
राजस्थान में एक बार फिर से भील प्रदेश की मांग तेज हो गई है. शुक्रवार को बांसवाड़ा जिले के मानगढ़ धाम में अलग ‘भील प्रदेश’ की मांग को लेकर बड़ा आदिवासी महासम्मेलन और भील प्रदेश संदेश यात्रा आयोजित होगी. इस महा सम्मेलन में राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र से बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय के लोग शामिल होंगे. इस आयोजन को देखते हुए मौके पर प्रशासन ने तैयारी पूरी कर ली है. सुरक्षा और ट्रैफिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए सख्त इंतजाम किए गए हैं.
साथ में 2 रोटी और गुड लाने की अपील
उधर आयोजकों ने कार्यक्रम में शामिल होने वाले लोगों से अनुशासन बनाए रखने की अपील की है. भीड़ को देखते हुए कार्यक्रम में आने वाले लोगों से अपने साथ दो रोटी और गुड़ लाने का आग्रह किया गया है. साथ ही किसी भी प्रकार का नशा या शराब पीकर कार्यक्रम में नहीं आने की अपील की गई है. बाइक से आने वाले युवाओं से हेलमेट पहनने और यातायात नियमों का पालन करने को कहा गया है.
4 राज्यों के करीब 39 जिलों होंगे शामिल
देश के आदिवासी (भील) समुदाय के कुछ संगठन लंबे समय से ‘भील प्रदेश’ नाम से अलग राज्य बनाने की मांग कर रहे हैं. प्रस्तावित राज्य में राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के आदिवासी बहुल क्षेत्रों को शामिल करने की बात कही जाती है. समर्थकों का दावा है कि चार राज्यों के करीब 39 आदिवासी बहुल जिलों को मिलाकर नया राज्य बनाया जाना चाहिए.
मांग करने वाले संगठनों का कहना है कि आदिवासी बहुल क्षेत्रों में अपेक्षित विकास नहीं हो पाया है. उनका तर्क है कि जल, जंगल और जमीन पर आदिवासियों के पारंपरिक अधिकारों की बेहतर सुरक्षा, स्थानीय संस्कृति, भाषा और पहचान के संरक्षण तथा क्षेत्र के समग्र विकास के लिए अलग राज्य आवश्यक है.
भील प्रदेश की मांग करने वाले संगठन इस आंदोलन को वर्ष 1913 के मानगढ़ आंदोलन और मानगढ़ नरसंहार से भी जोड़ते हैं. 17 नवंबर 1913 को मानगढ़ पहाड़ी पर गोविंद गुरु के नेतृत्व में एकत्रित आदिवासियों पर ब्रिटिश सेना ने गोलीबारी की थी. आदिवासी समाज इस घटना को अपने इतिहास, संघर्ष और अस्मिता का महत्वपूर्ण प्रतीक मानता है. इसी कारण मानगढ़ धाम इस आंदोलन का प्रमुख केंद्र माना जाता है.
भील प्रदेश का नया नक्शा

अलग भील प्रदेश की मांग में राजस्थान के बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़ और उदयपुर के कुछ हिस्सों के अलावा गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के आदिवासी बहुल सीमावर्ती क्षेत्रों को शामिल करने की मांग की जाती है. हालांकि, इसकी कोई आधिकारिक या संवैधानिक रूप से स्वीकृत सीमा निर्धारित नहीं है.
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