
नई दिल्ली:
अगले साल होने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव में सिर्फ ‘उड़ता पंजाब’ (नशे से जूझता पंजाब), ‘डरता पंजाब’ (असुरक्षा और डर का माहौल) या ‘बेरोजगार पंजाब’ जैसे मुद्दों पर ही चर्चा नहीं होगी, बल्कि ‘कंगाल पंजाब’ भी चुनावी बहस का बड़ा मुद्दा बन सकता है.
पंजाब पिछले करीब दो दशक से सामाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक और वित्तीय समस्याओं का सामना कर रहा है. इन मुद्दों पर लंबे समय से बहस होती रही है. साल 2022 में जनता ने आम आदमी पार्टी (आप) को ऐतिहासिक बहुमत दिया था. पार्टी ने ‘रंगला पंजाब’ यानी खुशहाल और विकसित पंजाब बनाने का वादा किया था. अब जब आप सरकार अपना कार्यकाल पूरा करने की ओर बढ़ रही है, तो वही पुरानी समस्याएं नई चुनौतियों के साथ फिर सामने आ गई हैं. माना जा रहा है कि 2027 के चुनाव में यही मुद्दे सबसे ज्यादा चर्चा में रहेंगे.
भगवंत मान सरकार की मुफ्त वाली योजनाएं कौन कौन सी हैं
राजनीतिक रूप से ‘मुख्यमंत्री मावां-धियां सत्कार योजना’, 300 यूनिट मुफ्त बिजली और मुख्यमंत्री सेहत योजना जैसी योजनाओं से आप को कुछ हद तक राजनीतिक फायदा मिला है. लेकिन आलोचकों का कहना है कि इन योजनाओं ने पंजाब की पहले से कमजोर आर्थिक स्थिति पर और ज्यादा बोझ डाल दिया है. विश्लेषकों के अनुसार, करीब 65 लाख परिवारों को कैशलेस स्वास्थ्य सुविधा, लगभग 62 लाख घरों को हर महीने 300 यूनिट मुफ्त बिजली और करीब 68.5 लाख महिलाओं को 1,000 से 1,500 रुपये प्रतिमाह की आर्थिक सहायता देने पर सरकार का बहुत बड़ा खर्च हो रहा है. इससे पहले से कर्ज में डूबे पंजाब पर वित्तीय दबाव और बढ़ गया है.
इन सभी योजनाओं पर सरकार का सालाना खर्च करीब 17,071 करोड़ रुपए है. यह राशि राज्य की अनुमानित स्वयं की कुल आय का 15 फीसद से अधिक है. आलोचकों का कहना है कि यह खर्च मुख्य रूप से लोगों की खपत पर हो रहा है, न कि ऐसे निवेश पर जिससे भविष्य में आय बढ़े या अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक फायदा मिले. इसलिए इससे राज्य को स्थायी आर्थिक लाभ मिलने की संभावना कम है.
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि अगर सरकार का ज्यादा पैसा ऐसी योजनाओं पर खर्च होता है, जिनसे कोई स्थायी संपत्ति नहीं बनती, तो राज्य की लंबे समय में आय बढ़ाने की क्षमता कमजोर हो जाती है. इससे पंजाब को अपने नियमित खर्च पूरे करने के लिए लगातार कर्ज लेना पड़ सकता है.
सब्सिडी पर खर्च होता पंजाब का खजाना
पंजाब में मुफ्त और सब्सिडी वाली योजनाओं की सूची यहीं खत्म नहीं होती. इन योजनाओं के अलावा राज्य सरकार अपने कुल बजट का करीब 22 फीसद यानी 18,211 करोड़ रुपये से अधिक, कृषि बिजली सब्सिडी, औद्योगिक बिजली सब्सिडी, महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा, सामाजिक सुरक्षा पेंशन, सस्ते राशन और घर-घर राशन पहुंचाने की योजना, आम आदमी क्लीनिक और शहरी क्षेत्रों में पानी और सीवर शुल्क में छूट जैसी योजनाओं पर भी खर्च कर रही है.

मुख्यमंत्री भगवंत मान का पंजाब के बढ़ते कर्ज को लेकर रुख हमेशा एक जैसा रहा है. उनका कहना है कि मौजूदा कर्ज के लिए पिछली सरकारें जिम्मेदार हैं. उनकी सरकार धीरे-धीरे पूरे कर्ज का भुगतान कर देगी. मुख्यमंत्री मान का कहना रहा है,”पिछली सरकार हमारे लिए साढ़े तीन लाख करोड़ रुपये का कर्ज छोड़कर गई थीं. लेकिन उन्होंने यह पैसा आखिर खर्च कहां किया? हमारी सरकार सड़कें बना रही है, सरकारी स्कूलों को बेहतर कर रही है, विश्वविद्यालयों को पैसा दे रही है, बिजली बोर्ड का कर्ज चुका रही है, अस्पताल बना रही है और युवाओं को रोजगार दे रही है.”
पंजाब की बिगड़ती वित्तीय सेहत
आप ने सत्ता में आने से पहले ‘रंगला पंजाब’ यानी खुशहाल और समृद्ध पंजाब बनाने का वादा किया था. लेकिन पंजाब के वित्तीय आंकड़े बताते हैं कि पंजाब की आर्थिक स्थिति पहले से ज्यादा कमजोर हुई है. यही वजह है कि विपक्ष अब इसे ‘कंगाल पंजाब’ कहकर सरकार पर निशाना साध रहा है.
वित्त वर्ष 2026-27 के पंजाब बजट के मुताबिक, मार्च 2022 में आप की सरकार बनने के बाद से इस वित्तीय वर्ष के अंत तक राज्य पर लिया गया कुल कर्ज 1.65 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो जाएगा. इसके साथ ही पंजाब का कुल कर्ज बढ़कर करीब 4.50 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है. इससे साफ है कि सरकार ने खर्च कम करने और वित्तीय सुधार करने के बजाय कर्ज लेकर काम चलाने की पुरानी व्यवस्था को ही जारी रखा है.
विधानसभा चुनाव के बाद जो भी पार्टी पंजाब में सरकार बनाएगी, उसे बेहद गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ेगा. अनुमान है कि राज्य के बजट का 70 से 80 फीसद हिस्सा केवल पुराने कर्ज की किस्तें और ब्याज चुकाने में ही खर्च हो जाएगा. इसके बाद बची हुई राशि से ही मुफ्त योजनाओं और सरकार की दूसरी जरूरी जिम्मेदारियों को पूरा करना होगा. विश्लेषकों का कहना है कि मुफ्त योजनाओं के लिए बजट में पर्याप्त धन नहीं होने के कारण मौजूदा सरकार और पिछली सरकारें अक्सर विकास कार्यों के लिए तय किए गए पैसे को दूसरी योजनाओं में खर्च करती रही हैं. हाल ही में पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने निर्माण श्रमिक कल्याण कोष का पैसा ‘मुख्यमंत्री मावां-धियां सत्कार योजना’ में लगाने पर रोक लगा दी है. अदालत ने इस धनराशि को दूसरी योजना में स्थानांतरित करने पर अंतरिम रोक लगाने का आदेश दिया.
हाई कोर्ट ने क्यों रोका पंजाब सरकार का प्रचार अभियान
पंजाब सरकार को एक और बड़ा झटका तब लगा, जब पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने करीब छह लाख सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को महंगाई भत्ते (डीए) का बकाया नहीं देने पर सरकार को कड़ी फटकार लगाई.
सरकार ने अदालत में कहा था कि कर्मचारियों को पहले से ही अच्छी-खासी तनख्वाह मिल रही है, इसलिए बकाया डीए तुरंत देना संभव नहीं है. सरकार ने यह भी अनुरोध किया था कि डीए का बकाया पांच साल की किस्तों में चुकाने की अनुमति दी जाए. लेकिन हाई कोर्ट ने इस मांग को खारिज कर दिया. अदालत ने सरकार को 16 दिनों के भीतर भुगतान करने का आदेश दिया. इसके लिए सरकार को करीब 14,000 करोड़ रुपये की व्यवस्था करनी थी. इससे राज्य की कमजोर वित्तीय स्थिति भी उजागर हुई.
हाई कोर्ट ने सरकार के विज्ञापनों पर होने वाले भारी खर्च की भी आलोचना की. अदालत ने कहा कि जब तक कर्मचारियों का डीए बकाया नहीं चुकाया जाता, तब तक सरकार विज्ञापनों पर पैसा खर्च नहीं कर सकती है. इससे पहले विपक्षी दल भी आरोप लगा चुके हैं कि मान सरकार ने राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (एसडीआरएफ) का पैसा बाढ़ प्रभावित लोगों की मदद के बजाय प्रचार और अन्य सरकारी खर्चों में इस्तेमाल किया. इसी तरह, 15वें वित्त आयोग से ग्रामीण बुनियादी ढांचे के विकास के लिए मिले केंद्रीय अनुदान को भी कथित तौर पर दूसरी मद में डालकर ग्रामीण क्षेत्रों के बिजली और पानी के बिल चुकाने में इस्तेमाल किया गया.
पंजाब में नकदी की कमी का एक और उदाहरण यह है कि कई सरकारी विभागों में कर्मचारियों के वेतन समय पर नहीं मिल रहा है. केंद्र सरकार ने भी पंजाब की खराब वित्तीय स्थिति का हवाला देते हुए राज्य की कर्ज लेने की सीमा में 16,600 करोड़ रुपये से अधिक की कटौती कर दी. केंद्र का कहना है कि पंजाब का राजस्व घाटा तय कानूनी सीमा से ज्यादा हो गया है.
पंजाब के खाली खजाने पर क्या कहना है सरकार का
वहीं, पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल चीमा का कहना है कि राज्य की मौजूदा आर्थिक बदहाली के लिए पिछली सरकारें जिम्मेदार हैं. उनका आरोप है कि उन्हें विरासत में बेहद खराब वित्तीय स्थिति मिली. इस वजह से आज यह संकट पैदा हुआ है.
पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल चीमा कहते हैं कि राज्य की आर्थिक हालत कई कारणों से प्रभावित हुई है. वो कहते हैं, ”केंद्र सरकार द्वारा जीएसटी मुआवजा बंद किए जाने और राजस्व घाटा अनुदान में कमी आने से पंजाब की वित्तीय स्थिति पर बड़ा असर पड़ा है. जहां तक कर्मचारियों के बकाया का सवाल है, छठे वेतन आयोग के तहत करीब 14,191 करोड़ रुपये का बकाया पूरी तरह 2016 से 2022 के बीच पिछली सरकारों के समय का है. पिछली अकाली-बीजेपी और कांग्रेस सरकारों ने 11 से 12 फीसद जैसी ऊंची ब्याज दरों पर कर्ज लिया था, जबकि हमारी सरकार करीब सात फीसदी की दर से कर्ज ले रही है. पुराने कर्ज का भारी बोझ होने के बावजूद हमने वित्तीय अनुशासन बनाए रखा है. राज्य का कर्ज-से-जीएसडीपी अनुपात 2022 के 48.25 फीसद से घटाकर 44.47 फीसद कर दिया है.”

क्या पंजाब सरकार टाल सकती था आर्थिक संकट
पंजाब को आर्थिक संकट से बचाने के लिए क्या किया जा सकता था? विशेषज्ञों का मानना है कि 300 यूनिट मुफ्त बिजली और ‘मुख्यमंत्री मावां-धियां सत्कार योजना’ जैसी योजनाओं को पूरी तरह बंद करना न तो राजनीतिक रूप से आसान है और न ही सामाजिक रूप से उचित, क्योंकि ये योजनाएं आप के चुनावी वादों का हिस्सा थीं.इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट एंड कम्युनिकेशन के निदेशक प्रोफेसर वरिंदर शर्मा कहते हैं कि सरकार चाहती तो इन योजनाओं का लाभ सभी लोगों को देने के बजाय केवल जरूरतमंदों तक सीमित रखकर काफी सरकारी पैसा बचा सकती थी. खासकर आयकर देने वाले परिवारों और उच्च आय वर्ग की महिलाओं को इन योजनाओं से बाहर रखा जा सकता था.प्रोफेसर शर्मा कहते हैं,”आज राजनीतिक दलों के लिए मुफ्त योजनाएं देना चुनाव जीतने की मजबूरी बन गई है. महिलाओं को हर महीने 1,000 से 1,500 रुपये की सहायता देने के साथ-साथ मुफ्त बस यात्रा की सुविधा भी दी जा रही है. वहीं, 300 यूनिट मुफ्त बिजली और महिलाओं को मासिक सहायता पर ही राज्य के बजट का करीब 15 फीसद खर्च हो रहा है. अगर इन दोनों योजनाओं को जरूरत के हिसाब से सीमित किया जाए, तो इससे पंजाब की सभी आर्थिक समस्याएं तो खत्म नहीं होंगी, लेकिन सरकार को वित्तीय राहत जरूर मिलेगी.”
प्रोफेसर शर्मा यह भी कहते हैं कि फ्री बिजली का लाभ केवल छोटे और सीमांत किसानों और कम आय वाले परिवारों तक सीमित किया जाए. वहीं, ज्यादा बिजली खपत करने वाले और बड़े किसानों के लिए अलग-अलग दरों (ग्रेडेड टैरिफ) से शुल्क लिया जाए. ऐसा करने से बिजली सब्सिडी का खर्च 40 से 60 फीसद तक कम किया जा सकता है.उनके मुताबिक, अगर सब्सिडी में 50 फीसदी की भी कटौती कर दी जाए तो सरकार हर साल करीब नौ हजार करोड़ रुपये बचा सकती है. इसी तरह महिलाओं को हर महीने दी जाने वाली आर्थिक मदद को सभी के बजाय केवल कम आय या कम संपत्ति वाले परिवारों तक ही सीमित कर दिया जाए, तो सरकार को हर साल करीब पांच हजार करोड़ रुपये की अतिरिक्त बचत हो सकती है.
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