
मैं नेपाल की राजधानी काठमांडू में ‘NDTV वर्ल्ड अन्वीक्षा: आइडियाज अक्रॉस बॉर्डर्स’ के समिट में गई थी. यह भारत और नेपाल के रिश्तों पर केंद्रित एक खास कार्यक्रम था. मुझे यहां महज दो दिन बिताने थे. लेकिन इस दौरान मेरे मन अजीब सी खुशी थी. वजह यह थी कि मुझे नेपाली सिनेमा के ‘महानायक’ कहे जाने वाले राजेश हमाल से मिलने का मौका मिल रहा था. लोग उन्हें नेपाल का अमिताभ बच्चन भी कहते हैं. एक सेशन के दौरान मुझे उनके साथ मंच भी साझा करनी थी.
ये सारी बातों के बीच मैं काठमांडु लैंड कर गई और फिर समिट की तैयारी में जुट गई. उस वक्त करीब सुबह के साढ़ें ग्यारह हो रहे होंगे जब मेरे एक नेपाली जर्नलिस्ट दोस्त ने कॉल किया और बताया कि नेपाल में कहीं लैंडस्लाइड हुआ है. हालांकि पहले तो मुझे यही लगा कि ये कोई पहाड़ों में घटने वाली मामूली घटना होगी.
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लेकिन करीब एक घंटे बाद जब और खबरें छन-छनकर आने लगीं, तो मुझे समझ आ गया कि मामला मेरी सोच से कहीं ज्यादा गंभीर है. तब मेरे भीतर का रिपोर्टर मन ये कहने लगा कि मुझे कमरे में बैठने की बजाय खुद ग्राउंड जीरो पर जाकर हालात को देखना चाहिए. मैंने बिना देर किए नोएडा स्थित अपने दफ्तर में फोन घुमाया और कहा कि मैं इस तबाही से प्रभावित इलाके में जाना चाहती हूं.
मेरी कैमरामैन पूजा आर्य और मैं अपने स्थानीय ड्राइवर को मनाने में जुटे थे कि वो हमें बाढ़ के सबसे करीबी इलाके तक ले चले. हालांकि वो राजी नहीं हो रहा था, उसे डर था. लेकिन काफी समझाने-बुझाने के बाद आखिरकार वो मान गया. जब हम काठमांडू की सड़कों से निकले, तो बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी. नुवाकोट तक का सफर आम दिनों में तीन घंटे का माना जाता था.
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हम अपने साथ कोई भारी-भरकम टीवी कैमरे नहीं लाए थे, क्योंकि हम तो एक समिट के लिए आए थे जहां फील्ड रिपोर्टिंग के सामान की जरूरत ही नहीं थी. मेरे पास बस मेरा मोबाइल फोन था और मेरी कैमरामैन के पास भी उसका फोन ही था. जैसे-जैसे बारिश तेज और खौफनाक होती गई, नुवाकोट के मोड़ पर लगी आर्मी की नाकेबंदी ने मुझे यह यकीन दिला दिया कि यह तबाही मेरी उम्मीद से कहीं ज्यादा बड़ी और खतरनाक है.
उस इलाके में मोबाइल नेटवर्क बेहद खराब था. हमने जल्दी-जल्दी कुछ वीडियो बनाए, चश्मदीदों के बयान दर्ज किए और किसी तरह उन्हें दिल्ली दफ्तर को भेज दिया. सबसे बड़ी चुनौती लगातार हो रही बारिश और गहराता अंधेरा था. हर तरफ मलबे, कीचड़ और गाद का ढेर था. इसकी वजह से आगे बढ़ना दूभर हो रहा था. हादसे को अपनी आंखों से देखने वाले लोग अभी भी खौफ और सदमे में थे.
26 अगस्त के दिन नेपाल के इस तबाही भरे ‘ग्राउंड जीरो’ पर पहुंचने वाला NDTV पहला विदेशी मीडिया चैनल था. बारिश में पूरी तरह भीग चुके थे और हमारे फोन पर बार-बार अलर्ट बज रहा था कि कि उसके भीतर पानी जा चुका है, फिर भी हम नुवाकोट में देर रात तक डटे रहे और रिपोर्टिंग करते रहे.
उस रात, जब हम पानी पीने के लिए एक छोटी सी चाय की दुकान पर रुके, तो मेरी मुलाकात एक युवा कपल से हुई. सैलाब की वजह से उनका घर पूरी तरह डूब चुका था और वो अपने पूरे परिवार से बिछड़ गए थे. मैंने उनसे बातचीत रिकॉर्ड की. उन्होंने मुझसे वादा किया कि अगली सुबह उजाला होते ही वो मुझे अपने गांव त्रिशूली ले चलेंगे.
हम इस बात के लिए दिमागी तौर से तैयार थे कि रात भर गाड़ी में ही सो जाएंगे और सुबह होते ही अपना काम फिर शुरू कर देंगे. लेकिन हमारे फोन की बैटरियां खत्म हो रही थीं और हमें सूखे कपड़ों की सख्त जरूरत थी. इसलिए, हम तीन घंटे की वापसी करके वापस काठमांडू आए, कपड़े बदले, लाइव टेलीकास्ट के गैजेट्स उठाए और अगली ही सुबह उसी कपल के साथ फिर निकल पड़े. बता दें कि इस कपल ने पूरी रात उस चाय की दुकान पर काटकर गुजारी थी.
सड़कें पानी के तेज बहाव में बह चुकी थीं. वो जोड़ा हमें एक ऐसे कच्चे रास्ते से ले गया जहां चारों तरफ घास, कीचड़ और फिसलन भरी ढलानें थीं. शुक्र था कि हमारे साथ एक निडर और हिम्मती ड्राइवर था जो वहां के रास्तों से अच्छी तरह वाकिफ था.
बिधुर से ऊपर चढ़ने में हमें एक घंटा और लग गया. इसके बाद एक बार फिर, NDTV पहला ऐसा न्यूज चैनल बना जो त्रिशूली के उस ऐतिहासिक बाजार तक पहुंचने में कामयाब रहा. वहां सब कुछ पानी में समा चुका था. बस एक हरे रंग का मकान अपनी जगह पर सीना ताने खड़ा था. वो मकान अब सोशल मीडिया पर वायरल हो चुका है और लोग उसे इंसानी कारीगरी का अनोखा अजूबा मान रहे हैं.
जब हम वहां शूटिंग कर रहे थे, तो हमारे ड्राइवर ने एक शख्स की तरफ इशारा करते हुए कहा, “इनसे मिलिए, इन्होंने ही इस हरे मकान से लोगों की जान बचाई थी.”
मैंने उस जांबाज़ इंसान से एक बातचीत रिकॉर्ड की. वहीं मेरी मुलाकात एक ऐसे ज़मींदार से भी हुई जिसके त्रिशूली बाजार में पांच बड़े मकान थे. अब वो सारे मकान मलबे के ढेर में बदल चुके थे. न पहनने के लिए कपड़े बचे थे, न खाने के लिए निवाला. वो बेबस होकर हमारी आंखों के सामने फूट-फूटकर रो पड़ा.
‘अंकल, बचा लो’
इस दौरान मेरी मुलाकात भारतीय मूल के दो दुकानदारों से भी हुई. दोनों की दुकानें तबाही की भेंट चढ़ चुकी थीं. उनमें से एक ने अपनी पत्नी और मासूम बेटे को भी खो दिया था. दूसरे दुकानदार ने रोते हुए बताया कि उसने केले के पेड़ को कसकर पकड़ लिया और किसी तरह अपनी जान बचाई. लेकिन वो रात भर सो नहीं पा रहा था, क्योंकि उसकी आंखों के सामने उसके पड़ोसी का बेटा उससे मदद की गुहार लगा रहा था. लेकिन वो उस बच्चे को थाम न सका और उस मासूम का हाथ उसकी उंगलियों से फिसल गया.
एक बार फिर, NDTV की टीम मानसरोवर रोड पर पहुंचने वाली पहली मीडिया क्रू बनी. हमने वहां से अपनी रिपोर्टें भेजीं. रास्ते में हमने देखा कि रेस्क्यू टीम नदी के किनारे से लाशों को निकालने में जुटा हुआ था. हमने उस खौफनाक फ्लैश फ्लड यानी अचानक आई बाढ़ के भयानक रूप को अपनी आंखों से देखा.

पानी के तेज़ थपेड़ों ने एक पूरी पहाड़ी को तोड़कर रख दिया था और वो मलबा सीधे सड़क पर आ गिरा था. इससे पूरी सड़क ही बह गई थी. हमने अपनी सारी खबरें और फुटेज जुटाए और बिधुर के एक ऐसे इलाके की तरफ भागे जहां थोड़ा बहुत नेटवर्क आ रहा था, ताकि अपनी स्टोरीज भेज सकें. चूंकि इन तबाह इलाकों में रात बिताने के लिए कोई सुरक्षित जगह नहीं बची थी, इसलिए हमें अपने फोन और कैमरों को चार्ज करने के लिए एक बार फिर काठमांडू ही लौटना पड़ा.
तीसरा दिन
तीसरे दिन, चीन की तरफ से एक और बाढ़ का अलर्ट जारी हो गया. हम तुरंत त्रिशूली की तरफ वापस भागे ताकि यह जान सकें कि इस नई चेतावनी के बाद आपदा के मारे लोग कितनी तैयारी में हैं. रास्ते में, हमने सेना का एक हेलिपैड देखा जहां कई परिवार लगातार तीसरे दिन इस उम्मीद में टकटकी लगाए बैठे थे कि शायद उनके अपने उन हेलिकॉप्टरों से जिंदा बाहर निकल आएंगे. एक तरफ त्रिशूली का बाजार पूरी तरह वीरान पड़ा था, वहीं राहत के इंतजार में बैठे पीड़ित परिवारों ने एहतियात के तौर पर ऊंचे पहाड़ों की तरफ अपना ठिकाना बना लिया था. वो पूरा इलाका किसी भूतहा कस्बे की तरह लग रहा था. यानी चारों तरफ सिर्फ मलबा ही मलबा था और जो मकान किसी तरह बच गए थे, उन पर ताले लटके हुए थे.
वहां मेरी मुलाकात ‘मैया तमांग’ नाम की एक बुजुर्ग महिला से हुई. उन्होंने अपना घर छोड़ने से साफ इनकार कर दिया था. उनका कहना था कि अब जो हमारी किस्मत में लिखा होगा, वही होगा.
उन्होंने भारी मन से कहा, “मैं अपने बीमार और बिस्तरा धरे पति को छोड़कर कहीं नहीं जा सकती. वो चल-फिर भी नहीं सकते. जब हम इस भयानक बाढ़ से बच गए, तो देखते हैं कि आने वाली यह नई बाढ़ हमारा क्या बिगाड़ती है.”
उनके जुबान से यह बात सुनना बेहद दर्दनाक था. नेटवर्क की समस्या फिर आड़े आ रही थी, इसलिए अपनी रिपोर्ट भेजने के लिए हमें एक बार फिर बिधुर जाना पड़ा. ये यहां से एक घंटे की दूरी पर था.
बिधुर पहुंचकर हमारी मुलाकात कुछ नौजवानों से हुई जो पास की ही एक दुकान से राशन का सामान खरीद रहे थे. उन्होंने हमसे गुजारिश की कि क्या हम अपनी गाड़ी से उनकी थोड़ी सी मदद कर सकते हैं. वो पास के एक स्कूल तक पहुंचना चाहते थे जहां लगभग 100 लोगों ने शरण ले रखी थी और उनके पास न तो खाने के लिए दाना था और न पीने के लिए पानी. हम तुरंत तैयार हो गए. हमने उनका सारा सामान अपनी गाड़ी में लादा और उस राहत शिविर की तरफ ऊपर की ओर चढ़ने लगे. तब तक सूरज ढल चुका था और जब हम वहां पहुंचे, तो चारों तरफ घना और सियाह अंधेरा फैला था. उन इलाकों में बिजली की व्यवस्था अभी तक बहाल नहीं हो सकी थी.
जैसे ही मैंने उस स्कूल में कदम रखा, मुझे बताया गया कि यहां 14 साल का एक बच्चा है जिसने इस पूरी तबाही का मंजर अपनी आंखों से देखा है. जब मैंने उससे हाल-चाल पूछा, तो दर्द के बावजूद उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ गई. मैं उसके माथे, हाथों और पैरों पर चोट के निशान साफ देख सकती थी. उसने हिम्मत से कहा, “हां, मैं कैमरे पर बात करूंगा. मैं उस पल को कभी भूल नहीं सकता, वो मेरे लिए किसी बुरे सपने जैसा था.”
उसने मुझे बताया कि उसकी 6 साल की छोटी बहन भी इस तबाही में बच गई है, लेकिन उसका घुटना टूट गया है. वो दौड़कर गया और अपनी बहन को गोद में उठाकर मेरे पास ले आया. छोटी सी स्वस्तिका मुझे देखकर मुस्कुरायी और सबसे पहले मेरा नाम पूछा. इससे पहले कि मैं उससे कोई सवाल करती, उसने मासूमियत से मुझसे ही सवालों की झड़ी लगा दी कि आपके कितने बच्चे हैं? आपकी उम्र कितनी है? आप कहां से आई हैं? और आपकी कैमरामैन का नाम क्या है?
हम तीनों उस अंधेरे में एक साथ जमीन पर बैठ गए और देर तक बातें करते रहे. उस दिन असल में क्या हुआ था, उनके स्कूल के मास्टर साहब ने किस तरह अपनी जान पर खेलकर उन्हें मलबे से बाहर निकाला था, उन्होंने कैसे अपनी आँखों के सामने दूसरे मासूम बच्चों को पानी के तेज बहाव में बहते देखा था और यह कि बड़ा होकर वो एक मशहूर फुटबॉलर बनना चाहता है.
उस मनहूस दिन उनके मां-बाप उनके साथ नहीं थे, वे दर्शन करने के लिए गोसाईं कुंड गए हुए थे. पहले दिन तो मास्टर साहब ने ही उन बच्चों को संभाला. अगले दिन जाकर कहीं उनके माता-पिता उनसे मिल पाए.
मेरा दिल गहरी संवेदनाओं से भरा हुआ था और घर पर मौजूद अपने बच्चों की यादें जेहन में तैर रही थीं. उसी भारी मन से मैं उस रात वापस काठमांडू की तरफ लौट गई.
चौथा दिन
अब तक मेरे दफ्तर के अन्य साथी भी नेपाल पहुंच चुके थे और अलग-अलग प्रभावित इलाकों में फैल गए थे. चूंकि मैं उन सभी जगहों से अपनी एक्सक्लूसिव रिपोर्टें पहले ही भेज चुकी थी और पहले ही दिन से ग्राउंड पर डटी अकेली टीवी पत्रकार थी, इसलिए मैंने अब ‘रसुवा’ इलाके की तरफ बढ़ने का फैसला किया. मेरा ड्राइवर इस बात से बिल्कुल खुश नहीं था.
उसने हाथ जोड़कर कहा कि आगे कोई रास्ता ही नहीं बचा है. पर मैंने जिद की, ‘चलो चलकर देखते हैं तो सही.’
नेपाल सरकार का दावा था कि राहतकर्मियों के लिए एक वैकल्पिक रास्ता तैयार किया गया है. इसलिए हमने उस रास्ते पर अपना किस्मत आजमाया. हम रसुवा की तरफ आगे बढ़ने लगे. हमें खुद नहीं पता था कि रास्ता कहां जाएगा. हर मोड़ और चौराहे पर हम गाड़ी रोकते, राहगीरों से रास्ता पूछते और उसी बताए रास्ते पर आगे बढ़ चलते. यह सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक हम पहाड़ों की तरफ ऊपर चढ़ती एक बेहद संकरी और कच्ची सड़क पर नहीं पहुंच गए. ऊपर से नीचे आ रहे बाइक सवारों ने हमें रोककर आगाह किया, “यह रास्ता रसुवा ही जाता है, लेकिन यहां से पहुँचने में आठ घंटे लग जाएंगे. अगर आपकी गाड़ी फोर-व्हील ड्राइव नहीं है और आपका ड्राइवर बहुत तजुर्बेकार नहीं है, तो ऊपर जाने की भूल मत करना.’
गाड़ी और ड्राइवर के मामले में तो हम पूरी तरह तैयार थे, लेकिन हम उस लंबे, खतरनाक और रोंगटे खड़े कर देने वाले सफर के लिए दिमागी तौर पर तैयार नहीं थे. गाड़ी में खाने-पीने का कोई सामान नहीं था. बस पानी की दो बोतलें थीं. हमें लगा था कि हम जल्दी पहुंच जाएंगे और खाने का इंतजाम हो जाएगा. लेकिन हम गलत थे.
हम रात 10 बजे तक बिना रुके आगे बढ़ते रहे. आखिरकार, हम ‘कलिका’ नाम के एक छोटे से कस्बे में पहुंचे, जो पूरी तरह अंधेरे में डूबा हुआ था. हमें रात बिताने के लिए एक छत की दरकार थी. चाय की एक छोटी सी दुकान वाले ने मेहरबानी दिखाई और हमें रहने के लिए एक कमरा दे दिया.
एक बार फिर, NDTV पूरी दुनिया का पहला ऐसा मीडिया नेटवर्क बना जो रसुवा तक पहुंचने में कामयाब रहा.
पांचवा दिन
रात भर मूसलाधार बारिश होती रही, मानो आसमान से बादल फट पड़े हों. फोन चार्ज करने के लिए बिजली नहीं थी और बाढ़ की चेतावनियों के बीच वो खौफनाक रात और भी लंबी लग रही थी. सुबह का उजाला हुआ और हम बाहर निकल आए. जब हमने आपस में बात की तो पता चला कि रात भर कोई भी नहीं सो सका था, न मेरी कैमरामैन पूजा, न हमारा ड्राइवर संतोष.
सुबह-सुबह जब हम बेत्रावती बाजार की तरफ बढ़ रहे थे, तो जो पहला स्थानीय व्यक्ति हमें मिला, उसने बताया कि तड़के 4:30 बजे से इलाके का कोई भी इंसान सो नहीं पाया है. कड़कती बिजलियों और बादलों ने पूरे मोहल्ले के मन में खौफ भर दिया था.
बेत्रावती बाजार की पहली एक्सक्लूसिव तस्वीरें दुनिया के सामने लाते हुए मुझे अहसास हुआ कि इस त्रासदी की गहराई और इसके दर्द का कोई अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. यह हमारी कल्पना से कहीं ज्यादा खौफनाक था.
सबसे पहले ग्राउंड जीरो पर पहुंचने का एक फायदा यह हुआ कि मुझे दूसरों के आने से पहले लोगों और लोकेशन तक सीधी पहुंच मिल गई. लेकिन मैंने इस बात का पूरा ध्यान रखा कि मैं किसी के व्यक्तिगत दुख और दर्द में दखल न दूं. मेरी पहली प्राथमिकता तबाही के इस भयानक मंजर को दिखाना था और मैं पीड़ितों से तभी बात करती थी जब वे खुद अपनी आपबीती सुनाने में सहज महसूस करते थे.
वहां मेरी मुलाकात बेत्रावती बाजार के पास रहने वाली एक महिला से हुई जो कपड़े सिलने का काम करती थी. मुझसे बात करते हुए उसके आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. उसने रोते हुए कहा, “मेरा घर सलामत है, मेरे पति भी ठीक हैं. लेकिन मैं यहां नहीं रह सकती, नदी के भयानक बहाव से मेरा पूरा घर कांप रहा है. मेरे सारे पड़ोसी पानी में बह गए, उनके मकान जमींदोज हो गए. अब मैं इस वीराने में अकेली कैसे रहूं?”
हमारा अगला पड़ाव एक स्कूल था जहां बाढ़ से बचाए गए 100 से ज्यादा मासूम बच्चों ने शरण ले रखी थी. स्कूल के प्रिंसिपल ही अब उनके रखवाले और गार्जियन भी थे, क्योंकि इनमें से कई बच्चों के सिर से इस अचानक आई बाढ़ ने उनके मां-बाप का साया छीन लिया था. जब ये बच्चे स्कूल में पढ़ाई कर रहे थे, तभी पीछे से सैलाब उनके घरों और मां-बाप को बहाकर ले गया. अब यह स्कूल ही उनका इकलौता घर बन चुका था.
हमारी टीम के लिए रसुवा से रिपोर्टिंग करना किसी चुनौती से कम नहीं था. तबाही से प्रभावित जगहों तक तेजी से पहुंचना बेहद मुश्किल था, क्योंकि ज्यादातर सड़कें या तो टूट चुकी थीं या पूरी तरह बह गई थीं. नेटवर्क बेहद खराब था और बिजली की सप्लाई अभी तक शुरू नहीं हो पाई थी.
स्कूल का दौरा करने के बाद, हम धुनचे की तरफ बढ़े और फिर उस चीन-तिब्बत सीमा की ओर चले जहां से तबाही का यह सैलाब नेपाल में दाखिल हुआ था. पहाड़ों का वो घुमावदार और लंबा सफर फिर से एक बड़ी परीक्षा ले रहा था. आखिरकार हम उस जगह पहुंचे जिसे ’12 मोड़ी सड़क’ कहा जाता है कि एक ऐसी सड़क जो पहाड़ पर 12 बार खतरनाक तरीके से घूमती है.
और फिर NDTV के नाम एक और बड़ी उपलब्धि दर्ज हुई.

हम नेपाल-तिब्बत सीमा के सबसे करीबी और सुलभ बिंदु तक पहुंचने वाले पहले मीडिया क्रू बने. हमने नेपाल की अंतिम बस्तियां स्याफ्रुबेसी और तिमुरे बाजार में हुई भारी तबाही को अपने कैमरों में रिकॉर्ड किया. NDTV इकलौता ऐसा न्यूज नेटवर्क था जो इस भीषण संकट के वक्त नेपाल की सबसे दूर दराज और खतरनाक सरहद तक पहुंच सका.
हमारा मकसद बिल्कुल साफ था- दुनिया को यह दिखाना कि नेपाल इस वक्त कितनी बड़ी और दर्दनाक त्रासदी से जूझ रहा है.
छठा दिन
हमने वो रात धुनचे में गुजारी. कलिका की गुजरी रात के मुकाबले यहां थोड़ी सहूलियत थी. यह पहाड़ों पर बसा एक छोटा सा कसबा है जो नेशनल पार्क के करीब है, इसलिए यहां छोटे होटल के कमरे आसानी से मिल गए. बस चुनौती वही पुरानी थी बिजली का न होना. लेकिन वहां के स्थानीय लोगों ने अपनी तकलीफों का कभी रोना नहीं रोया.
उन्होंने चेहरे पर मुस्कान के साथ हमारा स्वागत किया. होटल के मालिक पति-पत्नी ने अंधेरी रसोई में महज एक तेल का दीया जलाकर हमारे लिए खाना बनाया, क्योंकि उस वक्त वहां न मोमबत्ती उपलब्ध थी और न ही टॉर्च.
सुबह की शुरुआत सायरन और हेलिकॉप्टरों की आवाजों के साथ हुई. हम तुरंत दौड़कर पास के हेलिपैड पर पहुंचे. स्याफ्रु और तिमुरे से बरामद की गई लाशों को हेलिकॉप्टर के जरिए लाया जा रहा था. साथ ही, उन दूर-दराज के गांवों के लिए राहत सामग्री भी एयरड्रॉप करने के लिए भेजी जा रही थी. इनका संपर्क सड़कें टूटने के कारण पूरी दुनिया से कट चुका था.
वहां मेरी मुलाकात कुछ छोटे बच्चों और नौजवानों से हुई जिन्हें 6 दिनों की कड़ी मशक्कत के बाद बचाकर धुनचे लाया गया था. उन्होंने हमें उस मनहूस सुबह की दास्तान सुनाई और मलबे के नीचे दबी लाशों की गंध और उस खौफनाक मंजर का जिक्र किया. मुश्किल हालात ने उन बच्चों को वक्त से पहले मैच्योर और मजबूत बना दिया था. उनकी आंखों में आंसू नहीं थे, बस कड़वी हकीकत का सामना करने का एक अटूट हौसला था.
यह NDTV के लिए एक और अभूतपूर्व सफलता थी. तिब्बत से नेपाल में घुसी तबाही के उस खौफनाक मंजर की सबसे करीबी तस्वीरें लाने वाले हम इकलौते मीडियाकर्मी थे. पुल और सड़कें बह चुकी थीं. पुलिस चौकियां, कस्टम दफ्तर, होटल और रेस्टोरेंट सब कुछ पानी के नीचे समा चुके थे. रास्ते के उस आखिरी छोर पर ‘चिलिमे हाइड्रो प्रोजेक्ट’ की सुरंग थी, जहां राहत और आपदा प्रबंधन के कार्यकर्ता सुरंग को खोलने के लिए दिन-रात (24/7) काम में जुटे हुए थे. हमने देखा कि हेलिकॉप्टरों के जरिए बड़े-बड़े उपकरण और जनरेटर नीचे उतारे जा रहे थे.
दुनिया भर के मीडिया के लिए यह NDTV का एक बड़ा और ऐतिहासिक एक्सक्लूसिव कवरेज था.





