

शिवसेना बनाम शिवसेना मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा कि बार-बार कोट किए जाने वाले सुभाष देसाई फैसले को अयोग्यता के सवाल पर लागू नहीं माना जा सकता. सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने कहा कि सुभाष देसाई मामला मुख्य रूप से विधायक दल के नेता और व्हिप की नियुक्ति से जुड़ा था, न कि विधायकों की अयोग्यता से.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सुभाष देसाई फैसला अयोग्यता के मुद्दे पर फैसला नहीं था. वह फैसला राजनीतिक दल और उसके विधायक दल के संबंधों से जुड़ा था. अदालत ने माना कि विधायक दल कोई स्वतंत्र इकाई नहीं है, बल्कि वह राजनीतिक दल से ही अपनी पहचान प्राप्त करता है. इसलिए विधायक दल का नेता या व्हिप कौन होगा, यह राजनीतिक दल के निर्णय पर निर्भर करता है.
अयोग्यता अलग कानूनी मुद्दा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अयोग्यता का सवाल पूरी तरह अलग कानूनी जांच का विषय है. कोर्ट ने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष को यह देखना होता है कि संबंधित विधायक के आचरण से क्या यह साबित होता है कि उसने स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ दी है. केवल व्हिप या विधायक दल के नेतृत्व से जुड़ा विवाद अयोग्यता तय करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता.
जून 2022 की घटनाओं का भी जिक्र
सुनवाई के दौरान जून 2022 के घटनाक्रम का भी जिक्र हुआ, जब तत्कालीन पार्टी नेतृत्व ने विधायकों को एक बैठक में शामिल होने का निर्देश दिया था. कोर्ट में सवाल उठा कि क्या बैठक में शामिल न होना पार्टी नेतृत्व को चुनौती देने के समान है? और क्या इसे स्वेच्छा से पार्टी छोड़ने का संकेत माना जा सकता है?
इस पर अदालत ने टिप्पणी की कि आम तौर पर अयोग्यता याचिका दाखिल होने के बाद की घटनाओं को निर्णय का आधार नहीं बनाया जाता. मामले की सुनवाई अब अगले सप्ताह भी जारी रहेगी.
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