मध्य प्रदेश

इंदौर: ‘न्याय में गरिमा सर्वोपरि’, न्यायिक सम्मेलन में बोले CJI सूर्यकांत


न्यायिक व्यवस्था से जुड़े अहम और समसामयिक मुद्दों पर विचार-विमर्श के लिए मध्य प्रदेश के इंदौर में दो दिवसीय राष्ट्रीय मंथन की शुरुआत हुई है. ‘Enhancing Access to Justice’ (न्याय तक पहुंच बढ़ाना) विषय पर आयोजित इस भव्य सम्मेलन का उद्घाटन सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और अन्य गणमान्य अतिथियों ने दीप प्रज्वलित कर किया. कार्यक्रम की शुरुआत विशिष्ट बच्चों द्वारा जजों के स्वागत और ‘द टेपेस्ट्री ऑफ जस्टिस’ (The Tapestry of Justice) थीम के साथ हुई.

इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस मनमोहन, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस विवेक रूसिया और वेस्ट जोन राज्यों के हाईकोर्ट के कई न्यायाधीशों सहित देशभर के विधि विशेषज्ञ शामिल हुए. इस अवसर पर कई महत्वपूर्ण शोध-पत्रों और पुस्तकों का विमोचन भी किया गया.

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‘न्याय में आम नागरिक की गरिमा सर्वोपरि’

सम्मेलन को संबोधित करते हुए सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने न्याय व्यवस्था के मूल उद्देश्य पर जोर दिया. उन्होंने कहा, “न्याय व्यवस्था को केवल अदालतों और फैसलों तक सीमित रखने के बजाय आम नागरिक की गरिमा (Dignity) और सम्मान को केंद्र में रखना होगा. अस्पताल से लेकर कोर्ट-कचहरी तक हर जगह आम नागरिक के साथ सम्मानजनक व्यवहार होना चाहिए.”

उन्होंने कानूनी सहायता को एक संवैधानिक अधिकार बताते हुए कहा कि समाज के कमजोर, वंचित, सामाजिक व आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों, महिलाओं और बच्चों तक न्याय व प्रभावी कानूनी मदद की पहुंच सुनिश्चित करना न्यायिक व्यवस्था की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है.

सीएम मोहन यादव ने याद की अहिल्याबाई और विक्रमादित्य की न्याय परंपरा

कार्यक्रम में अपने संबोधन के दौरान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मध्य प्रदेश, विशेषकर इंदौर और मालवा की ऐतिहासिक न्याय परंपरा का उल्लेख किया.

  • महारानी अहिल्याबाई का जिक्र: सीएम ने कहा कि महारानी अहिल्याबाई होलकर ने अपने शासन में न्याय को सर्वोच्च स्थान दिया और कभी किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया.
  • सम्राट विक्रमादित्य का प्रसंग: मुख्यमंत्री ने सम्राट विक्रमादित्य की न्यायप्रियता का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि जब उनके सामने अपने ही साले अपराध के दोषी बनकर आए, तो उन्होंने व्यक्तिगत संबंधों को न्याय के रास्ते में नहीं आने दिया.

मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि भारतीय परंपरा में न्याय में देरी को भी अन्याय के बराबर माना गया है. न्याय करते समय व्यक्ति के पद, प्रभाव या रिश्ते नहीं, बल्कि सिर्फ सत्य और न्याय महत्वपूर्ण होना चाहिए.

किन विषयों पर हो रहा है मंथन?

इस दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में मुख्य रूप से न्यायिक सुधार, मुफ्त कानूनी सहायता, समावेशी न्याय व्यवस्था और देश के अंतिम छोर पर खड़े आम नागरिक तक समयबद्ध तरीके से न्याय की पहुंच सुनिश्चित करने जैसे गंभीर विषयों पर विस्तार से मंथन किया जा रहा है.

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