
नई दिल्ली:
राजधानी दिल्ली में यमुना के किनारे तिरपाल से बनी एक छोटी-सी बस्ती इन दिनों राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनी हुई है.इस बस्ती का नाम है बेला एस्टेट. पिछले चुनाव में इस बेला एस्टेट में 728 मतदाताओं के नाम दर्ज थे. लेकिन दिल्ली की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में इनमें से केवल एक व्यक्ति का नाम शामिल है. चुनाव आयोग का कहना है कि बाकी मतदाताओं के नाम जांच के बाद अनुपस्थित, दूसरी जगह चले गए, डुप्लीकेट या मृत की श्रेणी में डाल दिए गए हैं. लेकिन बस्ती के लोग आयोग के इस कदम से सहमत नहीं हैं. उनका कहना है कि वे अब भी यहीं रह रहे हैं और 2025 के चुनाव में भी उन्होंने यहीं से वोट दिया था.
क्या पुरानी वोटर लिस्ट में है नाम
बेला एस्टेट में रहने वालों का कहना है कि चुनाव आयोग मतदाताओं के नामों का मिलान 2002 की वोटर लिस्ट से कर रहा है. उनके नाम उस पुरानी सूची में भी मौजूद हैं. उनके लिए यह सिर्फ वोटर लिस्ट का मामला नहीं है, बल्कि इससे एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि क्या सरकार अब भी इस बस्ती में रहने वाले लोगों को दिल्ली का नागरिक और मतदाता मानती है. इस जगह पर वो कई सालों से रह रहे हैं और वोट देते आए हैं?
वोटर लिस्ट से नाम काटे जाने से बस्ती के लोगों में काफी नाराजगी है. उनका कहना है कि उनके नाम वोटर लिस्ट में बने रहने चाहिए. उन्हें डर है कि नाम हटाए जाने का इस्तेमाल यह दिखाने के लिए किया जा सकता है कि वे हाल ही में दिल्ली आए हैं, जबकि वे लंबे समय से यहां रह रहे हैं.
बेला एस्टेट की रहने वाली पूजा को लगता है कि इस पूरी प्रक्रिया का अंतिम मकसद उन्हें वहां से हटाना हो सकता है. उन्होंने कहा,” उन्होंने पहले ही हमारी पहचान और हमारे घर छीन लिए हैं. अगर यह हमें दोबारा यहां से हटाने की साजिश हुई तो? वे कहेंगे कि हम 2026 के बाद यहां आए और नए मतदाता हैं. इस तरह कई चुनावों में, यहां तक कि 2025 में भी वोट देने के बावजूद हमें वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया जाएगा.”
वहीं मालूदा नाम के बेला एस्टेट के निवासी ने कहा कि वे लोग पहले से ही बुनियादी सुविधाओं और सुरक्षा के बिना रह रहे हैं. उन्होंने कहा,”हमारे पास जाने के लिए कोई जगह नहीं है. कोई जगह नहीं, यहां तक कि शौच करने के लिए भी जगह नहीं है. अगर हमारी पहचान ही मिटा दी गई तो हम कहां जाएंगे?”

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बेला एस्टेट में कितने सालों से रह रहे हैं लोग
अम्मा नाम से जानी जाने वाली एक महिला 80 साल की हैं. उनका कहना है कि उनके परिवार की चार पीढ़ियां बेला एस्टेट में रह चुकी हैं. उन्होंने सवाल किया,”फिर हमारे वोट क्यों हटा दिए गए?” बेला एस्टेट में रहने वाले कमल पेशे से शिक्षक हैं. उनका कहना है कि इस बस्ती के लोग लगातार यहीं से वोट देते आए हैं. उनका कहना है कि उन लोगों के नाम पहले की वोटर लिस्ट में भी रहे हैं. उन्होंने कहा,”हम शुरू से यहीं से वोट देते आए हैं. 2002 की लिस्ट में भी हमारे नाम हैं और 2025 की लिस्ट में भी थे. चुनाव आयोग ने इस इलाके का सर्वे किया था और बीएलओ भी यहां आए थे. 550 फॉर्म जमा किए गए. इसके बावजूद हमारे वोट दर्ज नहीं हैं.”
वहीं चुनाव आयोग का कहना है कि ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से गायब नामों को जांच की प्रक्रिया के बाद अनुपस्थित, दूसरी जगह चले गए, डुप्लीकेट या मृत श्रेणी में रखा गया है. दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने कहा है कि बेला एस्टेट के मतदाताओं के नाम जांच के बाद ‘ASDD’ यानी Absent, Shifted, Dead or Duplicate श्रेणी में रखे गए हैं.
यह विवाद सामने आने के बाद दिल्ली के सीईओ कार्यालय ने कहा कि संबंधित निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी इस मामले को पहले ही देख चुके हैं. कार्यालय ने यह भी कहा कि दिल्ली में दावे और आपत्तियां दाखिल करने की समय सीमा 30 अक्टूबर 2026 तक बढ़ा दी गई है. अगर किसी योग्य मतदाता का नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में नहीं है, तो वह फार्म-6 भरकर अपना नाम जुड़वा सकता है.
दिल्ली सीईओ कार्यालय ने अलग से यह भी स्पष्ट किया है कि ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में नाम नहीं होने का मतलब यह नहीं है कि मतदाता को हमेशा के लिए वोटर लिस्ट से बाहर कर दिया गया है. जिन योग्य मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट लिस्ट में नहीं हैं, वे दावे और आपत्तियों की अवधि के दौरान फार्म-6 के जरिए अपना नाम शामिल कराने की मांग कर सकते हैं. वहीं ‘ASDD’ सूची में यह बताया जाता है कि किसी व्यक्ति का नाम ड्राफ्ट लिस्ट में क्यों नहीं है.लेकिन बेला एस्टेट के लोगों के लिए मामला सिर्फ एक और फॉर्म भरने का नहीं है. उनका कहना है कि उनके नाम सालों से वोटर लिस्ट में रहे हैं. वे कई चुनावों में अपने वोट का इस्तेमाल कर चुके हैं.बेला एस्टेट के लोग सवाल उठाते हैं कि अब उन्हें खुद को ‘नया’ मतदाता साबित करने की जरूरत क्यों पड़ रही है?
राहुल गांधी के दौरे के बाद से हो रही है राजनीति
राहुल गांधी के बेला एस्टेट दौरे के बाद इस विवाद ने राष्ट्रीय राजनीतिक रूप भी ले लिया है. गांधी ने स्पेशल इंटेसिव रिवीज़न (एसआईआर) की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए इसे ‘वोटर चोरी’ कहा है. उनका तर्क है कि अगर सही मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जाते हैं तो इससे चुनाव प्रक्रिया प्रभावित होती है.राहुल गांधी के दौरे के बाद एसआईआर को लेकर चल रही राजनीतिक बहस और तेज हो गई है. लेकिन बेला एस्टेट में रहने वाले लोगों के लिए यह विवाद अभी भी बेहद स्थानीय और सीधे उनके जीवन से जुड़ा हुआ है. वे जानना चाहते हैं कि जिन लोगों के नाम सालों से वोटर लिस्ट में थे, उनके नाम अचानक क्यों गायब हो गए?
बेला एस्टेट के लोग 2002 की वोटर लिस्ट, अपने पुराने वोट और बस्ती में लगातार रहने के दस्तावेज दिखा रहे हैं. उनका कहना है कि ये सभी सबूत बताते हैं कि वे कहीं गायब नहीं हुए हैं और न ही उन्होंने बस्ती छोड़ी है. अब सवाल यह है कि क्या इन लोगों के दावे अंतिम वोटर लिस्ट में दर्ज किए जाएंगे? और क्या यमुना के किनारे तिरपाल के नीचे रहने वाले इन लोगों की उस शहर में राजनीतिक पहचान बनी रहेगी, जिसे वे सालों से अपना घर बताते आए हैं?
बेला एस्टेट के एक अन्य निवासी ने अपने जमीन से जुड़े दस्तावेज दिखाते हुए कहा,”यह हमारी जमीन है. वे हमें यहां से हटाने की कोशिश कर रहे हैं. हमारे पास सभी दस्तावेज हैं. सरकारें आती-जाती रहीं. उन्होंने हमें घर देने का वादा किया, लेकिन हमें यहीं छोड़ दिया. लेकिन पहली बार हमारे नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं. ऐसा लगता है कि वे हमारी पहचान ही मिटाना चाहते हैं.”
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