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परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा, इसके बिना अधूरी मानी जाती है पूजा | Ekadashi Kab Hai Parivartini Ekadashi Vrat Katha in Hindi ekadashi ki katha



आज 22 सितंबर, मंगलवार को परिवर्तिनी एकादशी का व्रत रखा जा रहा है. यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है. भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की इस एकादशी को पद्मा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है. धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और व्रत करने से पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-शांति आती है. एकादशी की पूजा में व्रत कथा सुनने और पढ़ने का भी विशेष महत्व बताया गया है. माना जाता है कि कथा के बिना एकादशी की पूजा पूरी नहीं होती है. ऐसे में अगर आप भी आज व्रत रखने वाले हैं या श्रीहरि की पूजा करने वाले हैं, तो पूजा के बाद यहां से परिवर्तिनी एकादशी की कथा पढ़ सकते हैं. 

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार राजा युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से भाद्रपद कृष्ण पक्ष की एकादशी के बारे में पूछा. तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें परिवर्तिनी एकादशी की महिमा बताते हुए राजा मांधाता की कहानी सुनाई.

कथा के अनुसार, बहुत समय पहले मांधाता नाम के एक राजा हुआ करते थे. मांधाता धर्मप्रिय और न्याय करने वाले राजा थे. वे अपनी प्रजा को अपनी संतान की तरह मानते थे और हमेशा उनके सुख-दुख का ध्यान रखते थे. राजा के राज्य में लोग बहुत खुश थे. वहां समय पर बारिश होती थी और खेतों में अच्छी फसल होती थी. किसी को खाने की कमी नहीं थी. लोग अपने-अपने काम और धर्म का पालन करते हुए शांतिपूर्वक जीवन जी रहे थे.

राजा भी केवल न्याय से कमाया हुआ धन ही अपने पास रखते थे. उनके राज्य में किसी को बेवजह डर नहीं था. लोग सुखी और सुरक्षित जीवन जी रहे थे. लेकिन एक बार राजा मांधाता के राज्य पर बड़ा संकट आ गया. राज्य में लगातार तीन साल तक बारिश नहीं हुई. इससे खेत सूख गए और अन्न की कमी होने लगी. धीरे-धीरे प्रजा बहुत परेशान होने लगी. जब लोगों की परेशानी बढ़ गई तो वे सभी राजा मांधाता के पास पहुंचे. उन्होंने राजा से कहा, ‘महाराज, बारिश नहीं होने के कारण हमारा जीवन मुश्किल हो गया है. खेतों में अन्न नहीं उग रहा है. आप हमारी रक्षा करें और इस संकट का कोई रास्ता निकालें.’

राजा मांधाता भी इस स्थिति से चिंतित हो गए. उन्होंने सोचा कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है और इसका समाधान कैसे निकाला जाए. इसके बाद वह समाधान की तलाश में जंगल की ओर निकल पड़े.

जंगल में घूमते हुए राजा मांधाता को कई ऋषियों और तपस्वियों के आश्रम दिखाई दिए. एक दिन उनकी मुलाकात ब्रह्मा जी के पुत्र माने जाने वाले ऋषि अंधिरा से हुई. ऋषि को देखते ही राजा उनके पास गए. उन्होंने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया. ऋषि ने भी राजा का स्वागत किया और उन्हें बैठने के लिए आसन दिया. कुछ देर बाद ऋषि ने राजा से वहां आने का कारण पूछा, तब राजा ने उन्हें सारी परेशानी बता दी. राजा ने ऋषि को बताया कि उनके राज्य में तीन साल से बारिश नहीं हुई है. प्रजा बहुत परेशान है. लोग भूख से परेशान हो रहे हैं. 

राजा की बात सुनकर ऋषि अंधिरा ने उन्हें बताया कि उस समय सत्ययुग चल रहा था. उस युग में तपस्या करने का अधिकार मुख्य रूप से ब्राह्मणों को माना जाता था. लेकिन राजा के राज्य में एक शूद्र तपस्या कर रहा था. ऋषि ने कहा कि इसी कारण बारिश नहीं हो रही है. उन्होंने राजा को इस समस्या का समाधान करने के लिए धार्मिक उपाय बताया.

लेकिन राजा मांधाता ने उस तपस्या करने वाले व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने से साफ मना कर दिया. राजा ने कहा कि वह व्यक्ति निर्दोष है, इसलिए उसे हटाना उचित नहीं होगा. राजा ने ऋषि से ऐसा धार्मिक उपाय बताने को कहा, जिससे समस्या दूर हो सके.

राजा की बात सुनकर ऋषि ने उन्हें भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करने की सलाह दी. यही एकादशी परिवर्तिनी या पद्मा एकादशी कहलाती है. ऋषि ने राजा से कहा कि वह अपने परिवार और प्रजा के साथ मिलकर विधि-विधान से यह व्रत करें. राजा ने ऋषि की बात मान ली. वे अपने राज्य में वापस आए और उन्होंने प्रजा के साथ मिलकर परिवर्तिनी एकादशी का व्रत किया. धार्मिक कथा के अनुसार, व्रत के प्रभाव से राज्य में फिर बारिश होने लगी. धरती पानी से भर गई, खेतों में हरियाली लौट आई और प्रजा की परेशानियां दूर हो गईं. पूरा राज्य फिर से सुखी हो गया.

धार्मिक मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धा से परिवर्तिनी एकादशी का व्रत करता है और इसकी कथा सुनता या पढ़ता है, उसे भी राजा मांधाता की तरह पुण्य फल प्राप्त होता है.

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

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