
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बीना से कांग्रेस विधायक निर्मला सप्रे के कथित दलबदल मामले में कांग्रेस और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार को बड़ा झटका दिया है. कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी. न्यायालय ने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष दल-बदल कानून के तहत मामले की जांच कर रहे हैं, इसलिए इस चरण में न्यायालय का हस्तक्षेप उचित नहीं है.
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब विधानसभा अध्यक्ष कानून के अनुसार प्रक्रिया का पालन कर रहे हैं और संबंधित पक्षों के बयान दर्ज कर चुके हैं, तब अदालत कोई निर्देश जारी नहीं कर सकती.
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पूरा मामला क्या है?
सागर जिले की बीना विधानसभा सीट से निर्वाचित कांग्रेस विधायक निर्मला सप्रे पर पार्टी विरोधी गतिविधियों का आरोप है. याचिका में कहा गया कि लोकसभा चुनाव के दौरान 5 मई 2024 को वे राहतगढ़ में मुख्यमंत्री मोहन यादव के कार्यक्रम में मंच पर पहुंची थीं. इसके बाद उनके भाजपा की ओर जाने की चर्चाएं शुरू हो गईं, लेकिन उन्होंने अभी तक विधायक पद से इस्तीफा नहीं दिया. नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने इसे दलबदल कानून का सीधा उल्लंघन बताते हुए निर्मला सप्रे का निर्वाचन शून्य घोषित करने और उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी.
हाईकोर्ट का फैसला
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यह मामला वर्तमान में विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष लंबित है और जांच की प्रक्रिया जारी है. ऐसे में न्यायालय को हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है. कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि अध्यक्ष द्वारा की जा रही कार्यवाही विधिसम्मत है.
सुप्रीम कोर्ट का रास्ता चुना
हाईकोर्ट से राहत न मिलने के बाद उमंग सिंघार ने सुप्रीम कोर्ट जाने का ऐलान किया है. उनका कहना है कि दलबदल कानून के प्रभावी क्रियान्वयन और अध्यक्ष द्वारा हो रही देरी को देखते हुए अब सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जाएगा. सिंघार ने कहा कि कांग्रेस इस मामले में अंत तक लड़ाई लड़ेगी और दलबदल की प्रवृत्ति को बढ़ावा नहीं दिया जाएगा.
इस फैसले से मध्य प्रदेश कांग्रेस में निराशा है, जबकि सत्ताधारी भाजपा इसे अपने पक्ष में सकारात्मक विकास मान रही है. राजनीतिक गलियारों में इस घटनाक्रम से विधायकों के दलबदल और स्पीकर की भूमिका को लेकर नई बहस शुरू हो गई है. विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट में यह मामला दिलचस्प होगा क्योंकि दलबदल कानून की व्याख्या और स्पीकर की समयसीमा से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दे इससे जुड़े हैं.