
Anant Chaturdashi 2026: भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी यानी अनंत चतुर्दशी. इस दिन एक तरफ जहां बप्पा की विदाई के साथ गणेशोत्सव का समापन होता है, वहीं दूसरी ओर भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की आराधना कर 14 गांठों वाला अनंत सूत्र बांधा जाता है.
अक्सर लोग पूजा-पाठ तो विधि-विधान से कर लेते हैं, लेकिन खानपान के नियमों में अनजाने में चूक कर बैठते हैं. ज्योतिष और धार्मिक परंपराओं के मुताबिक, इस व्रत में 4 सफेद चीजों का सेवन पूरी तरह वर्जित माना गया है. अगर आप भी यह व्रत रख रहे हैं, तो इन चीजों से दूरी बनाकर रखें.
अनंत चतुर्दशी 2026: तिथि व शुभ मुहूर्त
- तिथि: शुक्रवार, 25 सितंबर 2026
- चतुर्दशी तिथि प्रारंभ: 24 सितंबर 2026, शाम को 05:43 बजे से
- चतुर्दशी तिथि समाप्त: 25 सितंबर 2026, शाम को 04:35 बजे तक
- पूजा व अनंत सूत्र बांधने का श्रेष्ठ मुहूर्त: प्रातः 06:11 बजे से सुबह 10:42 बजे तक (प्रातःकाल और लाभ-अमृत चौघड़िया में पूजा करना सर्वोत्तम माना जाता है)
अनंत सूत्र तैयार करने व बांधने की विधि
सूत्र तैयार करना: सूत या रेशम के 14 धागों को एक साथ मिलाकर उसमें थोड़ी-थोड़ी दूरी पर कुल 14 गांठें लगाएं. इसके बाद इसे हल्दी, कुमकुम या केसर के पानी में रंग लें.
कलश स्थापना व अभिषेक: पूजा स्थल पर भगवान विष्णु या शेषनाग की प्रतिमा के सामने कलश स्थापित करें. अनंत सूत्र को तांबे या चांदी की थाली में रखें और उस पर गंगाजल व पंचामृत छिड़कें.
14 गांठों का आह्वान: प्रत्येक गांठ पर अक्षत, चंदन और पुष्प अर्पित करते हुए 14 लोकों (भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक, सत्यलोक, अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल) का ध्यान करें.
भोग व आरती: भगवान विष्णु को खीर, पंचामृत और 14 पूरियों का भोग लगाएं और अनंत कथा का श्रवण करें.
सूत्र धारण करने का नियम:
इस सूत्र को पूरे एक वर्ष तक अथवा कम से कम 14 दिनों तक धारण करने का नियम माना गया है
थाली से दूर रखें ये 4 सफेद चीजें
सादा सफेद नमक: अनंत चतुर्दशी के व्रत का सबसे पहला और कड़ा नियम है नमक का त्याग. पारंपरिक तौर पर इसे ‘अलूणा व्रत’ (बिना नमक का व्रत) कहा जाता है. आम सफेद समुद्री नमक का सेवन करने से व्रत उसी समय खंडित माना जाता है. अगर स्वास्थ्य कारणों से बिना नमक रहना संभव न हो, तो शाम की पूजा के बाद ही बहुत सीमित मात्रा में सेंधा नमक लें, लेकिन दिनभर इससे बचें.
चावल: चावल को पूजा में अक्षत के रूप में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है, लेकिन एकादशी और चतुर्दशी के दिन इसे भोजन में शामिल करना शास्त्रों के अनुसार गलत माना गया है. चावल का उपयोग सिर्फ श्रीहरि के चरणों में अर्पण करने तक ही सीमित रखें, इसे फलाहार या भोजन के रूप में न खाएं.
दही: पूजा के दौरान पंचामृत बनाने में दही का इस्तेमाल जरूर होता है, लेकिन व्रती के लिए अलग से दही या रायता खाना पूरी तरह निषिद्ध है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, व्रत वाले दिन सात्विक और साधारण आहार ही लेना चाहिए, जबकि दही शरीर में आलस्य और कफ प्रवृत्ति को बढ़ाता है.
कच्चा दूध और खोए की मिठाइयां: इस दिन गाय के कच्चे दूध से अनंत सूत्र और भगवान विष्णु का अभिषेक किया जाता है. पूजा में समर्पित होने वाली इस सामग्री को स्वयं पीना वर्जित है. इसके अलावा बाजार से लाई गई सफेद मिठाइयां (जैसे रसगुल्ला, पेड़ा या खोया बर्फी) भी न खाएं, क्योंकि उनमें मिलावट और अन्न के अंश होने का खतरा रहता है.
आखिर क्यों है इन चीजों पर रोक?
संयम और तपस्या का प्रतीक: महाभारत की कथा के अनुसार, जब पांडवों ने अपने खोए हुए राजपाट को वापस पाने के लिए यह व्रत शुरू किया था, तब महर्षि वेदव्यास ने उन्हें पूर्ण सात्विक और नमक-रहित रहने का निर्देश दिया था. यह व्रत केवल भूखे रहने का नहीं, बल्कि स्वाद पर नियंत्रण का पर्व है.
पूजन सामग्री की मर्यादा: जिन सामग्रियों से भगवान का अभिषेक और तिलक होता है, उन्हें साधारण भोजन की तरह थाली में परोसना धार्मिक मर्यादा के अनुकूल नहीं माना जाता.
व्रत के दौरान फलाहार के रूप में फल, सूखे मेवे, मखाने या सिंघाड़े के आटे से बनी सात्विक चीजें लेना ही सबसे सुरक्षित और फलदायी विकल्प है.
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