

लोकसभा में मंगलवार को कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने केंद्र की नई शिक्षा सुधार समिति के एक सदस्य को “गोमूत्र विशेषज्ञ” कह दिया. उन्होंने सीधे तौर पर किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन उनकी बातों का मतलब आईआईटी मद्रास के डायरेक्टर प्रोफ़ेसर वी. कामाकोटी से जोड़ा गया. प्रियंका के इस बयान के बाद बीजेपी और कांग्रेस के बीच एक नया विवाद शुरू हो गया है. बीजेपी सांसदों ने प्रियंका के इस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई है.
प्रोफ़ेसर कामाकोटी उन छह डोमेन एक्सपर्ट्स में से एक हैं जिन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित एक “हाई-पावर्ड” टास्क फ़ोर्स में नियुक्त किया गया है. इस टास्क फ़ोर्स का काम सार्वजनिक परीक्षाओं को लीक-प्रूफ़ बनाने के लिए सुधारों की सिफ़ारिश करना है.
प्रियंका गांधी ने क्या कहा?
लोकसभा को संबोधित करते हुए, प्रियंका गांधी ने भारत की परीक्षा प्रणाली में सुधार के लिए एक और समिति पर सरकार की निर्भरता पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा, “माननीय अध्यक्ष महोदय, मैं आपके माध्यम से माननीय प्रधानमंत्री जी से यही कहना चाहती हूं कि शायद उन्हें अपने सलाहकारों को बदलना चाहिए. नई समितियां बनाने से काम नहीं चलेगा, चाहे उनका अध्यक्ष कोई भी हो.” उन्होंने पहले की राधाकृष्णन समिति का जिक्र करते हुए कहा कि पिछली सिफारिशों को लागू नहीं किया गया था. उन्होंने कहा, “सिस्टम में सुधार के लिए राधाकृष्णन कमिटी भी बनाई गई थी. आज तक उनकी एक भी सिफ़ारिश लागू नहीं की गई है. और इस नई कमिटी में आईबी के पूर्व चीफ़, एक IT कंपनी के मालिक और ‘गौमूत्र’ के एक्सपर्ट भी शामिल हैं.” हालांकि, प्रियंका गांधी ने उस व्यक्ति का नाम नहीं लिया, लेकिन इन टिप्पणियों का मतलब प्रोफेसर कामाकोटी पर निशाना साधना समझा गया.
कौन हैं प्रोफेसर कामाकोटी?
प्रोफ़ेसर कामाकोटी गाय के मूत्र के कथित औषधीय फ़ायदों की वकालत करने के लिए जाने जाते हैं. जनवरी 2025 में चेन्नई में एक सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि गाय के मूत्र में एंटी-फंगल, एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि शोधकर्ताओं ने इस विषय पर प्रयोग किए हैं और इन दावों का समर्थन करने वाले वैज्ञानिक शोध-पत्र प्रकाशित किए हैं. बाद में सोशल मीडिया पर उनके भाषण का एक वीडियो खूब वायरल हुआ, जिसमें आलोचकों ने उनकी बातों को अवैज्ञानिक बताकर मजाक उड़ाया और सवाल उठाया कि क्या भारत के प्रमुख संस्थानों में से एक के प्रमुख की ओर से ऐसी बातें कहना उचित है.
अपने बचाव में उन्होंने कहा कि पीयर-रिव्यू वाले जर्नल्स में प्रकाशित पांच वैज्ञानिक शोध-पत्र गाय के मूत्र के एंटी-इंफेक्टिव गुणों के दावों का समर्थन करते हैं. उन्होंने जिन अध्ययनों का ज़िक्र किया, उनमें रोहित कुमार और अन्य लोगों का “पेप्टाइड प्रोफ़ाइलिंग इन काऊ यूरिन रिवील्स मॉलिक्यूलर सिग्नेचर ऑफ़ फिजियोलॉजी-ड्रिवन पाथवेज़ एंड इन-सिलिको प्रेडिक्टेड बायोएक्टिव प्रॉपर्टीज़” शामिल था.
प्रोफ़ेसर कामाकोटी के अनुसार, यह अध्ययन हरियाणा के करनाल में ICAR-नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा किया गया था, 2021 में प्रकाशित हुआ था और ‘नेचर’ (Nature) पत्रिका में छपा था. उन्होंने ‘एशियन जर्नल ऑफ़ फार्मास्युटिकल रिसर्च’ सहित कई रिव्यू जर्नल्स का भी ज़िक्र किया.
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