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बंगाल उपचुनाव: क्या बिखरा हुआ विपक्ष मुस्लिम वोट को BJP के खिलाफ एकजुट रख पाएगा? | Bengal Nandigram Rejinagar By Election 2027 BJP vs TMC Vs Congress Muslim Vote Equations


कोलकाता:

पश्चिम बंगाल की दो विधानसभा सीट- नंदीग्राम और रेजीनगर में उपचुनाव होना है. दोनों सीटों पर वोटिंग 6 अक्टूबर तो वोटों की गिनती 9 अक्टूबर को होगी. नंदीग्राम सीट में शुभेंदु अधिकारी के इस्तीफे तो रेजीनगर में हुमायूं कबीर के इस्तीफे के कारण उपचुनाव हो रहा है. यूं तो इस उपचुनाव का राज्य की राजनीति पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ना है. लेकिन BJP की लहर और TMC की टूट के बाद यह उपचुनाव मैदान में उतर रहे दल और गुटों को उनका जनाधार बताएगा. दोनों सीटों पर मुस्लिम वोटरों का प्रभाव भी अच्छा-खासा है. ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि राज्य की बदली हुई सियासी स्थिति में मुस्लिम वोटर किसके साथ है? 

बंगाल में मुस्लिम वोट ही तय करता है सत्ता 

बंगाल में मुस्लिम वोट के बिना कोई भी सियासी गणित पूरा नहीं होता. पिछली जनगणना के अनुसार राज्य में मुस्लिम आबादी 27 प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर करीब 30 प्रतिशत हो गई होगी, ऐसा माना जाता है. तीन दशक तक यही वोट तय करता रहा कि राइटर्स बिल्डिंग में कौन सत्ता में बैठेगा और कौन बाहर इंतजार करेगा. जब कांग्रेस शासन में थी, तब मुसलमानों के पास वामपंथ एक विकल्प था. जब वाममोर्चा सत्ता में था, तब ममता बनर्जी विकल्प थीं. जब तृणमूल कांग्रेस सत्ता में रही, तब कांग्रेस और लेफ्ट विकल्प बने रहे. यानी दरवाजा कभी पूरी तरह बंद नहीं हुआ. 

लेकिन बीजेपी के सत्ता में आने से यह स्थिति बदल गई है. बंगाल समेत देश के अन्य हिस्सों की तरह यहां भी मुसलमान बड़ी संख्या में बीजेपी को वोट नहीं देते. यही एक एक मजबूत फैक्ट है, जिसे बीजेपी समेत सभी दल समझते हैं.

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क्या मुस्लिम वोट एक विपक्षी दल के पीछे एकजुट होंगे?

मुर्शिदाबाद जिले की रेजीनगर सीट पर मुस्लिम आबादी 65 प्रतिशत से अधिक है. नंदीग्राम पूरी तरह मुस्लिम बहुल सीट नहीं है, लेकिन वहां भी मुस्लिम मतदाताओं की अच्छी संख्या है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नंदीग्राम अधिकारी परिवार का गढ़ माना जाता है. अब सवाल यह नहीं है कि मुसलमान बीजेपी को वोट देंगे या नहीं, क्योंकि इसका उत्तर लगभग निश्चित है. असली सवाल यह है कि क्या वे किसी एक विपक्षी दल के पीछे एकजुट होकर वोट करेंगे?

यही वह राजनीतिक समीकरण है जिसकी बीजेपी को आवश्यकता है. एक ऐसा हिंदू वोट बैंक जो एक झंडे के नीचे संगठित हो चुका है और दूसरी ओर मुस्लिम वोट जो ममता बनर्जी की कमजोर पड़ चुकी तृणमूल कांग्रेस, ऋतब्रत बनर्जी के विद्रोही गुट, कांग्रेस, वामदलों, हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी (AJPU) और अन्य छोटे दलों में बंट जाए. जब तक यह बिखराव बना रहेगा, कोई भी विपक्षी दल बंगाल में बहुमत का गठजोड़ नहीं बना पाएगा. उपचुनाव सरकार नहीं बदलेंगे, लेकिन यह जरूर बताएंगे कि यह विभाजन और गहरा हो रहा है या नहीं.

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2021 और 2026 में मुस्लिम वोटिंग का रुझान

2021 में मुस्लिम मतदाता तृणमूल कांग्रेस की सबसे मजबूत ताकत थे. CSDS-लोकनीति के अनुसार 75 प्रतिशत मुस्लिम वोट तृणमूल के पक्ष में गए थे. यह आंकड़ा 2019 में 70 प्रतिशत और 2016 में 51 प्रतिशत था. जिन जिलों में मुस्लिम आबादी 30 प्रतिशत से अधिक थी, वहां तृणमूल ने मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण 24 परगना और बीरभूम में शानदार जीत दर्ज की. नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के डर ने इस समर्थन को और मजबूत किया. 215 सीटों का बहुमत काफी हद तक मुस्लिम वोटों के इस एकतरफा समर्थन पर टिका था.

लेकिन 2026 में यह वर्चस्व टूट गया. तृणमूल 215 सीटों से घटकर 80 सीटों पर आ गई. बीजेपी 207 सीटें जीतकर सत्ता में पहुंच गई. सबसे बड़ा बदलाव मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर में दिखा.

मुस्लिम वोटरों में बिखराव का बड़ा उदाहरण है बेलडांगा का नतीजा

बेलडांगा इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है. यहां मुस्लिम आबादी लगभग 63 प्रतिशत आंकी जाती है. 2021 में तृणमूल को 55 प्रतिशत से अधिक वोट मिले थे, लेकिन 2026 में उसका वोट शेयर घटकर 26.1 प्रतिशत रह गया. एजेयूपी को 20.4 प्रतिशत और कांग्रेस को 17.5 प्रतिशत वोट मिले. बीजेपी मात्र 31.9 प्रतिशत वोट के साथ सीट जीत गई. बीजेपी को मुस्लिम वोट नहीं मिले, लेकिन विपक्षी वोटों के बंटवारे ने उसे जीत दिला दी.

यह कहानी पूरे जिले में दोहराई गई. रेजीनगर और नवदा में एजेयूपी ने तृणमूल को तीसरे स्थान पर धकेलते हुए जीत हासिल की. कांग्रेस ने फरक्का और रानीनगर पर कब्जा किया. सीपीआई(एम) ने डोमकल सीट वापस हासिल की. जलांगी में तृणमूल की बढ़त 2021 के 79 हजार वोटों से गिरकर 2026 में लगभग 21,500 वोट रह गई. इसलिए 215 से 80 सीटों तक का पतन मुस्लिमों के बीजेपी की ओर झुकाव के कारण नहीं, बल्कि उनके वोटों के बिखराव का परिणाम था.

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ममता के पास चेहरा है, लेकिन साख और संगठन कमजोर

ममता बनर्जी आज भी बंगाल में विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा हैं, लेकिन पहचाने जाना और भरोसा हासिल होना दो अलग बातें हैं. 71 वर्षीय ममता अब पहले जैसी सक्रिय नहीं रहीं. 2007 के नंदीग्राम आंदोलन की वह नेता, जो गांव-गांव घूमती थीं, अब उस तरह सड़क पर नहीं दिखतीं. 4 मई को वे अपने पारंपरिक गढ़ भवानीपुर में शुभेंदु अधिकारी से हार गईं. एक चेहरे पर आधारित पार्टी ने पहली बार महसूस किया कि चेहरा हार सकता है और संगठन उसे संभाल नहीं सकता.

इसके बाद पार्टी तीन हिस्सों में बंट गई. पहला गुट ममता और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी का है. दूसरा गुट ऋतब्रत बनर्जी के साथ जाने वाले 80 में से 50 से अधिक विधायकों का है, जिसे आधिकारिक विपक्ष के रूप में मान्यता मिली है. तीसरा गुट उन लोकसभा सांसदों का है जो नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया में चले गए.

पार्टी समितियां भंग हो गईं, पार्षद दूसरे खेमों में चले गए और चुनाव आयोग ने पार्टी का नाम तथा “घास पर दो फूल” चुनाव चिह्न भी फ्रीज कर दिया. 1998 के बाद पहली बार ममता अपने बनाए हुए चुनाव चिह्न पर निर्विवाद नियंत्रण में नहीं हैं.

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मुस्लिमों में बीजेपी से डर तो लेकिन टीएमसी पर भरोसा नहीं

मुस्लिम वोट चुनाव परिणाम वाले दिन अचानक उनसे दूर नहीं हुए. स्कूल भर्ती घोटाले, नगरपालिका ठेकों में कथित भ्रष्टाचार और इस भावना ने कि संरक्षण राजनीति “किराया वसूली” में बदल गई है, धीरे-धीरे भरोसा कमजोर किया. 2021 में मुसलमानों ने बीजेपी के डर से उन्हें वोट दिया था. 2026 तक डर तो बना रहा, लेकिन भरोसा नहीं.

आज ममता के पास भीड़ जुटाने वाला नाम तो है, लेकिन कमजोर पड़ता संगठन है. बंगाल के मुसलमानों को यह बताने की जरूरत नहीं कि ममता कौन हैं; उन्हें यह दिखाने की जरूरत है कि क्या वे अब भी बूथ स्तर तक संगठन नियंत्रित कर सकती हैं. जब तक वह यह साबित नहीं करतीं, मतदाता अन्य विकल्पों की ओर देख सकते हैं.

विद्रोही टीएमसी गुट: न विश्वसनीयता, न संगठन

ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला विद्रोही गुट 80 में से 50 से अधिक तृणमूल विधायकों को अपने साथ लेकर आधिकारिक विपक्ष बन गया है. इनमें से कई विधायक मुस्लिम बहुल क्षेत्रों से आते हैं. लेकिन जनता ने देखा है कि इस गुट ने सरकार के खिलाफ कोई आक्रामक संघर्ष नहीं किया. एक “सौहार्दपूर्ण विपक्ष” ऐसा विपक्ष नहीं है जिस पर असुरक्षित महसूस करने वाला समुदाय आसानी से भरोसा करे. इन विधायकों का स्थानीय प्रभाव हो सकता है, लेकिन उनके पास राज्यव्यापी संगठन नहीं है. जमीन पर बचा-खुचा संगठन अभी भी आदतन ममता के साथ माना जाता है.

कांग्रेस बन सकती है सबसे बड़ी लाभार्थी

इन उपचुनावों में मुस्लिम वोट पर सबसे कम क्षति झेलने वाला दावा कांग्रेस का दिखाई देता है. नंदीग्राम में ममता समर्थक गुट की उम्मीदवार संचिता प्रधान डे के हटने के बाद ममता ने अपने समर्थकों से कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान का समर्थन करने को कहा. ऋतब्रत गुट के उम्मीदवार मोहम्मद एहतेश मुल हक कोलकाता से आए नेता हैं, जिनकी स्थानीय पकड़ सीमित मानी जाती है.

इसके बाद पुलिस ने 2007 के भूमि आंदोलन से जुड़े 19 साल पुराने मामलों में मिलन प्रधान को गिरफ्तार कर लिया और 3 अक्टूबर तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया. इससे यह धारणा बनी कि कांग्रेस ही बीजेपी के खिलाफ वास्तविक लड़ाई लड़ रही है. मुस्लिम वोटों का एकीकरण कांग्रेस के पक्ष में संभव है, हालांकि केवल मुस्लिम वोटों के बल पर सीट जीतना आसान नहीं होगा.

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रेजीनगर में स्थिति अलग है. यहां हुमायूं कबीर के पुत्र गोलाम नबी आजाद एजेयूपी उम्मीदवार हैं. उनके पिता ने चार महीने पहले 51 प्रतिशत से अधिक वोट लेकर सीट जीती थी. फिर भी कांग्रेस के पास ऐतिहासिक बढ़त है. मुर्शिदाबाद दशकों तक कांग्रेस का गढ़ रहा. ए.बी.ए. गनी खान चौधरी ने यहां ऐसा राजनीतिक आधार तैयार किया था जिसका असर लंबे समय तक कायम रहा. 1998 में तृणमूल बनने के बाद यह वोट धीरे-धीरे खिसका, लेकिन मालदा और मुर्शिदाबाद में कांग्रेस की जड़ें पूरी तरह खत्म नहीं हुईं. बहरामपुर में अधीर रंजन चौधरी इसका उदाहरण हैं.

बंगाल की जनता ने इस सदी में कांग्रेस सरकार नहीं देखी है, जबकि वाममोर्चा और तृणमूल दोनों के शासन का अनुभव किया है. ऐसे माहौल में यदि कांग्रेस खुद को सिर्फ एक जिला-स्तरीय याद नहीं बल्कि एक गंभीर राज्यव्यापी विकल्प के रूप में पेश कर सके, तो उसके पास बिखरे हुए मुस्लिम वोटों को समेटने का सबसे अच्छा अवसर है.

वामपंथ की दुविधा

2011 तक वाममोर्चे को मुस्लिमों का बड़ा समर्थन मिलता था. लेकिन उसका पतन भारतीय राजनीति के सबसे तेज पतनों में गिना जाता है. कुछ महीनों में उस आधार को पुनर्जीवित करना संभव नहीं है. वामदलों के कई पुराने उदारवादी वोटर पहले ही दूसरे दलों में जा चुके हैं, जिनमें कुछ बीजेपी तक पहुंच गए. संगठन अब पूरे राज्य में पहले जैसी पकड़ नहीं रखता. डोमकल जैसी सीटों पर वह लाभ उठा सकता है, जहां मुस्लिम वोट बिखर रहा हो. लेकिन इन उपचुनावों में उसकी भूमिका सीमित दिखती है. नंदीग्राम में सीपीआई के शांतिगोपाल गिरी और रेजीनगर में सीपीआई(एम) के सैयद असद अली मैदान में हैं, लेकिन वे व्यापक राजनीतिक समीकरण बदलते नहीं दिखते.

हुमायूं कबीर, नौशाद सिद्दीकी और अन्य

हुमायूं कबीर रेजीनगर में इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि उन्होंने हाल ही में यह सीट जीती थी और अब उनके बेटे मैदान में हैं. लेकिन उनकी स्वीकार्यता रेजीनगर और नवदा से आगे सीमित है. इसी तरह नौशाद सिद्दीकी की इंडियन सेक्युलर फ्रंट (आईएसएफ) मुख्य रूप से भांगर क्षेत्र तक सीमित प्रभाव रखती है. ये नेता अपने-अपने क्षेत्रों में लोकप्रिय हो सकते हैं, लेकिन पूरे बंगाल में मुस्लिम वोटों का बड़ा हिस्सा अपने पक्ष में करना अलग चुनौती है.

बीजेपी को इन दलों के हर जगह असफल होने की जरूरत नहीं है. उसे केवल इतना चाहिए कि वे कुछ क्षेत्रों में पर्याप्त वोट काट लें ताकि कोई एक विपक्षी दल निर्णायक रूप से मजबूत न हो सके. यही इन दोनों उपचुनावों का मूल राजनीतिक संदेश है. जो समुदाय कभी एकजुट होकर वोट करता था, वह अब कई हिस्सों में बंटा दिखाई दे रहा है. यदि यह बिखराव जारी रहता है, तो विपक्ष सैद्धांतिक रूप से मुस्लिम वोट अपने पास रखेगा, लेकिन व्यवहार में बंगाल की सत्ता से दूर होता जाएगा.

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