
Kurukshetra Temple: धर्मनगरी कुरुक्षेत्र को अक्सर महाभारत युद्ध और श्रीमद्भगवद्गीता के दिव्य उपदेश की भूमि के रूप में जाना जाता है, परंतु यह पवित्र धरा सनातन आस्था और शक्ति उपासना का भी एक बहुत महत्वपूर्ण केंद्र है. कुरुक्षेत्र नगर में स्थित श्री देवीकूप भद्रकाली शक्तिपीठ (Savitri Peeth) भारतवर्ष के 51 पवित्र शक्तिपीठों में से एक है.
जब भी कोई विशिष्ट हस्ती या देश के राष्ट्रपति कुरुक्षेत्र की पवित्र धरा पर आते हैं, तो वे अपनी यात्रा का मंगल आरंभ मां भद्रकाली के चरणों में शीश नवाकर ही करते हैं. इस मंदिर की सबसे चमत्कारी और अनोखी परंपरा है श्रद्धालुओं द्वारा माता को मिट्टी, टेराकोटा और धातु के घोड़े अर्पित करना.
महाभारत काल से जुड़ी है घोड़े चढ़ाने की यह पावन कथा:
सामान्यतः हिंदू मंदिरों में देवी-देवताओं को नारियल, चुनरी, फल अथवा मिष्ठान अर्पित करने की परंपरा है. लेकिन श्री देवीकूप भद्रकाली मंदिर में मिट्टी के खिलौनेनुमा घोड़े चढ़ाने के पीछे द्वापर युग का एक अत्यंत रोचक और प्रेरक इतिहास समाहित है:
अर्जुन की विजय मन्नत: महाभारत के भीषण धर्मयुद्ध के प्रारंभ से पूर्व, भगवान श्रीकृष्ण के परामर्श पर कुंतीपुत्र अर्जुन और समस्त पांडवों ने विजयश्री की प्राप्ति हेतु मां भद्रकाली की विधिवत उपासना की थी. उस समय अर्जुन ने माता के सम्मुख यह मन्नत मांगी थी कि अगर धर्मयुद्ध में पांडवों की विजय होती है, तो वे अपने दिव्य रथ के श्रेष्ठ घोड़ों को मां के चरणों में सादर समर्पित करेंगे.
पांडवों द्वारा संकल्प की पूर्ति: 18 दिनों तक चले महाभारत युद्ध में अधर्म पर धर्म की पताका फहराने के उपरांत, भगवान श्रीकृष्ण के साथ पांडव फिर इस शक्तिपीठ पहुंचे. उन्होंने अपने वचन का निष्ठापूर्वक पालन करते हुए अपने सबसे बलिष्ठ और सुंदर घोड़ों की जोड़ी माता को भेंट स्वरूप अर्पित की.
मिट्टी के घोड़ों का प्रचलन: कालांतर में आम श्रद्धालुओं के लिए जीवित अथवा बहुमूल्य स्वर्ण-रजत के घोड़े दान करना संभव नहीं रहा, और आस्था, श्रद्धा और परंपरा के प्रतीक रूप में भक्तों ने मिट्टी, लकड़ी तथा टेराकोटा (पक्की मिट्टी) के छोटे घोड़े चढ़ाना प्रारंभ कर दिया.
अभी के समय में भी जब किसी भक्त की कोई कठिन मनोकामना सिद्ध होती है, तो वह कृतज्ञ भाव से बाजार से जोड़े में मिट्टी के घोड़े खरीदकर माता के दरबार में श्रद्धापूर्वक अर्पित करता है.
श्री देवीकूप भद्रकाली मंदिर का पौराणिक व धार्मिक महत्व:
यह शक्तिपीठ केवल पांडवों की मन्नत तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ कई अन्य पौराणिक आख्यान भी जुड़े हुए हैं:
माता सती का पावन टखना: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान शिव सती के पार्थिव देह को लेकर विलाप कर रहे थे, तब सृष्टि के संतुलन हेतु भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से उनके शरीर के 51 खंड किए थे. इस पावन स्थल पर माता सती का दाहिना टखना (Right Ankle) गिरा था. मंदिर के गर्भगृह में एक पावन कूप (कुआं) विद्यमान है, जिसके ऊपर श्वेत संगमरमर के कमल पुष्प पर माता के चरण-चिह्न सुशोभित हैं.
श्रीकृष्ण और बलराम का मुंडन संस्कार: लोक मान्यताओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि बाल्यकाल में भगवान श्रीकृष्ण और उनके ज्येष्ठ भ्राता बलराम का प्रथम मुंडन (चूड़ाकर्म संस्कार) इसी शक्तिपीठ परिसर में स्थित पवित्र जलाशय के तट पर संपन्न हुआ था. यही कारण है कि आज भी उत्तर भारत के हजारों परिवार अपने नवजात शिशुओं का पहला मुंडन करवाने इस पावन धाम में आते हैं.
राष्ट्रपति का दौरा और हरियाणा दिवस का गौरवशाली प्रसंग:
हरियाणा दिवस (1 नवंबर) और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के हीरक जयंती समारोह के शुभ अवसर पर देश की प्रथम नागरिक राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जब कुरुक्षेत्र प्रवास पर पहुंचती हैं, तो उनके कार्यक्रमों की औपचारिक शुरुआत इसी शक्तिपीठ में विशेष पूजा-अर्चना के साथ होती है.
इसके अतिरिक्त, गुरुकुल कुरुक्षेत्र में आर्य समाज के अमर सेनानी स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती के 100वें बलिदान दिवस के शताब्दी कार्यक्रम में उनकी उपस्थिति इस धर्मक्षेत्र के आध्यात्मिक और राष्ट्रीय गौरव को नई ऊंचाई प्रदान करती है.
अगर आप भी कुरुक्षेत्र भ्रमण का विचार बना रहे हैं, तो आस्था, इतिहास और संस्कृति के इस अनूठे केंद्र में मां भद्रकाली के दर्शन कर मिट्टी के घोड़े चढ़ाने की इस अद्भुत परंपरा का प्रत्यक्ष साक्षी अवश्य बनें.
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