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किसी भी चीज का 100 फीसद होना आमतौर पर बहुत अच्छा आंकड़ा माना जाता है, लेकिन जब यही 100 फीसद तबाही का प्रतिशत बन जाए, तो धरती पर इससे ज्यादा दुखद कुछ नहीं हो सकता.
किसी त्रासदी को सड़क से देखना और आसमान से उसका हवाई नजारा देखना, दोनों बिल्कुल अलग अनुभव हैं.
हवा अलग होती है और सामने का नजारा देखना भी मुश्किल होता है. यह एक ऐसे इलाके का नजारा था जो मर चुका है, उजड़ चुका है और पूरी तरह तबाह हो चुका है.
हमने कैलाश हेलिकॉप्टर सर्विसेज के फ्रेंच हेलिकॉप्टर में कैप्टन रवींद्र बहादुर बस्नेत के साथ उड़ान भरी. वह बेहद शांत और संयमित पायलट हैं और इस इलाके को वर्षों से जानते हैं.

मुश्किल भरी शुरुआत
दोपहर के बाद जैसे ही हेलिकॉप्टर ने काठमांडू एयर बेस से उड़ान भरी, शुरुआती कुछ मिनट सब कुछ सामान्य रहा.
फिर अचानक तेज बारिश शुरू हो गई और तेज हवाओं ने पूरे हेलिकॉप्टर को हिला दिया.
हम हवा में झूल रहे थे, लेकिन कैप्टन ने अपना संयम नहीं खोया.
हेलिकॉप्टर की रफ्तार बढ़ी और हम अपने मंजिल की तरफ बढ़ते रहे. मंजिल थी नेपाल-चीन सीमा, यानी वह इलाका जिसे ‘डी’ यानी तबाही के सबसे गंभीर जोन के तौर पर देखा जा रहा था.
हम त्रिशूली एयर बेस पर उतरे. यह लगभग सभी हेलिकॉप्टरों के लिए एक तकनीकी स्टेशन है और यहीं आधिकारिक ब्रीफिंग भी होती है.
सेना के अधिकारियों ने हमें इलाके, वहां मौजूद चुनौतियों और पालन किए जाने वाले मानक संचालन नियमों के बारे में जानकारी दी.
हमने अपनी बेल्ट बांधी और मिशन के लिए रवाना हो गए.

संयमित रहे हेलिकॉप्टर पायलट
जैसे ही हेलिकॉप्टर ने उड़ान भरी, आसमान के बादल नीले से गहरे स्लेटी रंग में बदल गए और आगे का रास्ता 500 मीटर चौड़े इलाके से सिमटकर करीब 200 मीटर रह गया.
करीब 20 हेलिकॉप्टर दिन में लगभग 120 उड़ानें भर रहे हैं. यह सामान्य दिनों की तुलना में बहुत ज्यादा है और पायलटों के लिए भी हालात बेहद कठिन हैं.
लेकिन कैप्टन के माथे पर न पसीने की न एक बूंद थी और न तनाव का कोई निशान.
वह अपने काम को इतनी अच्छी तरह जानते थे जैसे अपने हाथ की लकीरें.
हालात के हिसाब से हेलिकॉप्टर की रफ्तार 70 किलोमीटर प्रति घंटे से लेकर 200 किलोमीटर प्रति घंटे तक बदल रही थी.

अभूतपूर्व अनुभव
लेकिन दुनिया के किसी और हिस्से में उड़ान भरने और यहां उड़ान भरने में एक बड़ा फर्क था.
हम धरती की सबसे ऊंची और सबसे संकरी पर्वत श्रृंखलाओं की घाटियों के बीच उड़ रहे थे.
चुनौती सिर्फ एक हेलिकॉप्टर के घाटी में उड़ने की नहीं थी. हमारे साथ एक दर्जन से ज्यादा हेलिकॉप्टर अंदर-बाहर आ रहे थे. कुछ हमारे नीचे से निकल रहे थे और कुछ हमारे ऊपर से उड़ रहे थे.
मेरे लिए यह बिल्कुल अभूतपूर्व अनुभव था.
आसमान में हेलिकॉप्टर ऐसे उड़ रहे थे जैसे सड़क पर गाड़ियां चलती हैं. फर्क सिर्फ इतना था कि यहां पायलट लगातार बात कर रहे थे और स्थिति पर नजर रख रहे थे.
जरा सा, सिर्फ एक मीटर का रास्ता बदलना भी बड़ी टक्कर का कारण बन सकता था.
जब हम त्रिशूली नदी के ऊपर से उड़ रहे थे, तो पूरे इलाके में बेहद तेज रफ्तार से पानी नीचे की ओर बह रहा था.

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मलबा हटाने, दबे शवों को तलाशे में जुटे
भारी मिट्टी हटाने वाली मशीनें पानी के रास्ते में खड़ी थीं, लेकिन वे भी पानी की रफ्तार को धीमा नहीं कर पा रही थीं. उल्टा, उनके कारण पानी में और ज्यादा लहरें और उथल-पुथल पैदा हो रही थी.
त्रिशूली की 3A और 3B सुरंगों में डॉक्टर सुरक्षा उपकरण पहनकर काम कर रहे थे.
इंजीनियर लगातार मलबा हटाने में जुटे थे.
सुरक्षा बलों की मदद के लिए खोजी कुत्ते और थर्मल ड्रोन भी लगाए गए थे, ताकि जहां भी संभव हो, मलबे में दबे शवों का पता लगाया जा सके.
इस गांव में कभी सैकड़ों लोग रहते थे, लेकिन अब यहां चारो तरफ मलबे का ढेर बचा है.
जब हेलिकॉप्टर कीचड़ और फिसलन भरी चट्टानों से भरे इलाके में उतरा, तो पायलट ने किसी रस्सी पर चलने वाले कलाकार की तरह बेहद सावधानी से संतुलन बनाए रखा.
हर ओर तबाही के मंजर
हेलिकॉप्टर के पंखे बंद नहीं किए गए और इंजन भी चालू रखा गया, ताकि अगर हेलिकॉप्टर कीचड़ में धंसने लगे तो हम तुरंत वहां से उड़ सकें.
मैं कुछ मिनटों के लिए घाटी में बढ़ती चुनौतियों को देखने के लिए आगे गई, तब कैप्टन हेलिकॉप्टर में ही बैठे रहे.
पिछले 100 घंटों में कई बार एक और फ्लैश फ्लड यानी अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा बताया जा चुका था.
नदी का पानी लगातार बढ़ रहा था और बचाव अभियान में जुटे हर व्यक्ति के लिए जिंदगी का भरोसा लगातार कम होता जा रहा था.
हम सुरंग वाले इलाके से सीधे त्रिशूली की ओर और फिर भोटे कोशी नदी की तरफ बढ़े. यही सबसे ज्यादा प्रभावित इलाका था.
अब कहीं भी उतरने की जगह नहीं थी.
अचानक बारिश और तेज हो गई और हमें एहसास हुआ कि यहां उड़ान भरने वाले लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी कितनी खतरनाक है.
हर बार जब मैंने हेलिकॉप्टर की खिड़की से बाहर देखा, तो मुझे सिर्फ उस तबाही के निशान दिखाई दिए जो सीमा पार से नेपाल में आई इस आपदा ने पीछे छोड़े थे.

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जहां से फ्लैश फ्लड ने नेपाल में मचाई तबाई
जब हम स्याप्रु पहुंचे, तो पूरी सड़क बह चुकी थी.
इमारतें क्षतिग्रस्त ढांचों में बदल चुकी थीं और ऐसा लग रहा था जैसे वे उस भयावह पल की गवाह हों, जिसने पूरे इलाके की रफ्तार रोक दी.
इमारतों का यह हवाई नजारा उस चहल-पहल की तस्वीर दिखाता है जो 26 अगस्त 2026 की उस मनहूस सुबह से पहले यहां हुआ करती थी.
अब यहां हवा और पानी के अलावा कुछ नहीं चलता.
पायलट हेडफोन के जरिए हमारे संपर्क में थे.
हमें संकेत दिया कि तब हम नेपाल और चीन की अंतरराष्ट्रीय सीमा के समानांतर तिमुरे के पास उड़ रहे हैं.
यही वह जगह थी जहां पानी नेपाल में घुसा और अपने रास्ते में आने वाली हर चीज को बहाकर ले गया.
पहले तिमुरे उत्तरी नेपाल के रसुवा जिले में एक विलेज डेवलपमेंट कमेटी था.

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पूरा गांव बह चुका था, अब यहां खामोशी थी
करीब एक हजार लोगों की आबादी वाला यह गांव बाढ़ में पूरी तरह बह जाने वाले गांवों में शामिल है.
इस घाटी में कभी जो चीखें गूंजती थीं, उन्हें अब उफनती नदियों ने खामोश कर दिया है.
यह वही घाटी है जिसने नेपाल की इस त्रासदी का सबसे भयानक रूप देखा है.
हाइड्रो पावर प्लांट अब एक क्षतिग्रस्त ढांचे में बदल चुका है.
सुरंगें मलबे से भरी हैं.
थर्मल ड्रोन भी उनके अंदर किसी इंसान की मौजूदगी का पता लगाने में नाकाम हो रहे हैं, चाहे वह जिंदा हो या मृत.
तिमुरे के रास्ते नेपाल और चीन की अंतरराष्ट्रीय सीमा तक पहुंचने वाले हम पहले अंतरराष्ट्रीय पत्रकार हैं.
हमने हेलिकॉप्टर से दो चक्कर लगाए.
अचानक आए तूफान ने हेलिकॉप्टर को जोर से धक्का दिया और हम जैसे यात्रियों को यह एहसास हुआ कि ये बचाव अभियान जमीन पर ही नहीं, बल्कि आसमान में भी कितने डरावने और जोखिम भरे हैं.
ढलान के किनारे बहकर गायब हो चुके घर इस बात के सबूत थे कि बाढ़ वाले दिन पानी का स्तर कितना ऊपर पहुंच गया था.
अब इन दीवारों में उन शवों का दर्द छिपा है जो मलबे के नीचे पड़े हैं और एक सम्मानजनक अंतिम संस्कार का इंतजार कर रहे हैं.
कम से कम इतना कि उन्हें ‘अज्ञात शव’ के रूप में दफन न किया जाए.
जब मैं 15,000 फीट से ज्यादा ऊंचे पहाड़ों को देखी, तो मेरे मन में सिर्फ एक सवाल था. लोग पानी की ताकत के खिलाफ ऊपर की ओर कैसे भागे होंगे. और अगर उनमें छोटे बच्चे या बुजुर्ग शामिल रहे होंगे तो क्या हुआ होगा. एक सामान्य इंसान के लिए ऐसी स्थिति से बच पाना लगभग असंभव रहा होगा.
मेरे रोंगटे खड़े हो गए, लेकिन इससे मेरा काम नहीं रुका. मैं अपने फोन पर यात्रा के हर मिनट को रिकॉर्ड कर रही थी.
मेरे साथ कैमरापर्सन अश्वनी मेहरा और मेरे सहयोगी विष्णु सोम भी थे.
जब हेलिकॉप्टर दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत श्रृंखला की 200 फीट चौड़ी घाटी से बारिश और तेज हवाओं के बीच गुजर रहा था, तो वहां गूंजती आवाज मुस्कुराहटों की नहीं थी. वह उन लोगों की चीखों की गूंज थी जो अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे थे.
और अब यहां कुछ भी नहीं बचा. बाजार, घर, स्कूल और दफ्तर सब खामोश हैं. और यह खामोशी जान ले रही है.
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