

Sanskar Kyon Jaruri Hai: बेटी. बेटी परिवार, समाज और इस धरा की वह धुरी है, जिसके आसपास पूरा ‘जीवन’ घूमता है. बेटी एक शब्द नहीं पूरा संसार है. बेटी परिभाषा नहीं परवरदिगार का अवतार है. निराशा में उगते सूरज की किरण तो ढलती सांझ में सबेरा है बेटी. कुलदीपक और समाज की पतवार हैं बेटियां. आज जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां बेटियों ने अपनी प्रतिभा साबित नहीं की हो. फिर बात चाहे विज्ञान की हो या आध्यात्म की. हर जगह बेटियों ने अपनी बुद्धिमत्ता, कौशल से नए कीर्तिमान बनाए हैं. सृष्टि के आदिकाल लेकर अब तक जो भी धर्म-ग्रंथ, साहित्य लिखे गए हैं सभी में कहीं न कहीं बेटियां का गायन मिलता ही है. ऋग्वेद के 7-47-1 अध्याय में तो यहां तक लिखा है कि हे! स्त्री तुम सभी कर्मों को जानती हो. तुम हमें ऐश्वर्य और समृद्धि दो.
कन्याओं में क्यों है असुरक्षा की भावना?
बेटी जब छोटी होती है तो उसे कन्या, देवी का अवतार कहते हैं. कोई भी शुभ कार्य करने के पहले हम बेटी के हाथों से उसकी शुरुआत कराते हैं,ताकि वह सफल और फलदायी हो. उसे ईश्वर का वरदान और उपहार मानते हैं. परिवार का कुलदीपक और आंखों का तारा मानते हैं, लेकिन आज वही बेटी अपनों के बीच असुरक्षित महसूस कर रही है. आज बेटी के पांव घर की दहलीज से बाहर निकलने से पहले कांपते हैं. उसमें कहीं न कहीं असुरक्षा का भाव होता है.
क्या इस स्थिति के पीछे हम जिमेदार नहीं हैं? जिस देश और संस्कृति में बेटी को माता का दर्जा दिया गया है, वहां बेटियों के साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार? पांच वर्ष की मासूम तक के साथ ऐसा कृत्य, जो मानवता को ही शर्मसार कर दे, क्या ये मानवीयता पर प्रहार नहीं है? अपनी ही मां-बहन नजर आती हैं दूसरों की क्यों नहीं? क्यों बेटियों की सिसकियां और दर्द नजर नहीं आता है? आज जो पुरुष कर रहा है ऐसे कृत्यों का तो शास्त्रों में भी गायन नहीं है, क्या हम इतने गिर गए हैं? फिर पशु और इंसान में क्या भेद रह जाएगा? क्या हमारे कर्म व सोच दानवों से भी बद्तर नहीं हो गई है?
बचपन से ही बोएं संस्कार का बीज
ये वो सवाल हैं जो आज हर मन में कौंधते हैं. इसके लिए जरूरत है तो हमें अपने मानसिक प्रदूषण को दूर करने की. दुनिया में तमाम अपराधों की जड़ मानसिक विकृति ही है. इस विकृति या बीमारी को नैतिक शिक्षा, मूल्यशिक्षा, आध्यात्म और संस्कारों के शुद्धिकरण से ही दूर किया जा सकता है. इसके लिए हमें बेटा-बेटी को बचपन से ही ऐसे मूल्य और संस्कारों का बीजारोपण करना होगा ताकि वह किसी भी परिस्थिति में बच्चों को दीवार की तरह ढाल बनकर उनका मार्गदर्शन करें.
जीवन भर सही राह दिखाता है संस्कार
संस्कार परिवार की वह धुरी हैं जो ताउम्र राह दिखाते हैं. बच्चों को घर-परिवार में बचपन से ही अपनी मां-बहन की इज्जत करने, उनका समान करने और आदर भाव रखने की शिक्षा देना होगी. उनमें नारी के प्रति गौरव का भाव विकसित करना होगा. इसकी शुरुआत आपको, हमें अपनी घर से करना होगी. खुद के घर को संस्कारों का गुरुकुल और नैतिक शिक्षा की नर्सरी में तब्दील करना होगा. बच्चों के सामने बड़ों को भी अपनी मां-पत्नी के प्रति आदर और समान का भाव दर्शाना होगा. क्योंकि बच्चे घर-परिवार में जो देखते और सुनते हैं वहीं सीखते हैं. बचपन से जगाया जाए आत्म सम्मान का भाव…
…इसलिए जरूरी है संस्कार
आज हम बच्चों को भौतिक सुख-सुविधाएं तो मुहैया करा रहे हैं लेकिन संस्कारों की पूंजी जमा करने, उसे सजाने-संवारने पर जोर कम ही है. बच्चों को यदि भविष्य में श्रेष्ठ नागरिक का निर्माण करना है तो आज उनमें संस्कारों रूपी पूंजी का निवेश करना होगा. आज हम देखते हैं कि संपन्न परिवारों के बच्चे सबसे ज्यादा बुरी संगत या लत में पड़कर गलत दिशा में मुड़ जाते हैं. उन्हें बड़े होकर श्रेष्ठ नागरिक बनने, मूल्यनिष्ठ व्यक्तित्व बनाने पर जोर कम ही है.
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यदि बच्चे में आत्म समान का भाव, ईमानदारी, सदाचार, सच्चाई और सफाई के भाव बचपन से ही विकसित हो जाएंगे तो बड़े होकर विचारों का वह पौधा वटवृक्ष बन जाएगा. फिर कोई भी बुरी आदतें उसके संस्कार रूपी भवन को हिला नहीं सकेंगी. यदि एक-एक परिवार अपने बच्चों को संस्कारित करने का बीड़ा उठा ले तो फिर कोई बेटी की सिसकियां नहीं झकझोरेगीं. साथ ही समाज में फिर कोई बेटी के पांव घर से बाहर निकलने से पहले कांपे नहीं. हम बदलेंगे, हमें देखकर और बदलेंगे और एक दिन सारा विश्व बदल जाएगा.





