
काशी का लक्खा मेला: धर्म और परंपराओं की नगरी काशी में विजयादशमी के बाद नाटी इमली मैदान का माहौल पूरी तरह राममय हो गया. मौका था 400 साल से भी अधिक पुरानी परंपरा वाले ऐतिहासिक ‘भरत मिलाप’ मेले का. भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के इस अलौकिक मिलन के साक्षी बनने के लिए लाखों की संख्या में श्रद्धालु उमड़ पड़े.
छतों से लेकर मैदान तक आस्था का जनसैलाब
नाटी इमली का भरत मिलाप काशी के प्रसिद्ध ‘लक्खा मेलों’ में शुमार है. दोपहर से ही मैदान में तिल रखने की जगह नहीं बची थी. जिसे जहां जगह मिली पेड़ों की डालियों से लेकर आसपास के मकानों की छतों तक, लोग टकटकी लगाए प्रभु के दर्शन का इंतजार करते रहे. आयोजन में काशी नरेश के साथ शहर के कई गणमान्य लोग भी शामिल हुए.
ठीक शाम 4:40 बजे हुआ चारों भाइयों का मिलन
परंपरा के अनुसार, सूर्यास्त से ठीक पहले शाम 4:40 बजे का समय इस मिलाप के लिए तय रहता है. जैसे ही मैदान के दोनों छोर से बाल स्वरूप श्रीराम-लक्ष्मण और भरत-शत्रुघ्न दौड़कर एक-दूसरे के गले मिले, पूरा मैदान ‘सियावर रामचंद्र की जय’ और ‘हर-हर महादेव’ के उद्घोष से गूंज उठा. 14 वर्ष के वनवास के बाद चारों भाइयों के इस भावुक मिलन को देखकर वहां मौजूद श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं.
400 साल पुरानी जीवंत परंपरा
मान्यता है कि रावण वध के बाद जब भगवान राम अयोध्या लौटे, तब सबसे पहले भरत जी से उनका मिलन हुआ था. इसी पावन प्रसंग को जीवंत करती यह लीला काशी में सदियों से बिना रुके चली आ रही है. बनारस में कई जगहों पर भरत मिलाप होता है, लेकिन नाटी इमली के इस चंद मिनटों के दृश्य का आकर्षण ऐसा है कि इसे देखने दूर-दराज के जिलों से भी लाखों भक्त खिंचे चले आते हैं. इस बार भी पूरी भव्यता और परंपरा के साथ यह उत्सव संपन्न हुआ.
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