धर्म

सावन सोमवार और सोम प्रदोष एक ही दिन, 6 साल बाद बने संयोग का आपकी राशि से क्या है कनेक्शन?


Sawan Somwar & Som Pradosh Vrat 2026: सावन के पावन महीने में भगवान शिव के भक्तों के लिए एक अत्यंत दुर्लभ और फलदायी संयोग बन रहा है. पूरे 6 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद सावन सोमवार और सोम प्रदोष व्रत का अनूठा महासंयोग एक ही दिन पड़ा है.

सनातन धर्म और वैदिक ज्योतिष में सोमवार का दिन महादेव और चंद्र देव को समर्पित माना जाता है, जबकि त्रयोदशी तिथि का प्रदोष काल भगवान शिव की प्रत्यक्ष उपस्थिति का समय माना जाता है. ऐसे में एक ही तिथि पर इन दोनों पावन व्रतों का एक साथ आना भक्तों के लिए विशेष फलदायी और मनोकामना पूर्ति का स्वर्णिम अवसर लेकर आया है.

ज्योतिषीय दृष्टिकोण और ग्रहों की स्थिति

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, यह धार्मिक संयोग न केवल पूजा-पाठ के लिहाज से खास है, बल्कि आकाशीय ग्रहों के परिवर्तन के दृष्टिकोण से भी बेहद महत्वपूर्ण है. इस शुभ दिन पर चंद्रमा की मजबूत स्थिति और शुभ योगों के निर्माण से जातकों के मानसिक तनाव, अनिद्रा और अनिश्चितता जैसी समस्याओं का निवारण होगा. जिन लोगों की कुंडली में चंद्र दोष या कालसर्प दोष सक्रिय है, उनके लिए इस दिन शिवलिंग का रुद्राभिषेक करना विशेष शांतिप्रद रहेगा.

सभी 12 राशियों पर प्रभाव और विशेष उपाय

मेष, कर्क, वृश्चिक और मीन राशि

इन राशियों के लिए यह महासंयोग करियर में तरक्की और नए आर्थिक अवसरों के द्वार खोलेगा. रुका हुआ धन वापस मिलने के योग हैं.

  • उपाय: शिवलिंग पर शुद्ध जल में थोड़ा सा कच्चा दूध और अक्षत मिलाकर अर्पित करें.

वृषभ, सिंह और धनु राशि

व्यापारिक स्थिति में मजबूती आएगी और परिवार में चल रहे अनबन या मतभेद समाप्त होंगे. दांपत्य जीवन में मधुरता बढ़ेगी.

  • उपाय: महादेव को शहद, बेलपत्र और चंदन चढ़ाएं.

मिथुन, कन्या और तुला राशि

नौकरीपेशा लोगों के लिए नए प्रोजेक्ट मिलने के संकेत हैं, हालांकि सेहत को लेकर थोड़ी सतर्कता बरतनी होगी.

  • उपाय: शिवलिंग पर धतूरा, भांग और गंगाजल अर्पित करें.

मकर और कुंभ राशि

शनि की ढैय्या या साढ़ेसाती से प्रभावित जातकों को कष्टों से राहत मिलेगी और रुके हुए कानूनी या प्रशासनिक कार्य पूरे होंगे.

  • उपाय: जल में काले तिल मिलाकर शिवजी का अभिषेक करें और ॐ नमः शिवाय का जाप करें.

पूजा विधि और शुभ मुहूर्त

शास्त्रों के अनुसार, सावन सोमवार के दिन सुबह 05:47 बजे से प्रातः 10:47 बजे तक पूजन का सर्वोत्तम मुहूर्त है. इसके बाद शाम को प्रदोष काल (संध्या 07:05 बजे से रात्रि 09:14 बजे तक) में शिव-पार्वती की संयुक्त पूजा, दीपदान और रुद्राक्ष की माला से मंत्र जाप करने से अक्षय फल की प्राप्ति होती है.

सोम प्रदोष काल के दौरान (सूर्यास्त से लगभग 45 मिनट पहले से 45 मिनट बाद तक) भगवान शिव और माता पार्वती की संयुक्त पूजा व रुद्राभिषेक अत्यंत फलदायी माना जाता है. इस दौरान शिव जी प्रसन्न मुद्रा में रहते हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं.

पूजन सामग्री

  • अभिषेक सामग्री: शुद्ध जल, गंगाजल, कच्चा दूध, दही, देसी घी, शहद और शक्कर (पंचामृत).
  • पूजा सामग्री: बेलपत्र, शमी पत्र, धतूरा, आक के फूल, भस्म, सफेद चंदन, अक्षत (अखंडित चावल), माता पार्वती के लिए श्रृंगार सामग्री.
  • अन्य: दीपक (गाय के घी का), धूप, नैवेद्य (मिठाई/फल), रुद्राक्ष की माला.

चरणबद्ध पूजन एवं रुद्राभिषेक विधि

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पूर्व तैयारी और संकल्प: संध्या काल में शुद्धता, प्रदोष काल से पूर्व स्नान कर स्वच्छ वस्त्र (सफेद या हल्के रंग के) धारण करें. पूजा स्थल पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें. हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर व्रत एवं पूजन का संकल्प लें.

 

पीठ पूजा एवं आह्वान: गणेश जी और माता पार्वती का स्मरण, सबसे पहले भगवान गणेश जी का ध्यान करें. इसके बाद माता पार्वती और भगवान शिव का आह्वान करें. तांबे या पीतल के पात्र में स्थापित शिवलिंग के सामने घी का दीपक प्रज्वलित करें.

 

रुद्राभिषेक की प्रक्रिया: धाराप्रवाह अभिषेक, शिवलिंग पर सबसे पहले शुद्ध जल अर्पित करें. इसके बाद क्रमबद्ध तरीके से कच्चा दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से (या इन सबको मिलाकर बनाए गए पंचामृत से) अभिषेक करें. हर सामग्री अर्पित करते समय ‘ॐ नमः शिवाय’ या ‘रुद्र सूक्त’ का पाठ करते रहें. अंत में गंगाजल मिले शुद्ध जल की पतली धारा चढ़ाकर स्नान कराएं.

 

श्रृंगार एवं पूजन सामग्री अर्पण: श्रृंगार एवं अर्पण, शिवलिंग को साफ कपड़े से पोंछकर सफेद चंदन का त्रिपुंड लगाएं. इसके बाद भस्म, बेलपत्र (उल्टा करके चढ़ाएं), शमी पत्र, धतूरा और आक के फूल अर्पित करें. माता पार्वती को लाल चुनरी, सिंदूर और श्रृंगार का सामान चढ़ाएं.

 

भोग एवं मंत्र जप: नैवेद्य और मंत्र जाप, महादेव और माता पार्वती को फल तथा मिठाई का भोग लगाएं. इसके बाद रुद्राक्ष की माला से कम से कम 108 बार ‘ॐ नमः शिवाय’ या ‘महामृत्युंजय मंत्र’ का जाप करें.

 

आरती और क्षमा याचना: आरती एवं क्षमा प्रार्थना, कपूर और घी के दीपक से शिव-पार्वती जी की आरती गाएं. अंत में जाने-अनजाने में हुई किसी भी भूल के लिए हाथ जोड़कर ‘कपूरगौरं करुणावतारं…’ बोलते हुए क्षमा प्रार्थना करें और प्रसाद का वितरण करें.

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