
Kanwar Yatra 2026 Start and End Date: हिंदू धर्म में सावन के महीने और कांवड़ यात्रा का विशेष धार्मिक महत्व है. साल 2026 में भगवान शिव के भक्तों के लिए यह पावन सफर बेहद खास होने वाला है. इस साल सावन का महीना 30 जुलाई 2026 से शुरू हो रहा है, और इसी के साथ पवित्र कांवड़ यात्रा का भी शंखनाद हो जाएगा.
यदि आप भी इस वर्ष बाबा भोलेनाथ के दर्शन और जलाभिषेक की तैयारी कर रहे हैं, तो यात्रा की शुरुआत से लेकर समापन और जल चढ़ाने की सही तारीख नोट कर लें.
कांवड़ यात्रा 2026, तारीखें
| विशेष अवसर | तारीख (Date) |
| कांवड़ यात्रा की शुरुआत (सावन प्रारंभ) | 30 जुलाई 2026, गुरुवार |
| कांवड़ यात्रा का समापन (सावन शिवरात्रि) | 11 अगस्त 2026, मंगलवार |
| महादेव का जलाभिषेक (मुख्य तिथि) | 11 अगस्त 2026 |
11 अगस्त को चढ़ेगा महादेव को जल
कांवड़ यात्रा का समापन हमेशा सावन मास की शिवरात्रि के दिन होता है. इस वर्ष 11 अगस्त 2026 को सावन शिवरात्रि मनाई जाएगी. इसी दिन देश भर से गंगाजल लेकर लौटे शिवभक्त (कांवड़िए) भगवान शिव का जलाभिषेक करेंगे. मान्यता है कि पवित्र गंगाजल से शिवलिंग का अभिषेक करने से भोलेनाथ प्रसन्न होते हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं.
क्या होती है कांवड़ और कैसे शुरू होती है यात्रा?
कांवड़ मूल रूप से बांस या लकड़ी से बनी एक विशेष संरचना होती है. श्रद्धालु इसे रंग-बिरंगे झंडों, फूलों, घुंघरुओं, घंटियों और विभिन्न धार्मिक प्रतीकों से बेहद खूबसूरत तरीके से सजाते हैं.
इसके दोनों सिरों पर पवित्र नदियों (मुख्य रूप से गंगा जी) के जल से भरे कलशों को बांधा जाता है. श्रद्धालु इस कांवड़ को अपने कंधों पर उठाकर नंगे पैर, ‘बम-बम भोले’ और ‘हर-हर महादेव’ के जयकारों के साथ अपने गंतव्य की ओर बढ़ते हैं.
कांवड़ यात्रा के विभिन्न प्रकार: जानें कौन सी यात्रा है सबसे कठिन
शिवभक्त अपनी श्रद्धा, संकल्प और शारीरिक क्षमता के अनुसार अलग-अलग प्रकार की कांवड़ यात्रा चुनते हैं:
सामान्य कांवड़: इसमें श्रद्धालु अपनी सुविधा के अनुसार चलते हैं. वे रास्ते में बने सेवा शिविरों में आराम कर सकते हैं, भोजन कर सकते हैं और फिर यात्रा आगे बढ़ाते हैं.
डाक कांवड़: यह यात्रा अत्यधिक तेज गति और कड़े अनुशासन के साथ की जाती है. इसमें श्रद्धालु बिना रुके लगातार दौड़ते या चलते हुए गंतव्य तक पहुंचते हैं और जल चढ़ाते हैं.
खड़ी कांवड़: इस यात्रा का नियम है कि कांवड़ को कभी जमीन पर नहीं रखा जाता. जब एक श्रद्धालु आराम करता है, तो दूसरा साथी कांवड़ को अपने कंधे पर थामे रखता है. यह आपसी सहयोग और समर्पण का प्रतीक है.
दांडी कांवड़: इसे सबसे कठिन तपस्या माना जाता है. इसमें भक्त नदी तट से शिव मंदिर तक की पूरी दूरी दंडवत प्रणाम (लेटकर) करते हुए पूरी करते हैं. इस यात्रा को पूरा होने में कई सप्ताह या महीने भी लग सकते हैं.
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