

शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग के फैसले पर गंभीर सवाल उठाए. उन्होंने अदालत से कहा कि आयोग ने अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर फैसला किया और पार्टी संगठन में मौजूद वास्तविक समर्थन को नजरअंदाज कर दिया.
ठाकरे गुट के समर्थन का दिया हवाला
सिब्बल ने दलील दी कि वर्ष 2018 के शिवसेना संविधान के अनुसार संगठन के नौ प्रमुख पदाधिकारियों में से छह ने उद्धव ठाकरे के नेतृत्व का समर्थन किया था. इससे साफ था कि पार्टी संगठन में ठाकरे गुट को बहुमत हासिल था. उन्होंने कहा कि दोनों पक्ष अपने दावे 2018 के संविधान के आधार पर कर रहे थे लेकिन चुनाव आयोग ने उस पर विचार नहीं किया और 1999 के संविधान को आधार बना लिया.
लाखों हलफनामों को नहीं दी अहमियत
सिब्बल ने कहा कि चुनाव आयोग को पार्टी संगठन और कार्यकर्ताओं के समर्थन से जुड़े लाखों हलफनामे सौंपे गए थे. इनमें बड़ी संख्या में ठाकरे गुट के पक्ष में समर्थन दिखाया गया था. इसके बावजूद आयोग ने संगठनात्मक ताकत को दरकिनार करते हुए केवल विधायकों की संख्या को महत्व दिया.
‘विधायकों का बहुमत और पार्टी का बहुमत अलग’
उन्होंने अदालत में कहा कि विधानसभा में किसी गुट के पास बहुमत होना और पूरी राजनीतिक पार्टी में बहुमत होना दो अलग बातें हैं. आयोग ने यह मान लिया कि विधायक दल में हुआ विभाजन ही पूरे राजनीतिक दल का विभाजन है जबकि ऐसा नहीं था.
सिब्बल के अनुसार 21 जून 2022 को केवल कुछ विधायक अलग हुए थे. उस समय पूरी शिवसेना पार्टी का विभाजन नहीं हुआ था. इसके बावजूद चुनाव आयोग ने शिंदे गुट को शिवसेना का नाम और चुनाव चिह्न दे दिया.
अदालत ने कानूनी अंतर बताया
जस्टिस बागची ने कहा कि दोनो मामले एक दूसरे से जुड़े होने के बावजूद दोनो में कानुनी सवाल अलग अलग है. स्पीकर यह तय करते हैं कि किसी विधायक ने खुद अपनी पार्टी छोड़ी है या नहीं, ताकि यह तय किया जा सके उसकी सदस्यता जाए या नहीं. जबकि चुनाव आयोग का काम यब तय करना है कि असली राजनीतिक पार्टी कौन है और चुनाव चिह्न किसे मिलेगा.





