष्ठी तिथि को श्राद्धकर्म संपन्न करता है, उसकी पूजा स्वयं देवता भी करते हैं.

पितृ पक्ष के दौरान दिवंगत पूर्वजों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए तर्पण व पिंडदान किया जाता है. मान्यता है कि यदि पितर अतृप्त या नाराज रह जाएं, तो जीवन में खुशहाली नहीं रहती, घर में अशांति फैलती है और व्यापार व गृहस्थी में आर्थिक हानि झेलनी पड़ती है.

पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान (जयपुर – जोधपुर) के निदेशक, भविष्यवक्ता एवं कुंडली विश्लेषक डॉ. अनीष व्यास के अनुसार, श्राद्ध के जरिए पितरों की तृप्ति के लिए भोजन पहुंचाया जाता है. हम जो भी संकल्प लेकर अर्पित करते हैं, वह सूक्ष्म रूप से पूर्वजों को प्राप्त होता है. जिस तिथि पर पूर्वज का देहावसान हुआ हो, उसी तिथि को उनका श्राद्ध किया जाता है; तिथि ज्ञात न होने पर आश्विन अमावस्या यानी सर्वपितृ अमावस्या को श्राद्ध करने का विधान है.

वर्ष में 96 बार मिलता है श्राद्ध का अवसर

शास्त्रों के अनुसार, पितृगणों के श्राद्ध कर्म के लिए वर्ष में 96 अवसर मिलते हैं. वर्ष के 12 महीनों की 12 अमावस्या तिथियों पर भी श्राद्ध किया जा सकता है.

  • तीन पीढ़ियों का तर्पण: श्राद्ध कर्म से तीन पीढ़ियों के पूर्वजों को तर्पण दिया जाता है.
  • श्राद्ध के अधिकारी: श्राद्ध सामान्यतः पुत्र, पोता, भतीजा या भांजा करते हैं. जिस परिवार में कोई पुरुष सदस्य न हो, वहां महिलाएं भी श्राद्ध कर सकती हैं.
  • 16 दिनों का वास: भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक कुल 16 दिनों के लिए पितर सूक्ष्म रूप में अपने परिजनों के घर में विराजमान होते हैं.

प्रमुख तिथियां और उनका विशेष महत्व

पितृ पक्ष में प्रत्येक तिथि का अपना अलग विधान और महत्व निर्धारित है:

पूर्णिमा: पूर्णिमा पर देहावसान होने वालों का श्राद्ध इसी दिन होता है.

प्रतिपदा: नाना-नानी के परिवार में किसी की मृत्यु हुई हो और तिथि ज्ञात न हो, तो श्राद्ध प्रतिपदा पर किया जाता है. इससे धन-संपत्ति की स्थिरता बनी रहती है.

पंचमी: अविवाहित दिवंगत जनों का श्राद्ध पंचमी तिथि को किया जाता है.

सप्तमी व अष्टमी: सप्तमी पर श्राद्ध करने से महान यज्ञों का पुण्य फल मिलता है, वहीं अष्टमी तिथि संपूर्ण समृद्धियां प्रदान करती है.

नवमी: परिवार की दिवंगत महिलाओं, माताओं या जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, उनका श्राद्ध नवमी को होता है.

दशमी: इस दिन का श्राद्ध ब्रह्मत्व की लक्ष्मी की प्राप्ति कराता है.

एकादशी: मृत संन्यासियों का श्राद्ध एकादशी पर किया जाता है. इसे सर्वश्रेष्ठ दान माना गया है, जिससे समस्त वेदों के ज्ञान की प्राप्ति और पापों का नाश होता है.

द्वादशी व त्रयोदशी: द्वादशी से राष्ट्र कल्याण व अन्न की वृद्धि होती है; त्रयोदशी से उत्तम संतान, दीर्घायु और ऐश्वर्य मिलता है.

चतुर्दशी: दुर्घटना या अकाल मृत्यु के शिकार हुए लोगों का श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को किया जाता है.

सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या: ज्ञात-अज्ञात सभी पितरों के निमित्त इस दिन श्राद्ध व तर्पण किया जाता है.

श्राद्ध की शास्त्रसम्मत विधि

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, विधि-विधान से किया गया कर्म ही पितरों को तृप्त करता है:

स्थान का चयन: संभव हो तो गंगा तट अथवा पवित्र नदियों के किनारे श्राद्ध कर्म करें. ऐसा संभव न होने पर घर पर भी शुद्धता से यह कर्म किया जा सकता है.

कुतप काल (दोपहर का समय): श्राद्ध पूजा हमेशा दोपहर के समय (कुतप काल) में ही आरंभ करें, जब सूर्य की छाया पैरों पर पड़ने लगे. सुबह 12 बजे से पहले अथवा रात्रि में किया गया श्राद्ध पितरों तक नहीं पहुंचता.

ब्राह्मण भोजन व दान: किसी योग्य विद्वान ब्राह्मण द्वारा मंत्रोच्चारण, तर्पण और पिंडदान कराएं. भोजन के बाद सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा व वस्त्र दान दें.

पंचबलि का नियम: भोजन तैयार होने के बाद सर्वप्रथम पांच अंश अलग निकाले जाते हैं.

गीता पाठ: श्राद्ध के दौरान श्रीमद्भागवत गीता के सातवें अध्याय का माहात्म्य पढ़कर पूरे अध्याय का पाठ करें और उसका फल पितरों को समर्पित करें.

पंचबलि का वैज्ञानिक व आध्यात्मिक रहस्य

श्राद्ध के समय भोजन के पांच अंश गाय, कुत्ता, चींटी, कौवा और देवताओं के लिए निकाले जाते हैं. यह प्रक्रिया पंचतत्वों के प्रति कृतज्ञता दर्शाती है:

  • कुत्ता: जल तत्व का प्रतीक
  • चींटी: अग्नि तत्व का प्रतीक
  • कौवा: वायु तत्व का प्रतीक
  • गाय: पृथ्वी तत्व का प्रतीक
  • देवता: आकाश तत्व का प्रतीक

गाय में पांचों तत्व एक साथ समाहित माने गए हैं, इसलिए पितृ पक्ष में गोसेवा को विशेष फलदायी बताया गया है.

श्राद्ध पक्ष के जरूरी नियम और सावधानियां

पितरों के आशीर्वाद और पितृदोष की शांति के लिए इन नियमों का पालन अनिवार्य है:

जनेऊ और दिशा: पितरों के निमित्त सभी कर्म दाएं कंधे पर जनेऊ रखकर (अपसव्य) और दक्षिण दिशा की ओर मुख करके किए जाते हैं.

सात्विक भोजन: रसोई में लहसुन और प्याज पूरी तरह वर्जित है. भोजन में उड़द की दाल, बड़े, चावल, दूध-घी के पकवान, खीर तथा मौसमी सब्जियां (तोरई, लौकी, सीताफल, भिंडी, कच्चे केले) मान्य हैं.

वर्जित खाद्य पदार्थ: जमीन के नीचे उगने वाली सब्जियां जैसे आलू, मूली, अरबी के अलावा बैंगन और बेसन का प्रयोग श्राद्ध के भोजन में वर्जित है.

पात्रों का चयन: श्राद्ध कर्म में लोहे अथवा स्टील के बर्तनों का प्रयोग न करें; इसके स्थान पर पीतल, तांबा, चांदी या पत्तलों का उपयोग करें.

संतानहीन पितरों का श्राद्ध: जो पितर संतानहीन होते हैं, उनके भाई, भतीजे, भांजे या अन्य परिजन श्रद्धापूर्वक व्रत रखकर पिंडदान व तर्पण कर सकते हैं, जिससे उनकी आत्मा को मोक्ष मिलता है.

साधना व उपाय: श्राद्ध के 16 दिनों में घर में 16 या 21 मोरपंख लाएं, अष्टमुखी रुद्राक्ष धारण करें और नित्य शिवलिंग पर जल मिश्रित कच्चा दूध अर्पित करें. इन दिनों में सभी प्रकार के व्यसनों और मांगलिक शुभ कार्यों से दूर रहें.

Weekly Love Horoscope: प्यार में बढ़ेगी नजदीकी या होगी तकरार? पढ़ें 27 सितंबर से 3 अक्टूबर 2026 का लव राशिफल और उपाय

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button