धर्म

Ahoi Ashtami 2026: रवि पुष्य और सर्वार्थ सिद्धि योग में रखा जाएगा व्रत, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व


Ahoi Ashtami 2026: दीपावली के आगमन के साथ ही चारों ओर उत्सव और उल्लास का माहौल बन जाता है. सनातन धर्म में कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि का अत्यधिक आध्यात्मिक और पारिवारिक महत्व है. 

करवा चौथ के चार दिन बाद और दीवाली से ठीक आठ दिन पहले पड़ने वाला अहोई अष्टमी (Ahoi Ashtami 2026) का व्रत माताओं के लिए सबसे पावन अनुष्ठानों में से एक माना गया है. इस दिन माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, उत्तम स्वास्थ्य, संकटों से रक्षा और उज्ज्वल भविष्य की मंगलकामना के साथ दिनभर निर्जला उपवास रखती हैं.

इस साल अहोई अष्टमी का पवित्र पर्व रविवार, 1 नवंबर 2026 को मनाया जाएगा. श्री लक्ष्मीनारायण एस्ट्रो सॉल्यूशन (अजमेर) की निदेशिका, प्रख्यात ज्योतिषाचार्या एवं टैरो कार्ड रीडर नीतिका शर्मा के अनुसार, इस बार अहोई अष्टमी पर रवि पुष्य नक्षत्र, सर्वार्थ सिद्धि योग और राजयोग का अत्यंत शुभ और दुर्लभ संयोग बन रहा है, जिससे की गई साधना, पूजा और प्रार्थना का फल कई गुना बढ़ जाता है.

अहोई अष्टमी 2026 तिथि और शुभ मुहूर्त:

ज्योतिषाचार्या नीतिका शर्मा के अनुसार, कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की शुरुआत 1 नवंबर 2026 को दोपहर 02:51 बजे से होगी और इसका समापन 2 नवंबर 2026 को दोपहर 01:10 बजे होगा.

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अहोई अष्टमी का व्रत प्रदोष काल और रात्रि में तारों अथवा चंद्रमा के दर्शन के बाद ही खोला जाता है. क्योंकि अष्टमी तिथि के दौरान सांझ के समय तारों और रात में चंद्रमा के दर्शन 1 नवंबर को ही होंगे, इसलिए यह व्रत 1 नवंबर को ही रखा जाएगा.

पूजा का सबसे शुभ मुहूर्त: शाम 04:59 बजे से शाम 06:15 बजे तक

कुल पूजा अवधि: 1 घंटा 16 मिनट

तारों को अर्घ्य देने का समय: शाम 06:22 बजे के बाद

चंद्रोदय (Moonrise) का समय: रात 11:05 बजे

इस बार क्यों खास है अहोई अष्टमी का व्रत?

ज्योतिष शास्त्र में पुष्य नक्षत्र और सर्वार्थ सिद्धि योग को किसी भी धार्मिक अनुष्ठान, पूजा-पाठ और संकल्प के लिए सर्वोत्तम माना गया है. रविवार के दिन पुष्य नक्षत्र का पड़ना रवि पुष्य योग का निर्माण करता है, जिसे स्वयं-सिद्ध मुहूर्त माना जाता है. इसके साथ ही सर्वार्थ सिद्धि योग का संयोग सभी मनोकामनाओं को सिद्ध करने वाला है. 

ज्योतिषाचार्या नीतिका शर्मा बताती हैं कि इस दुर्लभ योग में माताओं द्वारा किए गए व्रत और पूजन से संतान के जीवन में आने वाली बाधाएं, कुंडली के ग्रह-दोष, नजर-दोष और बीमारियां पूरी तरह दूर होती हैं तथा बच्चों को करियर में अपार तरक्की मिलती है.

कौन हैं अहोई माता और क्या है इनका स्वरूप?

अहोई माता को वास्तव में माता पार्वती का ही ममतामयी स्वरूप माना जाता है. शास्त्रों में इन्हें संतानों की जीवनदायिनी, संरक्षिका और मातृत्व का वरदान देने वाली देवी कहा गया है.

पौराणिक परंपरा के अनुसार, अहोई माता के साथ साही (स्याऊ माता) और उनके बच्चों का पूजन किया जाता है. प्रचलित लोककथा के अनुसार, एक साहूकार की बहू से घर की लीपापोती के लिए मिट्टी खोदते समय अनजाने में साही के बच्चे मर गए थे. इस अनजाने पाप के कारण उसकी अपनी संतानों पर संकट आ गया.

अपनी भूल का गहरा पश्चाताप करते हुए उसने साही माता और भगवती पार्वती की कठोर तपस्या की और क्षमा याचना की. माता ने उसकी सच्ची निष्ठा और पश्चाताप से प्रसन्न होकर उसकी संतानों को दीर्घायु और सुरक्षा का आशीर्वाद दिया. तभी से दीवारों पर गेरू से अहोई माता और स्याऊ के आठ कोष्ठक बनाकर उनकी पूजा करने की परंपरा चली आ रही है.

अहोई अष्टमी व्रत का धार्मिक महत्व:

संतान की दीर्घायु और तरक्की: इस व्रत के प्रभाव से बच्चों का स्वास्थ्य उत्तम रहता है, वे हर प्रकार के गंभीर रोगों से सुरक्षित रहते हैं और जीवन में सफलता पाते हैं.

संतान सुख की प्राप्ति: ज्योतिषाचार्या नीतिका शर्मा के अनुसार, जिन महिलाओं की कुंडली में संतान बाधा हो या जो संतान सुख से वंचित हों, उनके लिए यह व्रत अत्यंत चमत्कारी माना गया है. अहोई माता के आशीर्वाद से सूनी गोद जल्द भरती है.

पारिवारिक शांति और समृद्धि: घर में नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है और सुख-शांति व संपन्नता का वास होता है.

पूजा और पारण की प्रामाणिक विधि:

संकल्प: सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और अहोई माता के समक्ष हाथ में जल लेकर संतान के कल्याण हेतु निर्जला व्रत का संकल्प लें.

पूजा की तैयारी: शाम के समय पूजा स्थान पर दीवार पर अहोई माता का चित्र लगाएं. चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर जल से भरा कलश, गेहूं, और भोग सामग्री रखें.

अर्चना और कथा: शुभ मुहूर्त (शाम 04:59 से 06:15 के बीच) में घी का दीपक प्रज्वलित करें. माता को रोली, अक्षत, फल और हलवे का भोग लगाएं तथा गेहूं के सात दाने हाथ में लेकर श्रद्धापूर्वक व्रत कथा सुनें.

अर्घ्य और पारण: शाम 06:22 बजे के बाद आकाश में तारों को लोटे से जल और अर्घ्य अर्पित करें. कुछ क्षेत्रों में रात 11:05 बजे चंद्र दर्शन के बाद अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है. इसके पश्चात बुजुर्गों का आशीर्वाद लेकर ही जल और सात्विक आहार ग्रहण करें.

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button