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46 सालों से दिल टूटे आशिकों का सहारा है ये गाना, लता मंगेशकर की आवाज, आनंद बख्शी के बोल ने बनाया आइकॉनिक ब्रेकअप सॉन्ग | 46 year old breakup song sheesha ho ya dil ho still heals broken hearts lata mangeshkar voice anand bakshi lyrics made it cult evergreen



नई दिल्ली:

प्यार हमेशा मिल जाए ऐसा जरूरी नहीं होता है. हिंदी सिनेमा में भी अधूरी मोहब्बत पर कई फिल्में बनी हैं. जिसमें दो लोग एक-दूसरे से प्यार करने के बाद भी एक साथ नहीं रह पाते हैं. अपने प्यार को कभी दूसरे की खुशी के लिए कुर्बान करना पड़ता है. आज हम एक ऐसी ही कहानी की बात करेंगे जो 46 साल पहले पर्दे पर दिखाई गई थी. जिसमें प्यार, बिछड़ना और उसका दर्द फिल्म के एक गाने में आज भी महसूस किया जाता है. इस कहानी में एक लड़की की मोहब्बत पूरी नहीं हो पाती है, लेकिन वो अपने प्यार को पाने की जिद की बजाय एक ऐसा कदम उठाती है, जो उसके दिल को तोड़ देता है. इसके बाद इस दर्द को महसूस करते हुए वो एक ऐसा गाना गाती है, जिसके बोल आज भी टूटे दिलों की आवाज बने हुए हैं. 

मोहब्बत के लिए अपने प्यार को करना पड़ा कुर्बान

ये कहानी है साल 1980 में रिलीज हुई फिल्म ‘आशा’ की. फिल्म का निर्देशन जे. ओम प्रकाश ने किया था, फिल्म में जितेंद्र ने दीपक, रीना रॉय ने आशा और रामेश्वरी ने माला का किरदार निभाया था. फिल्म की कहानी में दीपक और माला एक दूसरे से प्यार करते हैं, लेकिन कुछ वजहों से दोनों दूर हो जाते हैं. इसके बाद आशा, दीपक की जिंदगी में आती है और दोनों करीब आ जाते हैं. दोनों एक दूसरे के साथ शादी करने वाले होते हैं, तभी माला अपनी बेटी के साथ वापस आ जाती है. आशा को जब ये पता लगता है तो वो अपनी शादी को रोककर दीपक को अपनी फैमिली के साथ जाने के लिए कहती है.

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लता मंगेशकर की आवाज में दर्द की कहानी

फिल्म के इसी मोड़ पर एक गाना सुनाई देता है, ‘शीशा हो या दिल हो, आखिर टूट जाता है’. इस गाने को लता मंगेशकर ने अपने सुरों से बांधा, गाने के बोल आनंद बख्शी ने लिखा था और इसका संगीत तैयार किया था फेमस संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने. इस गाने की खासियत सिर्फ इसका संगीत ही नहीं, बल्कि इसके बोल भी हैं. गाने के बोल इस प्रकार हैं-

शीशा हो या दिल हो आख़िर टूट जाता हैलब तक आते आते हाथों से साग़र छूट जाता हैकाफ़ी बस अरमान नहीं, कुछ मिलना आसान नहीं दुनिया की मजबूरी है, फिर तकदीर ज़रूरी हैये दो दुश्मन हैं ऐसे, दोनो राज़ी हो कैसेएक को मनाऊँ तो, दूजा रूठ जाता हैबैठे थे किनारे पे, मौजों के इशारे पेहम खेले तूफ़ानों से, इस दिल के अरमानों सेहमको ये मालूम न था, कोई साथ नहीं देतामाँझी छोड़ जाता है, साहील छूट जाता है

46 साल बाद भी क्यों खास है यह गाना?

फिल्म ‘आशा’ का ये गाना रिलीज के समय ही काफी लोकप्रिय हो गया था. साल 1980 की बिनाका गीतमाला की साल 1980 की लिस्ट में इसे तीसरा स्थान मिला था. आज भी जब पुराने हिंदी गानों और दर्दभरे नगमों की बात होती है, तो ‘शीशा हो या दिल हो’ का जिक्र जरूर आता है. लता जी की आवाज, आनंद बख्शी के बोलों ने इसे ऐसी पहचान दी जो 46 सालों बाद भी लोगों के दिलों को छू जाता है. 





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