

इस हफ्ते ‘वोट चोरी’ के आरोपों को दोहराते हुए लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को चेतावनी दी और एक सुझाव भी दिया. विपक्ष के नेता ने ‘जनता के जनादेश की चोरी’ का आरोप लगाते हुए कहा, ‘वो समय आएगा, हम आपको पकड़ लेंगे.’ इसके बाद उन्होंने सलाह दी कि वोटर लिस्ट में कथित हेरफेर के मामले में ‘सरकारी गवाह बन जाइए.’
राहुल ने सबसे पहले पिछले साल लोकसभा में चुनाव आयोग को यह चेतावनी दी थी. नौ महीने बाद, ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट में चुनाव आयोग के अंदर मतभेद का खुलासा होने के बाद अपनी बात सही साबित होने का दावा करते हुए, विपक्ष ने साफ तौर पर ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी की मांग की है.
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दूसरी तरफ बीजेपी बचाव कर रही है तो दूसरी तरफ विपक्ष गिरफ्तारी की मांग पर अड़ा है. लेकिन गिरफ्तारी की मांग एक प्रावधान से टकरा गई है और वह है दिसंबर 2023 में संसद से पास हुए कानून की धारा 16. सुप्रीम कोर्ट में दायर एक नई याचिका में कहा गया है कि इस प्रावधान में एक शर्त भी है.
विवाद के केंद्र में- ज्ञानेश कुमार
नया विवाद 23 सितंबर को तब शुरू हुआ जब अखबार की रिपोर्ट में कहा गया कि ज्ञानेश कुमार के दो साथी कमिश्नरों- सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार और एक ही दिन में चार बार लिखित रूप में अपनी आपत्तियां दर्ज कराई थीं.
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ये आपत्तियां चुनावी रोल के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविजन’ (SIR) जैसे मुद्दों पर थीं. संधू और जोशी ने इन आपत्तियों के बारे में सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कहा है.
राहुल गांधी के अलावा, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, AAP के अरविंद केजरीवाल और तृणमूल कांग्रेस की संस्थापक ममता बनर्जी उन बड़े नेताओं में शामिल हैं जिन्होंने ‘BJP को फायदा पहुंचाने के लिए’ वोटर लिस्ट में हेरफेर का आरोप लगाया है. ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ भी इस मुहिम में शामिल हो गई है.
विपक्ष का कहना है कि कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR प्रक्रिया के तहत अब तक 13 करोड़ से ज्यादा वोटरों के नाम हटाए जा चुके हैं, जो भारत के कुल वोटरों का लगभग 13 प्रतिशत है. दिल्ली में यह संख्या सबसे ज्यादा रही है, जहां SIR से पहले के हर तीन वोटरों में से एक का नाम ड्राफ्ट लिस्ट से हटा दिया गया, और बचे हुए लोगों में से एक-तिहाई को ‘गड़बड़ियों’ के लिए नोटिस मिले हैं.
नए वोटरों को रजिस्टर करने वाले ‘फॉर्म 6’ में बदलाव भी चुनाव आयोग के अंदर बहस का विषय रहा है. और सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में इसे ज्ञानेश कुमार के उन कामों में से एक बताया गया है जो कथित तौर पर गैर-कानूनी थे और उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर थे.
चुनाव आयोग ने डिप्टी डायरेक्टर स्तर के अधिकारी के हस्ताक्षर वाला एक प्रेस नोट जारी किया, जिसमें कहा गया कि विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय होना एक सामान्य बात है, और SIR समेत पूरे आयोग के अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे. विपक्ष का पूरा ध्यान सिर्फ ज्ञानेश कुमार पर है.
ज्ञानेश कुमार को बचाने वाली कानूनी दीवार
कानूनी भाषा को हटाकर देखें तो, ‘चीफ इलेक्शन कमिश्नर एंड अदर इलेक्शन कमिश्नर्स एक्ट, 2023’ की धारा 16 कहती है कि कोई भी अदालत मौजूदा या पूर्व CEC या इलेक्शन कमिश्नर के खिलाफ उनके सरकारी काम के दौरान किए गए किसी भी काम के लिए सिविल या क्रिमिनल केस की सुनवाई नहीं कर सकती.
इसमें लिखा है, ‘फिलहाल लागू किसी भी दूसरे कानून में कुछ भी लिखा होने के बावजूद, कोई भी अदालत किसी ऐसे व्यक्ति के खिलाफ कोई सिविल या क्रिमिनल कार्यवाही शुरू या जारी नहीं रखेगी जो चीफ इलेक्शन कमिश्नर या इलेक्शन कमिश्नर है या रहा है, अगर उसने अपने सरकारी काम या जिम्मेदारी को निभाते हुए कोई काम किया हो, कोई चीज की हो या कोई बात कही हो.’
यह सुरक्षा उस कानून का हिस्सा थी जिसके तहत कमिश्नरों को चुनने के लिए एक कमेटी बनाई गई थी. 2023 से पहले, चुनने की कोई खास प्रक्रिया नहीं थी क्योंकि कोई कानून नहीं बना था, इसलिए राष्ट्रपति सरकार की सलाह पर नियुक्तियां करते थे, जिसमें न्यायपालिका या विपक्ष की कोई भूमिका नहीं होती थी.
यह कानून ‘अनूप बरनवाल’ मामले में मार्च 2023 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद आया, जिसमें संसद ks कानून बनाने तक प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की एक अंतरिम चयन समिति बनाई गई थी.
उसी साल बाद में बने कानून ने CJI को हटा दिया और पैनल में एक मंत्री को शामिल कर लिया. कानून पर हाल ही में हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने कहा कि इसका मतलब था कि ‘निष्पक्ष चयनकर्ता’ हट गया. PM और PM के चुने गए मंत्री असल में उस कमेटी के तीसरे सदस्य, यानी विपक्ष के नेता (लोकसभा) पर भारी पड़ते हैं.
जहां तक कमिश्नरों के लिए सुरक्षा के प्रावधान की बात है, तो अगस्त 2023 में जब कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने मूल बिल पेश किया था, तब उसमें यह प्रावधान नहीं था. इसे चार महीने बाद जोड़ा गया, और विपक्ष के वॉकआउट और हंगामे के बावजूद कानून इसी के साथ पास हो गया.
क्या सिस्टम में कोई कमी है?
हालांकि, यह छूट सिर्फ ड्यूटी के दौरान किए गए कामों पर ही लागू होती है. वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की है. इसमें कहा गया है कि वोटर लिस्ट में कोई भी हेर-फेर करना कमिश्नर के काम का हिस्सा नहीं है.
याचिका में कहा गया है, ‘चीफ इलेक्शन कमिश्नर को आपराधिक मुकदमे से कोई निजी छूट नहीं मिलती है.’
इसमें मांग की गई है कि ज्ञानेश कुमार की जांच हो और उन पर किसी भी दूसरे आरोपी की तरह मुकदमा चलाया जाए. इसमें ‘रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट, 1950’ की धारा 32 और रिकॉर्ड में हेर-फेर से जुड़े ‘भारतीय न्याय संहिता’ के प्रावधानों के तहत मुकदमा चलाने की मांग की गई है.
याचिका में यह भी बताया गया है कि संविधान सिर्फ राष्ट्रपति और राज्यपालों को ही पूरी छूट देता है.
इसमें पश्चिम बंगाल का उदाहरण सबसे अहम बताया गया है. आरोप है कि आयोग के नाम पर 16 लाख से ज्यादा अपीलें दायर करके उन वोटरों के नाम हटाए गए, जिन्हें 700 ज्यूडिशियल अफसरों ने लिस्ट में वापस शामिल किया था. यह सब बाकी दो कमिश्नरों की जानकारी के बिना किया गया.
गोवा के बारे में कहा गया है कि अदालती आदेशों के बावजूद 97 योग्य वोटरों के नाम लिस्ट में वापस नहीं जोड़े गए. सुप्रीम कोर्ट ने अभी तक इस याचिका को सुनवाई के लिए लिस्ट नहीं किया है.
तीन साल में मामला गंभीर हुआ
हालांकि कुछ खास मुद्दे अब गंभीर रूप ले चुके हैं, लेकिन विपक्ष 2023 के कानून और चुनाव आयोग की स्वायत्तता के मुद्दे पर उससे पहले से ही आवाज उठाता रहा है.
दिसंबर 2025 में एक भाषण में, राहुल गांधी ने यहां तक कहा कि सत्ता में आने पर कांग्रेस इस कानून को बदल देगी. उन्होंने इस प्रावधान को ‘इम्युनिटी का तोहफा’ यानी सुरक्षा का उपहार कहा, जो इससे पहले किसी भी प्रधानमंत्री ने नहीं दिया था.
इम्युनिटी (सुरक्षा) का यह कवच मिलने के बाद से ही पूर्व आयुक्तों के बीच इसे लेकर मतभेद रहे हैं. जहां कुछ लोगों ने राजनीतिक मंशा से दर्ज मामलों के खिलाफ सुरक्षा के तौर पर इसका स्वागत किया, वहीं 2019 में आयोग से इस्तीफा देने वाले अशोक लवासा ने इसे ‘पूरी तरह से हैरान करने वाला’ बताया.
गृह मंत्री अमित शाह ने 10 दिसंबर, 2025 को संसद में एक बहस का जवाब देते हुए कहा, ‘हमने केवल ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951′ के प्रावधानों को दोहराया है. RPA की धारा 32 और RPA 1951 की धारा 146C के तहत संशोधन में कहा गया है कि चुनाव आयोग का कोई भी अधिकारी, जिसमें चुनाव आयुक्त भी शामिल हैं, चुनाव प्रक्रिया के संबंध में किसी भी कानूनी कार्रवाई का सामना नहीं कर सकता है.’
इस पर राहुल गांधी ने कहा कि अमित शाह ने ‘बेतुका तर्क’ दिया. उसी महीने के आखिर में दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई एक रैली में, राहुल ने मंच से तीनों कमिश्नरों के नाम लिए और कहा कि उनके खिलाफ कार्रवाई होगी.
इस हफ्ते जब बाकी दो कमिश्नरों ने इस पर आपत्ति जताई, तो उन्होंने खास तौर पर ज्ञानेश कुमार का जिक्र किया. उन्होंने उनसे यह भी कहा कि वे ‘सरकारी गवाह’ बन सकते हैं और NDA सरकार में जिस किसी ने भी उनसे वोटर लिस्ट में हेर-फेर करवाई थी, उसके खिलाफ गवाही दे सकते हैं.
बीजेपी ने किसी भी तरह की गड़बड़ी से इनकार किया है और कहा है कि कांग्रेस बार-बार मिली हार को पचा नहीं पा रही है.
ज्ञानेश कुमार को हटा पाएगा विपक्ष?
विपक्ष ने पहले भी ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए दूसरे तरीके आजमाए हैं, जैसे कि जजों के मामले में होने वाली महाभियोग की प्रक्रिया.
हालांकि, अप्रैल में राज्यसभा के चेयरमैन सीपी राधाकृष्णन और लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने इस तरह के कदम के लिए उनके प्रस्तावों को मंजूरी देने से इनकार कर दिया था. सूत्रों ने NDTV को बताया है कि विपक्ष अब एक और ऐसा प्रस्ताव लाने की योजना बना रहा है.
जनवरी से, सुप्रीम कोर्ट NGO ‘लोक प्रहरी’ की ओर से धारा 16 को दी गई एक अलग चुनौती की जांच कर रहा है, लेकिन अब तक उसने इस प्रावधान पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है.
23 सितंबर को, इसी मामले से जुड़ी एक घटना में, दो जजों की बेंच के बंटे हुए फैसले के बाद 2023 के कानून को लेकर चल रही बड़ी लड़ाई को चीफ जस्टिस के पास भेज दिया गया. अब वे तय करेंगे कि क्या इस मामले की सुनवाई संवैधानिक बेंच को करनी चाहिए.
रिपोर्टः आरिश छाबरा





