
Krishna, Nalkuber and Manigriv Story: आज देशभर में जन्माष्टमी की धूम है. श्रीकृष्ण की बाल लीलाएं आज भी लोगों को चौंका देती हैं. बाल गोपाल की लीलाओं से न सिर्फ आश्चर्य होता है बल्कि लोगों का उद्धार भी हो जाता है और सीख भी मिलती है. ऐसी ही एक कहानी है कुबेर के पुत्र नलकुबेर और मणिग्रीव की.
अपार धन के मद में चूर इन दोनों ने मर्यादा भुला दी, लेकिन देवर्षि नारद के श्राप और फिर भगवान श्रीकृष्ण की कृपा ने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी. श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध इस कथा का जिक्र मिलता है.
कुबेर के पुत्रों को किस बात का था अहंकार?
धन के देवता कुबेर के दो पुत्र थे नलकुबेर और मणिग्रीव. दोनों अत्यंत संपन्न और शक्तिशाली थे. धन और ऐश्वर्य के कारण उनमें अहंकार आ गया था. वे अपनी शक्ति और संपत्ति के मद में मर्यादाओं को भूलने लगे. एक बार दोनों मंदाकिनी नदी के तट पर कैलास पर्वत के निकट विहार कर रहे थे. वे मदिरा के नशे में इतने चूर थे कि उन्हें अपने आचरण और आसपास मौजूद लोगों की भी परवाह नहीं रही.
देवर्षि नारद का अपमान
उसी समय देवर्षि नारद वहां से गुजरे. नारद जी को देखकर नलकुबेर और मणिग्रीव अपने अहंकार और नशे में इतने डूबे हुए थे कि उन्हें नारद जी के आने का भी संकोच नहीं हुआ. नारद जी ने उनके व्यवहार को देखा और भविष्य के कल्याण को ध्यान में रखकर ऐसा उपाय किया जिससे उनका अहंकार भी समाप्त हो और आखिर में उन्हें भगवान की कृपा भी प्राप्त हो.
नारद जी ने दिया वृक्ष बनने का श्राप
नारद जी ने दोनों भाइयों को वृक्ष योनि में जन्म लेने का श्राप दिया. भागवत कथा के अनुसार, वे गोकुल में यमल और अर्जुन के दो वृक्षों के रूप में आए. समय बीता और द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने गोकुल में बाल रूप में अनेक लीलाएं कीं. एक दिन माता यशोदा ने कृष्ण को उनकी शरारतों के कारण ऊखल यानी ओखली से बांध दिया.
बाल कृष्ण ऊखल को पीछे खींचते हुए आगे बढ़ने लगे. रास्ते में वही दोनों विशाल यमल और अर्जुन वृक्ष खड़े थे. कृष्ण ऊखल को लेकर उन दोनों वृक्षों के बीच से निकले तो ऊखल फंस गया.लड्डू गोपाल ने उसे खींचा तो दोनों विशाल वृक्ष जड़ से उखड़कर धरती पर गिर पड़े.
वृक्षों से निकले कुबेर के दोनों पुत्र
वृक्षों के गिरते ही उनमें से नलकुबेर और मणिग्रीव अपने दिव्य स्वरूप में प्रकट हुए. नारद जी का श्राप पूरा हो चुका था और भगवान श्रीकृष्ण के स्पर्श से दोनों का उद्धार हो गया. दोनों ने भगवान कृष्ण के सामने सिर झुकाया और उनकी स्तुति की. उन्होंने स्वीकार किया कि धन और ऐश्वर्य के अहंकार ने उन्हें विवेकहीन बना दिया था, श्रीकृष्ण का आशीर्वाद पाकर दोनों अपने दिव्य लोक चले गए.
FAQ
1. नलकूबर और मणिग्रीव को श्राप किसने दिया?
देवर्षि नारद ने उनके अहंकार और अनुचित आचरण के कारण उन्हें वृक्ष योनि में जन्म लेने का श्राप दिया था.
2. वे किस रूप में जन्मे?
दोनों गोकुल में यमल-अर्जुन के वृक्षों के रूप में जन्मे थे.
3. कृष्ण ने उनका उद्धार कैसे किया?
माता यशोदा से ऊखल में बंधे बाल कृष्ण ने ऊखल खींचकर दोनों वृक्षों को उखाड़ दिया. इसी के साथ दोनों श्राप से मुक्त हो गए.
4. इस कथा से क्या सीख मिलती है?
कथा सिखाती है कि धन और ऐश्वर्य का अहंकार व्यक्ति को मर्यादा से दूर कर सकता है, जबकि सद्बुद्धि और भगवान की कृपा जीवन बदल सकती है.
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