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बिखरा मलबा, अधूरी टूटी बिल्डिंग, छात्र गायब और दुकानदारों का धंधा चौपट… हादसे के एक महीने बाद ऐसा है सत्य निकेतन – ग्राउंड रिपोर्ट | satya niketan building accident a month later debris missing students shopkeepers business loss ground report


6 सितंबर, 2026… ये वही तारीख है, जिस दिन राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में वो 5 मंजिला इमारत अचानक ढह गई, जिसमें छात्रों का पीजी चलता था. 6 सितंबर को सिर्फ बिल्डिंग नहीं ढही थी, इलाके में रहने वाले लोगों और छात्रों का भरोसा भी भरभराकर ढह गया था, जिसके सहारे ईंटों और सीमेंट से बनी छत के नीचे लोग सुकून की उम्मीद करते हैं. हादसे को एक महीना हो गया. कुछ मलबा हटाया गया, कुछ मौके पर मौजूद है. पीजी ओनर जेल में है. MCD ने फाइलों में बगल वाली इमारत में तोड़फोड़ और कुछ इमारतों को सील करने का आंकड़ा दिखाया. लेकिन इन सभी आंकड़ों के इतर जमीन पर कहानी कुछ और है.

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मेन रोड से करीब 170 कदमों की दूरी पर मौजूद हादसे वाली जगह और इसके आस-पास एक ऐसी दहशत तारी है, जो लोगों के कदमों और चलने पर बूटों से उड़ने वाली धूल में महसूस की जा सकती है. मौके पर अभी भी मौजूद मलबे का ढेर इस बात की गवाही दे रहा है कि इलाके में कुछ ही दिनों पहले ऐसा बवंडर आया था, जिसने कई जिंदगियां तबाह कर दीं और उसका जिक्र लोगों के ज़ुबान पर तब तक रहेगा, जब तक सत्य निकेतन का वजूद रहेगा.

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इलाके में छात्रों के लिए चल रही पीजी की इमारतों से बच्चे जा चुके हैं. लोगों ने यह भी बताया कि अब किराया कुछ कम भी हुआ है. एक छात्र के कमरा मालिक ने तो यहां तक कह दिया कि आप छोड़कर नहीं जाओ, एक महीने का किराया माफ कर दिया जाएगा. अगल-बगल की गलियों में मौजूद दुकानदारों का धंधा करीब आधा हो गया है.

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दिल्ली पुलिस की पीली बैरिकेडिंग अभी भी कुछ कोनों पर लगी है लेकिन ऐसा लगता है कि यहां पर अब इसका कोई काम नहीं है, क्योंकि जमीन पर पड़े मलबे का ढेर और ऊंचाई पर लटक रही आधी टूटी हुई बिल्डिंग के आस-पास लोगों की आवाजाही बराबर हो रही है. इन सभी पहलुओं के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतने बड़े हादसे के बाद क्या सिस्टम में कुछ बदलाव आया या सिर्फ सख्त फैसले खबरों की हेडलाइन मात्र बनकर हवा में धूल की तरह गायब हो गए.

इंटरएक्टिव में देखें: दिल्ली का ‘सत्य निकेतन हादसा’ छात्रों की रोज़मर्रा ज़िंदगी की सच्चाई!

राहगीरों को आवाज लगाती मौत!

जिस इमारत ने कई छात्रों की जान ले ली, उसके बगल में स्थित कमजोर बिल्डिंग को एमसीडी ने गिराने का फैसला किया. हादसे के बाद की गई कथित तत्काल कार्रवाई के तहत इमारत को आनन-फानन में गिराया गया. लेकिन एक महीने बाद भी मौके से दहशत के शोर को कम नहीं किया जा सका है. एमसीडी ने बिल्डिंग गिराने का जो काम शुरू किया था, अभी तक वो पूरा नहीं हो सका. ऐसा लगता है कि गली से गुजर रहे लोगों के सिर पर 40-50 फीट ऊंचाई से मौत आवाज लगा रही है. आधी गिर चुकी बिल्डिंग में लोहे की सरिया के साथ लटक रहा मलबा जैसे दहशत का प्रतिबिंब हो. अगर हवा में झूल रही यह बिल्डिंग गिर जाए, तो एक सत्य निकेतन में एक और बड़ा हादसा हो सकता है.

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हादसे ने छीनी गली की रौनक…

हादसे वाली जगह से थोड़ी ही दूरी पर दिल्ली यूनिवर्सिटी का साउथ कैंपस होने की वजह से सत्य निकेतन छात्रों की नजर काफी महंगा इलाका माना जाता है. आस-पास कैफे, चाइनीज फूड स्टॉल्स और कई तरह की दुकानें मौजूद हैं, जो छात्रों की जरूरत को पूरा करती हैं. लेकिन दुकानदारों का कहना है कि हादसे के बाद धंधा मंदा हो गया.

दिल्ली यूनिवर्सिटी के एआरएसडी कॉलेज की छात्रा निहारिका, हादसे का शिकार होने वाले पीजी के सामने वाली बिल्डिंग में रहती थीं, जिसके ओनर भी उसी में रहते हैं. वे बिल्डिंग गिरते वक्त मैं यहीं पर मौजूद थीं और अब मायापुरी में शिफ्ट हो गई हैं. उन्होंने बताया कि मेरे कई दोस्त इस इलाके से जा चुके हैं.

ढह चुकी पीजी की इमारत को याद करते हुए निहारिका कहती हैं, “यह बहुत अच्छी बिल्डिंग थी, मैं इसकी तारीफ भी किया करती थी. इसका वेंटिलेशन भी काफी अच्छा था. लेकिन हमें यह नहीं पता था कि इतना बड़ा हादसा हो जाएगा.”

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हादसे का शिकार हुई इमारत के ठीक सामने पिछले 9 साल से रेडीमेड कपड़े की शॉप चलाने वाले मोहम्मद रहबर कहते हैं, “इलाके से 50 फीसदी बच्चे जा चुके हैं. मेरे बिजनेस पर बुरा असर पड़ा है. दिन भर में 30-40 लोगों की जगह अब सिर्फ 8-10 लोग ही आ रहे हैं. हादसे के बाद मैं 22 सितंबर को शॉप खोल सका. पहले चहल-पहल बहुत ज्यादा होती थी लेकिन अब इस गली की रौनक खत्म हो गई है.

बिल्कुल बगल वाली गली में 15 हजार रुपए के किराए के कमरे में स्टेशनरी की शॉप चलाने वाले बुजुर्ग अशोक कुमार कहते हैं, “मेरी शॉप के सामने मलबे ढेर लगा हुआ था, जो 2-3 दिन पहले हटाया गया है. रात में गाड़ी आती है, मलबा ले जाती है. बच्चे कम होने की वजह से हमको नुकसान हुआ है. मेरा सिर्फ 20 फीसदी काम बचा रह गया है, 80 फीसदी नुकसान हो रहा है.

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हरियाणा के जींद के रहने वाले मुकुल रामलाल आनंद कॉलेज में बीएससी के छात्र हैं और हादसे के बाद सत्य निकेतन छोड़कर नारायणा (पश्चिम-दक्षिण दिल्ली का इलाका) में रहने लगे हैं. उनके लिए सत्य निकेतन का माहौल अब पूरी तरह से बदल गया है.

मुकुल कहते हैं, “हम लोग के बीच यह ‘हॉस्टल डेज’ पीजी बहुत फेमस था. इसकी बालकनी बहुत शानदार थी. हमने भी सोचा था कि इस बिल्डिंग में रूम लेकर रहेंगे लेकिन शुक्र है कि यहां रहने के लिए नहीं आए. हम लोग इसके आस-पास देर रात तक दोस्तों से बात करते हुए बैठे रहते थे. पीजी के नीचे अच्छी जगह थी, लोग देर रात तक खड़े होकर सुट्टा फूंका करते थे. मैं भी अपने दोस्तों के साथ जाता था. लेकिन अब सब कुछ बदल चुका है.”

उन्होंने आगे बताया कि मेरे एक दोस्त के ओनर ने उससे बोला कि तुम रूम छोड़कर मत जाओ, तुम्हारा एक महीने का किराया माफ कर दिया जाएगा.

बिहार के मुजफ्फरपुर के रहने वाले राकेश रामलाल कॉलेज से बीएससी कर रहे हैं. एक महीने पहले के माहौल को याद करते हुए वे कहते हैं, “रात के एक-दो बजे तक भीड़ हुआ करती थी, पुलिस वाले आकर हटने के लिए बोलते थे, लेकिन अब दिन में भी चहल-पहल नहीं है और रात में सूनापन बना रहता है.”

छात्र मुकुल (बाएं) और राकेश हादसे के बाद सत्य निकेतन छोड़कर जा चुके हैं.

छात्र मुकुल (बाएं) और राकेश हादसे के बाद सत्य निकेतन छोड़कर जा चुके हैं.

छात्रों ने सुनाई हैरतअंगेज कहानियां…

केरल से संबंध रखने वाली रामलाल आनंद कॉलेज की छात्रा देवप्रबा कहती हैं कि हादसे के बाद इलाके में रहने वाले लोग हमेशा चौकन्ने रहते हैं कि कहीं भी किसी भी वक्त कोई हादसा हो सकता है.

छात्रा निहारिका प्रशासन की लापरवाही पर बात करते हुए कहती हैं, “अभी तक मौके से मलबा नहीं हटाया जा सका है. अगल-बगल कुछ बिल्डिंग्स खाली कराई थीं लेकिन अब उसमें लोग नजर आने लगे हैं. सेफ्टी से जुड़ा कोई बड़ा बदलाव नहीं नजर आया है. इलाके में कई जर्जर इमारते हैं, जिसमें अब भी लोग रह रहे हैं. कई जगह तो ऐसा भी है कि एमसीडी के नोटिस को हटाकर लोग रहने लगे हैं. यह भी बोला गया था कि चौथी मंजिल से ऊपर वाले हिस्सों को बंद कर दिया जाएगा. ये सिस्टम का लूपहोल है कि अभी इस जगह की सफाई तक नहीं हो सकी है.”

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झारखंड के रांची के रहने वाले आयुष रामलाल आनंद कॉलेज के फर्स्ट ईयर के स्टूडेंट हैं. हादसे वाली जगह से 100 मीटर दूर स्थित मकान में रहते हैं. उनका कहना है कि मैं इसलिए इलाके को छोड़कर नहीं गया क्योंकि मेरे कमरे के मालिक भी उसी बिल्डिंग में रहते हैं.

“जब यह हादसा हुआ तो मैं मुश्किल से 50 मीटर की दूरी पर खड़ा था. हादसे के बाद यह बदला है कि रात में सोने पहले मेरे मन में यह बात आती है कि क्या मैं सुबह उठ पाऊंगा. क्या अपने दोस्तों से मिल पाऊंगा या नहीं. इलाके में जो डरावना माहौल है, वे इतनी जल्दी नहीं जाएगा.”

आयुष कहते हैं कि हादसे के बाद कोई पॉजिटिव बदलाव नहीं आया है. एक बिल्डिंग गिरने से लोगों में जागरूकता आ गई कि जो बिल्डिंग कमजोर हैं, उन्हें भी गिरा दिया जाए. लेकिन क्या बगल वाली बिल्डिंग गिराने के बाद यह जगह सुरक्षित है, क्या बच्चे सत्य निकेतन पर भरोसा कर सकते हैं?

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छात्र आयुष कहते हैं कि हादसे के बाद प्रशासन मामले को किसी भी तरह निपटाना चाह रहा था. लेकिन बगल वाली बिल्डिंग भी आधी गिराकर छोड़ दी गई है और मलबा पड़ा हुआ है. रात में वाहन आता है और मलबा ले जाता है लेकिन इतना कम ले जाता है कि इधर से रोज गुजरने के बाद भी देखने पर मुझे नहीं पता चलता कि यहां से मलबा हटाया जा रहा है. क्या प्रशासन इस हादसे को इस कदर भूल गया है कि यहां पर फैला मलबा अभी तक नहीं हटाया जा सका.

यूपी के बदायूं से संबंध रखने वाले कार्तिकेय, दिल्ली यूनिवर्सिटी के रामलाल आनंद कॉलेज में पढ़ाई करते हैं. वे इलाके के हालात पर फिक्र जाहिर करते हुए कहते हैं, “एक महीने गुजरने के बाद भी कुछ पॉजिटिव काम नहीं हुआ. हादसे के बाद कई नेता और बड़े लोग आए थे, छात्रों की मदद की गई. लेकिन जिस तरह का ठोस फैसला लिया जाना चाहिए था, वैसा अभी तक कुछ नहीं हुआ है. प्रशासन, एमसीडी ने भी अभी तक इस हादसे की अकाउंटेबिलिटी नहीं ली है. इस तरह की और भी बिल्डिंग्स में छात्र वैसे ही अभी भी रह रहे हैं.”

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