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Ashura Roza 2026: आज है मुहर्रम का सबसे फजीलत वाला रोजा, जानें दिल्ली, यूपी, बिहार और मुंबई में सेहरी-इफ्तार का सही समय


Ashura Roza 2026: मुहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है और इसे इस्लाम के सबसे पवित्र महीनों में से एक माना जाता है. इस महीने की 10वीं तारीख, जिसे यौम-ए-आशूरा (Youm e Ashura) कहा जाता है, धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है. साल 2026 में आशूरा का दिन 26 जून, शुक्रवार को मनाया जा रहा है. इस अवसर पर बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोग रोजा रखकर इबादत करते हैं और अल्लाह की रहमत व बरकत हासिल करने की कोशिश करते हैं.

इस्लामी परंपरा के अनुसार आशूरा का रोजा बहुत फजीलत वाला माना गया है. हदीसों में बताया गया है कि पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने इस दिन रोजा रखने की विशेष प्रेरणा दी थी. सुन्नत के मुताबिक 9 और 10 मुहर्रम या 10 और 11 मुहर्रम को रोजा रखना बेहतर माना जाता है.

दिल्ली से मुंबई तक देखें सेहरी-इफ्तार का पूरा शेड्यूल:

जो लोग आशूरा का रोजा रख रहे हैं, उनके लिए सेहरी और इफ्तार का सही समय जानना बेहद जरूरी है. चांद की स्थिति और स्थानीय समय के अनुसार कुछ मिनटों का अंतर संभव है.

1. दिल्ली
सेहरी समाप्ति: सुबह 03:45 बजे
इफ्तार: शाम 07:25 बजे

2. उत्तर प्रदेश (लखनऊ और आसपास)
सेहरी समाप्ति: सुबह 03:45 बजे
इफ्तार: शाम 07:15 बजे

3. बिहार (पटना)
सेहरी समाप्ति: सुबह 03:25 बजे
इफ्तार: शाम 06:43 बजे

4. मुंबई
सेहरी समाप्ति: सुबह 04:35 बजे
इफ्तार: शाम 07:20 बजे

क्यों खास माना जाता है आशूरा का रोजा?

आशूरा का दिन इस्लामी इतिहास में कई महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़ा हुआ है. इस दिन के बारे में माना जाता है कि अल्लाह ने हजरत मूसा (Alayhi salam) और उनकी कौम को फिरौन के अत्याचारों से मुक्ति प्रदान की थी. इसी खुशी और शुक्राने के रूप में रोजा रखने की परंपरा प्रचलित हुई.

सुन्नी मुस्लिम समुदाय में आशूरा के रोजे को विशेष पुण्य और बरकत वाला माना जाता है. कई इस्लामी विद्वानों के अनुसार इस दिन का रोजा पिछले एक साल के छोटे-छोटे गुनाहों की माफी का माध्यम बन सकता है.

कर्बला का मैदान और इमाम हुसैन की अमर शहादत:

आशूरा का दिन शिया मुस्लिम समुदाय के लिए विशेष रूप से गम और शोक का दिन माना जाता है. यह दिन पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के नवासे हजरत इमाम हुसैन (अलैहिस्सलाम) और उनके साथियों की शहादत की याद दिलाता है.

सन् 680 ईस्वी में वर्तमान इराक के कर्बला क्षेत्र में इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों का सामना यज़ीद की विशाल सेना से हुआ था. अन्याय और अत्याचार के सामने झुकने के बजाय इमाम हुसैन ने सत्य और न्याय के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी. उनकी यह शहादत आज भी पूरी दुनिया में साहस, त्याग और इंसाफ की मिसाल मानी जाती है.

मुहर्रम क्यों मनाया जाता है?

मुहर्रम केवल इस्लामी नववर्ष की शुरुआत का महीना नहीं है, बल्कि यह आत्मचिंतन, इबादत, संयम और अच्छे कर्मों का भी संदेश देता है. इस वर्ष इस्लामी नववर्ष 1448 हिजरी की शुरुआत 17 जून 2026 से हुई है.

मुहर्रम के दौरान लोग अतिरिक्त नमाज अदा करते हैं, कुरआन का अध्ययन करते हैं, रोजा रखते हैं और जरूरतमंदों की सहायता करते हैं. कई स्थानों पर ताजिया जुलूस, मजलिस और धार्मिक सभाओं का आयोजन भी किया जाता है, जहां कर्बला के शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है.

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