खबर

सिस्टम को जगाने की जिद में सोना छोड़ बैठा जंतर मंतर… एक रात की कहानी | An Entire Night Spent at Jantar Mantar A Different Perspective on the Protest our experience


मुंबई…देश की आर्थिक राजधानी. इस शहर के बारे में कहा जाता है कि ये कभी सोता नहीं है. इसी मुंबई के पूरे 1280 किलोमीटर दूर है दिल्ली. दिल्ली यानी देश की राजधानी. दिल्ली अगर देश का दिल है तो दिल्ली का दिल है कनॉट प्लेस और इसी कनॉट प्लेस के पास है जंतर मंतर. दिल्ली का ये दिल पिछले एक महीने के एक अलग रफ्तार में धड़क रहा है. वजह है यहां चल रहा कॉकरोच जनता पार्टी का धरना. आप पूछेंगे कि इस धरने का या जंतर मंतर का मुंबई से क्या कनेक्शन? तो इस सवाल का जवाब है कि जंतर मंतर भी इन दिनों मुंबई की तरह सोना भूल गया है.
     
रात के 12 बजे हों या तड़के के चार…जंतर-मंतर की लाइटें बुझती नहीं हैं. कंक्रीट के फर्श पर गत्ते बिछाकर सोते कुछ लोग दिखेंगे लेकिन उनसे कई गुना ज्यादा लोग दिखेंगे नारे लगाते, क्रांति के गीत गाते, पोस्टर-प्लेकार्ड लहराते. कुछ लोग खाना बांटते दिखेंगे तो कुछ साफ-सफाई अभियान चलाते, कचरा बीनते भी. दीवारों पर नए स्लोगन उकेरते, गरमी से जूझ रहे साथियों के लिए पंखा झलते लोग भी जैसे जंतर मंतर को जगाए रखने का जुनून पाले हैं. जंतर मंतर की इसी जागती हुई रात का गवाह बना मैं जब 23 जुलाई की रात मैंने गुजारी यहां के प्रदर्शनकारियों के साथ.

दिल्ली का जंतर मंतर लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन का सबसे बड़ा प्रतीक है. कई दफा यहां आने का मौका मिला, लेकिन तब का जंतर-मंतर और आज का जंतर-मंतर अलग है, यहां स्थिति बदल चुकी है. विरोध प्रदर्शन तब भी होते थे, आज भी हो रहे हैं, लेकिन उनका स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है. इसकी एक बड़ी वजह सड़कों पर खड़ा वो जेन जी है जिसे ना इस समय रात की नींद की परवाह है और ना ही भूख की. बस अपनी मांगों को लेकर सरकार से लड़ने की एक जिद है. गुस्सा तो इन्हें भी दिखाना है, लेकिन जताने का तरीका एकदम अलग. कहीं ऐसे पोस्टर हैं जो सोचने पर मजबूर कर रहे हैं, कई ऐसे नारे हैं जो अनायास मुस्कान ला देते हैं और कुछ पल ऐसे भी हैं जो आंखें नम कर जाते हैं.

Advertisement – Scroll to continue

रात आठ बजे: जंतर मंतर पर लगा मेला

23 जुलाई की रात को हमने जंतर-मंतर के लिए कूच किया था. रास्ता लंबा था, लेकिन जाम उससे भी ज्यादा. नोएडा की गलियों से गुजरते हुए जैसे ही रात आठ बजे दिल्ली के कनॉट प्लेस में दाखिल हुए, माहौल बदला-बदला सा था. इस बार यहां मौजूद युवा ना शॉपिंग कर रहा था, ना ही उसे स्वादिष्ट पकवानों का आनंद लेना था. बस जुबान पर एक सवाल था- भैया प्रोटेस्ट साइट पर कहां से पहुंचना है? कितने छात्र थे, कितने सच में नीट के अभ्यार्थी और कितने सिर्फ समर्थक, यह बताना मुश्किल है, लेकिन एक बात साफ थी- यहां ना किसी की जाति मायने रख रही थी और ना ही धर्म आड़े आ रहा था. सभी को सिर्फ एक मुहिम के साथ जुड़ने का जुनून सा था.

पुलिस की इतनी पहरेदारी भी पहली बार ही देखी थी. संसद के पास का इलाका है तो सख्ती होना स्वभाविक है, लेकिन हर तरफ पुलिस की बैरिकेडिंग, रैपिड एक्शन फोर्स की तैनाती साफ इशारा कर रही थी कि हालात सामान्य नहीं है और हर तरह की स्थिति से निपटने की तैयारी है. 

Jantar Mantar Protest

सीपी में भारी पुलिस फोर्स तैनात
Photo Credit: NDTV

जिस सड़क पर आम दिनों में गाड़ियां फर्राटे भरती थीं, वहां आज चलने की भी जगह नहीं थी. हमें पहले लगा था जब तक प्रदर्शन स्थल के पास नहीं पहुंचेगे, आंदोलन का असल रंग नहीं जमेगा. लेकिन सीपी पर उतरते ही हम गलत साबित हुए. उस रात ऐसा लग रहा था मानो जंतर मंतर सिर्फ एक जगह तक सीमित नहीं था बल्कि पूरे इलाके में फैल गया था. सीपी की पतली-पतली गलियों से लेकर दिल्ली के सबसे पुराने मूवी थिएटर ‘रीगल सिनेमा’ तक, हर तरफ युवाओं का हुजूम था, हाथों में तख्तियां थीं और जुबान पर सिर्फ एक ही मांग-‘धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दो.’

रात नौ बजे: इंटरनेट गायब, परेशान हुए लोग

इन नारों के बीच हम अपने सफर पर आगे बढ़ते गए और घड़ी की सुई इशारा कर रही थी रात के नौ बजे. जहां भीड़ जा रही थी, उसी तरफ हम भी निकल पड़े. पूरे इलाके में नेटवर्क काफी कमजोर था, इंटरनेट बंद हो चुका था और जगह-जगह लगे जैमर फोन का कनेक्शन तोड़ रहे थे. यूपीआई के आदि हो चुके कई लोग 500 रुपये के नोट लेकर एक दुकान से दूसरी दुकान छुट्टे के लिए भाग रहे थे. यहां हमें आंदोलन का एक नया पहलू भी दिखाई दिया. बात सिर्फ पेपर लीक तक सीमित नहीं रह चुकी थी, सवाल ये भी गूंज रहा था- हमारा इंटरनेट क्यों बंद कर दिया गया. कुछ ऐसे प्रदर्शनकारी भी वहां टकराए जो पूरे दिन आंदोलन में शामिल होने के बाद अपने ठिकाने पर वापस लौटना चाहते थे. लेकिन वहां बंद इंटरनेट की वजह से न कैब बुक हो पा रही थी और न ही ऑनलाइन ऑटो मिल रहा था.

रात 10 बजे: जंतर मंतर पर हुई धक्का मुक्की

दो किलोमीटर के करीब चलकर हम 10 बजे तक उस जगह पहुंच चुके थे जहां प्रदर्शनकारियों का सबसे बड़ा हुजूम मौजूद था. यहां धक्का मुक्की शुरू हो चुकी थी, खड़े होने की कोई जगह नहीं थी. जैसे-तैसे हम उस भीड़ को चीरते हुए आगे बढ़े तो एक शख्स ने रोक दिया, उसके हाथ में तख्ती थी. उस पर लिखा था-  ‘या तो इस्तीफा लेकर जायेंगे या तो कफन में लिपट कर जायेंगे’.

जंतर-मंतर पर जारी विरोध प्रदर्शन

जंतर-मंतर पर जारी विरोध प्रदर्शन
Photo Credit: NDTV

हमारे कैमरे पर नजर पड़ते ही एक महिला प्रदर्शनकारी भी आगे आ गई. उसके हाथ में भी पोस्टर था, लेकिन नाराजगी धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से ज्यादा मेट्रो सेवा बंद होने को लेकर थी। तंज भरे अंदाज में उसने बोला-‘मेट्रो बंद करके कितना पेट्रोल बचा लिया?’

जंतर-मंतर पर जारी विरोध प्रदर्शन

जंतर-मंतर पर जारी विरोध प्रदर्शन
Photo Credit: NDTV

रात 12 बजे: यूट्यूबर्स कर रहे पत्रकार बनने की कोशिश

अब अगर हाथों में पोस्टर लिए आंदोलनकारी थे तो उन्हें कैमरे में कैद करने के वाले भी कम नहीं थे. यहां बात सिर्फ पेशेवर पत्रकारों की नहीं हो रही थी. बड़ी संख्या में ऐसे यूट्यूबर्स मौजूद थे जिन्होंने सिर्फ एक मोबाइल फोन के सहारे रिपोर्टिंग शुरू कर दी थी. पत्रकारिता के पारंपरिक नियमों से उनका कितना वास्ता था, यह बता पाना मुश्किल है, लेकिन भीड़ का हर नया मूवमेंट उनके लिए कंटेंट और व्यू का सहारा था. जहां नजर जाती, वहां कोई न कोई कैमरा ऑन किए लाइव या रिकॉर्डिंग करता दिखाई दे रहा था. घड़ी में उस वक्त रात के 12 बज चुके थे, लेकिन इन युवा यूट्यूबर्स का उत्साह और उनके पास खड़ी भीड़ का जोश अलग ही था.

रात एक बजे: पत्रकारों के साथ हुई मारपीट

लेकिन इसी भीड़ के बीच एक ऐसा पल भी आया जिसने काफी बेचैन कर दिया. रात का करीब एक बज चुका था और सड़क पर लोगों की संख्या बढ़ती जा रही थी. तभी भीड़ में किसी ने जोर से चिल्लाया-‘गोदी मीडिया, गोदी मीडिया.’ अगले कुछ सेकेंड में माहौल पूरी तरह बदल चुका था. हमारी आंखों के सामने कुछ लोगों के साथ मारपीट शुरू हो गई. कौन थे, कहां से आए थे, यह पता नहीं चल पाया. बस लात-घूंसे चलते रहे, गाली-गलौज होती रही और कुछ देर के लिए भीड़ पूरी तरह बेकाबू हो गई.

रात दो बजे: पुलिस बैरिकेड्स पर प्रदर्शनकारियों का कब्जा

उस तनाव को पीछे छोड़ हम अपने सफर पर आगे बढ़ गए. रात दो बजे भी जगह-जगह पुलिस के बैरिकेड्स लगे थे. लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह थी कि उन बैरिकेड्स पर पुलिस नहीं, बल्कि प्रदर्शनकारियों ने कब्जा कर रखा था. देर रात बैठने की कोई जगह नहीं बची थी, इसलिए कई लोगों ने उन्हीं बैरिकेड्स को अपना आसरा बना लिया. कोई उन पर बैठा था, कोई लेटा था. ऊपर बैठे लोग नारे लगाते और नीचे खड़े सैकड़ों लोग उन्हें एक साथ दोहराते. कहीं देशभक्ति के गीत तेज आवाज में बज रहे थे तो कहीं सरकार पर तंज कसती पैरोडी माहौल गरमा रही थी. आधी रात के बाद भी जंतर मंतर पर ऐसा महसूस ही नहीं हुआ कि ये शहर सो चुका है. यहां तो आंदोलन अपनी पूरी रफ्तार, पूरे कलेवर के साथ जिंदा था.

जंतर-मंतर पर जारी विरोध प्रदर्शन

जंतर-मंतर पर जारी विरोध प्रदर्शन
Photo Credit: NDTV

लेकिन इस जोश से भरे आंदोलन में ऐसे लोगों पर भी हमारी नजर गई जो शायद किसी मांग से ज्यादा किसी की बेइज्जती करने के इरादे से वहां आए थे. लोकतंत्र में आंदोलन करने की आजादी है, जंतर-मंतर इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने है. लेकिन बीती रात ऐसे कई मौके आए जब नारेबाजी के नाम पर देश के प्रधानमंत्री को लेकर अपशब्द कहे गए. देश के गृहमंत्री को लेकर ऐसी भाषा का प्रयोग हुआ जिसका जिक्र यहां नहीं किया जा सकता. कुछ पोस्टरों और तस्वीरों में भी अश्लीलता साफ नजर आ रही थी. दूसरे प्रदर्शनकारी ऐसे लोगों को रोक रहे थे, टोक रहे थे, लेकिन इसका कोई खास असर नहीं हुआ. ये सब देख मन में सवाल जरूर आया- क्या आंदोलन कहीं अपनी मूल मांग से भटक तो नहीं गया?

वैसे जंतर मंतर पर बिताई उस पूरी रात में आंदोलन के एक मानवीय चेहरे से भी हम रूबरू हो गए. ‘ह्यूमन चेन’ के बारे में कई बार सुना था, लेकिन पहली बार उसका ऐसा इस्तेमाल देखा. एक नहीं, कई जगह प्रदर्शनकारियों ने ह्यूमन चेन बनाकर सफाई अभियान चलाया. इस बात का पूरा ध्यान रखा गया कि विरोध प्रदर्शन के नाम पर सड़कों पर गंदगी ना फैल जाए. नारेबाजी लगातार जारी थी, लेकिन उसके साथ समाज के प्रति जिम्मेदारी का एहसास भी साफ दिखाई दे रहा था.

इसी दौरान सिख समुदाय के लोगों की सेवा भावना ने भी दिल छू लिया. देर रात गरम-गरम परांठे बांटे जा रहे थे तो कहीं फल और पानी की व्यवस्था थी. छोटे-छोटे लंचबॉक्स बनाकर भी लोगों को दिए जा रहे थे. कोशिश बस इतनी थी कि आंदोलन में शामिल कोई भी व्यक्ति भूखा ना रह जाए.

रात तीन बजे: मुख्य मंच तक पहुंचे, बड़ा ऐलान

इन सब अनुभवों के बीच रात के तीन बज चुके थे. हमें बताया गया कि मुख्य मंच तक पहुंचना आसान नहीं होगा. भीड़ भी बहुत ज्यादा है और सुरक्षा भी इतनी कड़ी कि वहां तक पहुंचना लगभग नामुमकिन है. तभी किसी ने पीछे का एक रास्ता सुझा दिया. वह मुख्य प्रदर्शन स्थल से काफी दूर था, लेकिन मंच तक पहुंचने का वही एक मात्र विकल्प बचा था. हमने भी देर रात एक बार फिर मंच तक पहुंचने की कोशिश करने का फैसला किया. कुछ लोग हमारे साथ हो गए और हम सभी दूसरे रास्ते पर निकल पड़े.

करीब दो-तीन किलोमीटर पैदल चलने के बाद हम उस जगह पहुंचे जहां से मंच का पिछला हिस्सा दिखाई दे रहा था. वहां बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी तैनात थे. शुरुआत में हमें आगे जाने से रोक दिया गया, लेकिन मीडिया कार्ड दिखाने के बाद एंट्री मिल गई. सामने विशाल मंच था. मंच पर AISA और CJP से जुड़े लोग मौजूद थे और उनके सामने हजारों की भीड़ बैठी थी. देर रात का वक्त था, लेकिन माहौल किसी बड़ी राजनीतिक रैली से कम नहीं लग रहा था.

जंतर-मंतर पर जारी विरोध प्रदर्शन

जंतर-मंतर पर जारी विरोध प्रदर्शन
Photo Credit: NDTV

जब हम वहां पहुंचे, उस समय AISA की अध्यक्ष नेहा बोरा मंच से अपना संबोधन दे रही थीं. अपने भाषण के दौरान उन्होंने ऐलान किया कि आंदोलन सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं रहेगा. 25 जुलाई को बिहार बंद का आह्वान किया गया है और इलाहाबाद में भी बड़े प्रदर्शन की तैयारी की जा रही है. ऐलान होते ही पूरा मैदान ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारों से गूंज उठा.

सुबह चार बजे: बंगला साहिब बना प्रदर्शनकारियों का पनाहगाह

करीब आधा घंटा वहां बिताने के बाद हम किसी तरह भीड़ से बाहर निकले और बंगला साहिब गुरुद्वारे की ओर चल पड़े. इरादा कुछ देर आराम करने का था, लेकिन वहां पहुंचकर एक अलग ही दृश्य देखने को मिला. सुबह के चार बज रहे थे और प्रदर्शनकारियों के लिए बंगला साहिब पनाहगाह बन चुका था. बड़ी संख्या में लोग खुले परिसर में चैन की नींद सो रहे थे, वहीं दूसरी ओर लंगर लगातार चल रहा था.



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button