
Tirth Yatra Kyon Karte Hain: भारतीय संस्कृति में तीर्थ केवल किसी पवित्र स्थान का नाम नहीं है, बल्कि आत्मपरिष्कार, चेतना-जागरण और जीवन-निर्माण की दिव्य साधना है. ‘तीर्थ’ शब्द का अर्थ ही है – वह सेतु जो मनुष्य को अज्ञान से ज्ञान, अशांति से शांति और सीमितता से अनंत की ओर ले जाए. यही कारण है कि हमारे पूज्य ऋषियों ने तीर्थयात्रा को केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आत्मोन्नति और लोकमंगल का महान साधन माना है. सनातन परंपरा से जुड़े तमाम धार्मिक ग्रंथों में तीर्थ के धार्मिक महत्व को विस्तार से बताते हुए कहा गया है –
तीर्थानामुत्तमं तीर्थं विशुद्धिर्मनसः पुनः. (स्कन्दपुराण)
अर्थात् समस्त तीर्थों में श्रेष्ठ तीर्थ मन की निर्मलता है. यदि अंतःकरण शुद्ध नहीं हुआ, तो बाह्य यात्रा अधूरी ही रह जाती है.
भगवद्गीता भी इसी सत्य को उद्घाटित करती है-
श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः.
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति. (भगवद्गीता 4.39)
अर्थात् श्रद्धावान, संयमी और साधनापरायण व्यक्ति ज्ञान प्राप्त कर शीघ्र ही परम शांति को प्राप्त करता है.
तीर्थ यात्रा का उद्देश्य क्या होता है?

तीर्थयात्रा का वास्तविक उद्देश्य केवल मंदिरों के दर्शन करना नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर झाँकना, अपने दोषों को पहचानना और श्रेष्ठ जीवन-मूल्यों को अपनाने का संकल्प लेना है. तीर्थों का सात्विक वातावरण, साधना, सत्संग, स्वाध्याय और सेवा मनुष्य के विचारों को नई दिशा प्रदान करते हैं. दैनिक जीवन की भागदौड़, तनाव और मानसिक विक्षोभ से दूर तीर्थयात्रा आत्ममंथन का ऐसा अवसर बन जाती है, जहाँ व्यक्ति स्वयं से साक्षात्कार करता है.
भारतीय परंपरा का एक अत्यंत प्रेरणादायी वचन है-
सत्सङ्गत्वे निस्सङ्गत्वं, निस्सङ्गत्वे निर्मोहत्वम्.
निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वं, निश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः.
(भज गोविन्दम्)
अर्थात् सत्संग से आसक्ति का क्षय होता है, उससे मोह समाप्त होता है और अंततः जीवन में स्थिरता एवं मुक्ति का अनुभव होता है. तीर्थयात्रा का सबसे बड़ा लाभ यही सत्संग और आत्मपरिष्कार है.
क्यों और कैसे करें तीर्थ यात्रा?

तीर्थों पर श्रद्धा, विनम्रता और अनुशासन के साथ जाना चाहिए. वहाँ स्वच्छता बनाए रखना, स्थानीय परंपराओं का सम्मान करना तथा सेवा, साधना और सत्संग में सहभागी बनना तीर्थयात्रा को सार्थक बनाता है. यदि तीर्थ से लौटने के बाद हमारे विचार अधिक निर्मल, व्यवहार अधिक विनम्र और जीवन अधिक सेवा-प्रधान बन जाए, तभी तीर्थयात्रा का वास्तविक उद्देश्य पूर्ण माना जा सकता है.
उपनिषदों का यह उद्घोष भी तीर्थयात्रा की इसी दिशा को पुष्ट करता है-
सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम्.
(मुण्डकोपनिषद् 3.1.5)
अर्थात् आत्मा की अनुभूति सत्य, तप, सम्यक् ज्ञान और अनुशासित जीवन से होती है; केवल बाह्य कर्मकाण्ड से नहीं.
सेवा, साधना और संस्कार से जुड़ा गायत्री तीर्थ

इसी दृष्टि से गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार आधुनिक भारत का एक जीवंत तीर्थ है. युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य एवं वंदनीया माता भगवती देवी शर्मा द्वारा स्थापित यह तपोभूमि साधना, स्वाध्याय, सेवा और संस्कार का समन्वित केंद्र है. यहाँ आने वाले साधकों, युवाओं और परिवारों को केवल धार्मिक अनुष्ठानों का अवसर ही नहीं मिलता, बल्कि जीवन-निर्माण, परिवार-निर्माण और समाज-निर्माण की व्यावहारिक प्रेरणा भी प्राप्त होती है. यहाँ तीर्थ का अर्थ केवल दर्शन नहीं, बल्कि जीवन में दिव्यता का अवतरण है.
आज का युवा तनाव, भौतिकता और तीव्र प्रतिस्पर्धा के बीच मानसिक असंतुलन का अनुभव कर रहा है. ऐसे समय में तीर्थ केवल आस्था के केंद्र नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य, आत्मचिंतन और सकारात्मक ऊर्जा के सशक्त केंद्र बन सकते हैं. आवश्यकता इस बात की है कि तीर्थ श्रद्धालुओं और युवाओं की आवश्यकताओं के अनुरूप स्वच्छ, सुव्यवस्थित, ज्ञानमय, सेवा-प्रधान और पर्यावरण-संवेदी हों. उनकी व्यवस्थाएँ पारदर्शी हों तथा संसाधनों का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण, संस्कार संवर्धन और जनकल्याण जैसे रचनात्मक कार्यों में हो, जिससे तीर्थ वास्तव में समाज परिवर्तन के प्रेरक केंद्र बन सकें.
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कैसा होना चाहिए तीर्थ?

युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने अपने साहित्य में स्पष्ट किया है कि तीर्थ केवल पूजा-अर्चना के स्थान नहीं होने चाहिए, बल्कि ऐसे जीवंत चेतना-केंद्र बनने चाहिए जहाँ व्यक्ति का चरित्र-निर्माण, विचार-परिष्कार और जीवन-उत्थान हो. उनके अनुसार सच्चा तीर्थ वही है जहाँ से लौटकर मनुष्य अधिक संस्कारित, अधिक उत्तरदायी और अधिक सेवा-भाव से ओतप्रोत होकर समाज के लिए जीने का संकल्प लेकर आए.
गायत्री तीर्थ शांतिकुंज ने इन आदर्शों को व्यवहार में उतारते हुए यह सिद्ध किया है कि तीर्थ केवल यात्रा नहीं, बल्कि जीवन परिवर्तन का अभियान है. जब श्रद्धा सेवा से जुड़ती है, साधना विज्ञान से जुड़ती है और अध्यात्म राष्ट्रनिर्माण से जुड़ता है, तभी तीर्थ अपनी वास्तविक सार्थकता को प्राप्त करता है.
अंततः भारतीय संस्कृति का यही शाश्वत संदेश है- सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः. सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्.
तीर्थयात्रा का अंतिम उद्देश्य भी यही है-व्यक्ति के अंतर्मन में शांति का उदय हो, उसका जीवन संतुलित बने और वह अपने सुख को समस्त समाज के कल्याण से जोड़कर देख सके. यही भारतीय तीर्थ परंपरा का मूल दर्शन है और यही मानवता के उज्ज्वल भविष्य का आधार भी.
लेखक- देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति एवं प्रसिद्ध आध्यात्मिक विचारक हैं.





