
Pithori Amavasya 2026: भाद्रपद अमावस्या को पिठोरी अमावस्या भी कहते हैं, इस दिन स्त्रियां पिठोरी व्रत करती हैं, जिसमें संध्या के समय 64 योगिनीयों, सप्त मातृकाओं और देवी पिठोरी की पूजा की जाती है. पिठोरी शब्द संस्कृत के पिष्टक शब्द से लिया गया है, आटे या चूर्ण से निर्मित चित्र, मूर्तियों, आकृतियों अथवा पिण्ड को पिष्टक कहा जाता है. आज पिठोरी अमावस्या है.
कुल की रक्षा का व्रत पिठोरी
मातायें शिशु मृत्यु, ग्रह दोष, कुल के संकट और वंश बाधा के निवारण के लिए इस व्रत का पालन करती हैं. धर्मग्रन्थों में प्राप्त वर्णन के अनुसार इस व्रत को करने से सन्तान की रक्षा, कुल की उन्नति, वंश वृद्धि एवं कुटुम्ब में शान्ति होती है.
पिठोरी अमावस्या पर आटे से 64 योगिनियों (छोटे-छोटे आटे के पिंड) की मूर्ति बनाकर उनकी पूजा करती हैं. इन 64 योगिनियों को देवी शक्ति की सहचर और ब्रह्मांड की रक्षक शक्तियां माना जाता है.
पिठोरी व्रत कथा
देवी इंद्राणी ने माता पार्वती से पिठोरी व्रत का महत्व पूछा, तब देवी ने बताया कि प्राचीन काल में एक अत्यन्त धनाढ्य ब्राह्मण था जिसका नाम श्रीधर था. उसके आठ पुत्र थे. उसकी धर्मपत्नी का नाम सुमित्रा था जो सदैव गृहधर्म के अनुरूप ही आचरण करती थी. उसके ज्येष्ठ पुत्र का नाम शङ्कर था एवं उसकी विदेहा नामक एक पत्नी थी. अज्ञात कारणों से शङ्कर की पत्नी के गर्भ से उत्पन्न सन्तान जन्म लेते ही मृत्यु को प्राप्त हो जाती थी.
एक समय की बात है, श्रीधर के पिता के श्राद्ध के दिन विदेहा प्रसूता हुयी एवं मृत शिशु को जन्म दिया. इस पर उसकी माँ सुमित्रा ने विदेहा को बहुत डाँटा. माँ की डाँट से क्षुब्ध होकर विदेहा मृत शिशु को लेकर वन की ओर चल पड़ी. वह वन में मृत शिशु को लेकर इधर-उधर भटक रही थी.
वन में उसे एक मठ दिखा जहां जाकर वो बैठ गई. मठ के स्वामियों ने शीघ्र ही आपस में विचार-विमर्श करके विदेहा से कहा कि यहाँ भयङ्कर एवं विकराल यक्ष निवास करते हैं. तू यहाँ से अन्यत्र चली जा अन्यथा वे सभी तेरा भक्षण कर लेंगे.
विदेहा बोली वे यक्ष भी भला मेरा क्यों ही भक्षण करेंगे? मेरा कल्याण कैसे हो, कृपया मार्गदर्शन करें. विदेहा की व्यथा सुनकर मठ की मुख्य स्त्री सदय हृदय से बोली इस स्थान पर चौंसठ योगिनी एवं दिव्य योगी आदिक निवास करते हैं. वे सभी पूजा-अर्चना करने के लिए उपस्थित होते हैं. यदि उनसे प्रार्थना करोगी तो वे तुम्हारे कार्य को अवश्य पूर्ण कर देंगे. वे तेरे बालकों को भी जीवित कर देंगे. इस समय तुम बेलपत्रों में छुप जाओ. जब वे पूछें, कोई अतिथि है? उस समय “है” कहकर उनके समक्ष प्रकट हो जाना.
कुछ समय बाद बड़े-बड़े केशों वाले यक्ष मठ के मध्य में उपस्थित हुये. उन्हें मनुष्य की गन्ध की अनुभूति हुयी तो वे बोले घर में मनुष्य की गन्ध कहाँ से आ रही है?’ वह इस प्रकार चर्चा कर ही रहे थे कि सुन्दर मन्दहास वाली चौंसठ योगिनी मध्यरात्रि में वहाँ उपस्थित हो गयीं. वे अनेकों महारत्न एवं नाना प्रकार के फलों से वहाँ विराजमान मठदेवी की श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना करने लगीं. उस दिन श्रावण (पूर्णिमान्त भाद्रपद) कृष्ण अमावस्या थी.
पूजन सम्पन्न करके वह बोली कि कोई अतिथि है क्या?’ यह सुनते ही “मैं हूँ” कहकर विदेहा उनके सम्मुख प्रकट हो गयी. विदेहा ने योगनियों से अपनी व्यथा बताई. विदेहा के करुण वचन सुनकर योगनियों को अत्यन्त दया आयी, उन्होंने वहाँ जो नैवेद्य रखा हुआ था वह विदेहा को प्रदान कर दिया.
चौंसठ योगिनी उससे प्रसन्न होकर बोलीं कि हमारा यह वरदान है कि इस लोक में तू पुत्र-पौत्रादि का सुख भोगकर स्वर्गलोक में पूज्य होगी. तेरे आठों पुत्र जीवित होकर तेरे समीप अभी उपस्थित होंगे, तुम जिस मार्ग से आयी हो उसी से लौट जाओ.
उसी समय आठों पुत्र जीवित होकर विदेहा के समीप आ गये. वह योगनियों का ध्यान करती हुयी अपने नगर एवं घर आ गयी. श्रीधर, सुमित्रा, शङ्कर एवं उसके भ्राता विदेहा को आठ पुत्रों सहित आते देख अत्यन्त प्रसन्न हुये. विदेहा ने पिठोरी अमावस के दिन ब्राह्मणों द्वारा मन्त्रपाठ, ढोलक, नक्काड़े, आदि की ध्वनि, गायन, वादन एवं नृत्य आदि अनेक प्रकार के मङ्गलाचार सहित श्रद्धापूर्वक एक साथ चौंसठों योगिनियों का पूजन किया.
इन योगनियों के स्मरण मात्र से स्त्री को पुत्र, पौत्र एवं धन-सम्पदा की प्राप्ति होती है तथा वह इन्द्राणी के समान सुखी हो जाती है. हे इन्द्राणि! उनके नामों का श्रवण करो जो इस प्रकार हैं दिव्ययोगी, महायोगी, सिद्धयोगी, गणेश्वरी, प्रेताक्षी, डाकिनी, काली, कालरात्रि, निशाचरी, झकारी, रौद्रवेताली, भुत्तली, भूतडंवरी, ऊर्ध्वकेशी, विरूपाक्षी, शुष्काङ्गी, नरभोजिनी, भट्टारी, वीरभद्रा, धूम्राक्षी, कलहप्रिया, राक्षसी, घोरक्ताक्षी, विश्वरूपा, भयङ्करी, चण्डिका, वीरकौमारी, वाराही, मुण्डधारिणी, सासुरी, रोद्रग्रहणी, चक्री, कंकाली, भुवनेश्वरी, खट्वाङ्गी, दीर्घलम्बोष्टी, मालिनी, मन्त्रयोगिनी, कालाग्निहणी, चित्रिणी, कंकाली, भुवनेश्वरी, कटकी, कीटिनी, रौद्री, यमदूती, गरालिनी, कोराक्षी, कार्मुकी, काकदृष्टि, अधोमुखी, मुण्डाग्रधारिणी, व्याघ्री, किंकिनी, प्रेतभाषिणी, कालरूपा, कामाक्षी, उष्ट्रिणी, योगपीठिका, महालक्ष्मी, एकवीरा, कालरात्रि, पीठिका एवं गान्धारी, ये चौसठ योगिनियाँ हैं. इन्हीं नामों से श्रद्धा एवं भक्तिभाव से इनका पूजन करना चाहिये.
देवी पार्वती ने इंद्राणी देवी से कहा जो स्त्रियाँ इस व्रत का श्रद्धा एवं भक्तिपूर्वक पालन करेंगी उनके सभी मनोरथ सिद्ध होंगे.
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