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राजस्थान के पाली में कांग्रेस के साथ क्या हुआ? 29 पार्षदों के बावजूद मेयर चुनाव में सिर्फ 3 वोट, BJP का कब्जा | Pali Mayor Election congress got only 3 votes despite 29 councillors Cross voting inside Stoty of BJP victory Rajasthan Nikay Chunav


जयपुर:

राजस्थान निकाय चुनाव में पाली नगर निगम मेयर चुनाव का परिणाम कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक झटका बनकर सामने आया है. 65 वार्डों में 29 पार्षद जीतने के बाद कांग्रेस को मेयर पद की मजबूत दावेदार माना जा रहा था, लेकिन चुनाव परिणाम ने सभी समीकरण बदल दिए. कांग्रेस की अधिकृत उम्मीदवार सुमित्रा जैन को मात्र 3 वोट मिले, जबकि बागी उम्मीदवार राजबाला हिंगड़ 29 वोट हासिल करने में सफल रहीं. दूसरी ओर भाजपा की नमिता बुबकिया 33 वोट लेकर मेयर बन गईं. नतीजों ने कांग्रेस की संगठनात्मक एकजुटता, प्रत्याशी चयन और रणनीति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

पाली महापौर की ‘कुर्सी’ का चुनावी गणित समझिए

पाली का परिणाम कांग्रेस के लिए सबसे ज़्यादा निराशाजनक रहा है. यहां कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी होकर भी महज़ तीन वोट ही हासिल कर पाई. पाली में नगर निगम चुनाव के 65 वार्डों में कांग्रेस के 29 पार्षद जीते. भाजपा के 21 और 15 निर्दलीय पार्षद चुनाव जीतकर आए.

पाली नगर निगम में जीत के बाद बीजेपी का जश्न

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बहुमत के लिए 33 वोट चाहिए थे. कांग्रेस बहुमत से सिर्फ चार वोट दूर थी. ऐसे में मेयर की कुर्सी के लिए कांग्रेस की स्थिति मजबूत मानी जा रही थी. लेकिन मेयर चुनाव तक पहुंचते-पहुंचते पूरा समीकरण बदल गया.

भाजपा की नमिता बुबकिया 33 वोट लेकर मेयर बन गईं. निर्दलीय राजबाला हिंगड़ को 29 वोट मिले जबकि कांग्रेस की अधिकृत प्रत्याशी सुमित्रा जैन सिर्फ 3 वोट पर रह गईं. पाली के इस चुनाव की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है आखिर इतनी बड़ी चूक कैसे हुई?

पाली के चुनाव में बीजेपी में मारी बाजी

पाली के चुनाव में बीजेपी में मारी बाजी

कहां से शुरू हुई कांग्रेस के लिए चुनौती?

पाली में पार्षदों के साथ कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी थी. वार्ड चुनाव के बाद कांग्रेस के पास 29 पार्षद थे. भाजपा 21 पर थी और 15 निर्दलीय चुनाव जीतकर आए थे. कांग्रेस को बहुमत के लिए सिर्फ चार और वोट चाहिए थे.

कांग्रेस के भीतर मेयर पद के लिए राजबाला हिंगड़ का नाम चर्चा में था. राजबाला हिंगड़ कांग्रेस से चुनाव जीतकर आई थीं और उनके नाम को लेकर स्थानीय स्तर पर भी चर्चा थी. इसके बाद समीकरण बदला.

कांग्रेस ने सुमित्रा जैन को अधिकृत प्रत्याशी बनाया. राजबाला हिंगड़ निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर मैदान में उतर गईं. यहीं से कांग्रेस के सामने असली चुनौती शुरू हुई. अब मुकाबला सिर्फ भाजपा से नहीं था. कांग्रेस के सामने अपने ही खेमे के भीतर बने नए समीकरण को संभालने की चुनौती थी.

बाड़ेबंदी बेअसर रही

चुनाव के बाद कांग्रेस के 29 पार्षदों की बाड़ेबंदी की गई. इस दौरान राजबाला हिंगड़ के साथ कांग्रेस के 21 पार्षद और 8 निर्दलीय पार्षद होने की बात सामने आई. इसके बाद भी कांग्रेस को उम्मीद थी कि मेयर चुनाव में परिणाम उसके पक्ष में जाएगा. लेकिन मेयर चुनाव के दिन तस्वीर बिल्कुल अलग निकली. राजबाला हिंगड़ को 29 वोट मिले. कांग्रेस की अधिकृत प्रत्याशी सुमित्रा जैन को सिर्फ 3 वोट मिले. दूसरी तरफ भाजपा की नमिता बुबकिया 33 वोट लेकर बहुमत के आंकड़े तक पहुंच गईं. कांग्रेस के 29 पार्षदों का आंकड़ा राजबाला के 29 वोट में लगभग पूरा दिखाई दिया जबकि पार्टी की अधिकृत प्रत्याशी तीन वोट पर सिमट गईं.

पाली में भाजपा के पास 21 पार्षद थे. मेयर चुनाव में नमिता बुबकिया को 33 वोट मिले. यानी भाजपा अपने मूल संख्या बल से 12 वोट ज्यादा लेकर बहुमत तक पहुंची. कांग्रेस के 29 पार्षदों के बावजूद अधिकृत प्रत्याशी को सिर्फ 3 वोट मिले और भाजपा 21 से बढ़कर 33 पर पहुंच गई.

गुप्त मतदान के कारण यह साफ तौर पर नहीं कहा जा सकता कि किस पार्षद ने किसे वोट दिया लेकिन नतीजे ने क्रॉस वोटिंग की चर्चाओं को जरूर जन्म दिया.

हार की जिम्मेदारी किसकी?

पाली में अब सवाल सिर्फ मेयर की कुर्सी हारने का नहीं है. सवाल यह भी है कि जब कांग्रेस के पास 29 पार्षद थे तो पार्टी अपने अधिकृत प्रत्याशी के पक्ष में सिर्फ तीन वोट ही क्यों जुटा पाई. पार्टी के भीतर प्रत्याशी चयन को लेकर भी सवाल खड़े हो गए हैं. सवाल यह भी कि राजबाला हिंगड़ की जगह सुमित्रा जैन के नाम पर किसने मोहर लगाई. हार की ज़िम्मेदारी किसकी है.

पाली में बीजेपी की जीत के पीछे कौन?

पाली के घटनाक्रम में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ की भूमिका को लेकर भी राजनीतिक चर्चा है. स्थानीय राजनीतिक घटनाक्रम से जुड़े लोगों के मुताबिक मेयर चुनाव से पहले भाजपा ने पाली में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी. इसे पार्टी अध्यक्ष के लिए प्रतिष्ठा का विषय बना लिया. इस जीत में मदन राठौड़ के देर रात पाली पहुंचने और रणनीति बनाने से लेकर स्थानीय प्रबंधन के राजनीतिक कौशल की बड़ी भूमिका रही. इसके अलावा पाली की राजनीति में सुनील भंडारी और पूर्व विधायक ज्ञानचंद पारख की भूमिका भी इस पूरे घटनाक्रम के बाद चर्चा में है. खास बात यह है कि स्थानीय राजनीति में जिन नेताओं के बीच पहले राजनीतिक मतभेद की चर्चा रही, वहीं अब भाजपा के मेयर बनाने की रणनीति में साथ दिखाई दिए. मेयर बनने के बाद नमिता बुबकिया के स्वागत के दौरान ज्ञानचंद पारख की ओर से मदन राठौड़ के समर्थन में नारे लगाए जाने की चर्चा भी राजनीतिक गलियारों में हुई.

इस पूरे घटनाक्रम ने कांग्रेस के भीतर प्रत्याशी चयन, संगठनात्मक तालमेल और पार्षदों को एकजुट रखने की रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं. राजबाला हिंगड़ को मिले 29 वोट और सुमित्रा जैन को मिले सिर्फ 3 वोट के बीच का अंतर ही पाली की पूरी कहानी कहता है.

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