
‘मैंने वर्णमाला के अक्षरों को हर संभव तरीके से मिलाकर देखा. इससे मुझे लगभग सौ नाम मिले, लेकिन उनमें से कोई भी सही नहीं लगा. एक सुबह, लंदन शहर में चीपसाइड के रास्ते जब मैं बस की ऊपरी मंजिल से यात्रा कर रहा था, तब किसी जिन्न ने मेरे कान में ‘रोलेक्स’ कहा.’
ये बात एक 24 साल के जर्मन बिजनेसमैन हैंस विल्सडॉर्फ ने कही थीं. वही हैंस विल्सडोर्फ जिन्होंने 1905 में एक ऐसी कंपनी की शुरुआत की, जिसे आज ‘रोलेक्स’ के नाम से जाना जाता है.
लंदन में शुरू हुई यह कंपनी कुछ ही साल में स्टेटस और कामयाबी का सिंबल बन गई. अगर किसी के हाथ में रोलेक्स की घड़ी है तो उससे उसका रुतबा पता चलता है. लेकिन रोलेक्स को खरीद पाना हर किसी के बस की बात नहीं होती, क्योंकि इसकी सबसे सस्ती घड़ी की कीमत में एक कार भी खरीदी जा सकती है.
लेकिन रोलेक्स को इतना महंगा क्या बनाता है? इसकी सबसे सस्ती घड़ी कितने की आती है? रोलेक्स की कहानी क्या है? जानते हैं.
क्या है रोलेक्स का इतिहास?
रोलेक्स का इतिहास हैंस विल्सडॉर्फ की सोच से जुड़ा है. 1905 में 24 साल की उम्र में विल्सडॉर्फ ने लंदन में एक कंपनी शुरू की, जो घड़ियों के डिस्ट्रिब्यूशन का काम करती थी.
उसी समय उन्होंने कलाई पर पहनी जाने वाली घड़ी का सपना देखा. यह वह समय था, जब कलाई घड़ियां बहुत सटीक नहीं होती थीं लेकिन विल्सडॉर्फ ने भांप लिया था कि कलाई घड़ियां न सिर्फ शानदार, बल्कि भरोसेमंद भी हो सकती हैं.
साल 1908 में हैंस विल्सडॉर्फ ने ‘रोलेक्स’ के नाम से कंपनी रजिस्टर्ड करवाई और इसका ऑफिस स्विट्जरलैंड के ला चौक्स-डे-फॉन्ड्स में खोला. रोलेक्स ने सबसे पहले घड़ियों की सटीकता पर ध्यान दिया और जल्द ही इसमें विल्सडॉर्फ कामयाब हो गए. 1910 में रोलेक्स की घड़ियां दुनिया की पहली कलाई घड़ी बनी, जिसे ‘स्विस सर्टिफिकेट ऑफ क्रोनोमेट्रिक प्रेसिजन’ मिला. चार साल बाद 1914 में ग्रेट ब्रिटेन की क्यू ऑब्जर्वेटरी ने रोलेक्स की कलाई घड़ी को ‘A’ कैटेगरी का प्रेसिजन सर्टिफिकेट दिया, जो उस समय तक सिर्फ समुद्री क्रोनोमीटरों को ही मिलता था.

1919 में यह कंपनी जेनेवा चली गई और इसका नाम हो गया- ‘Montres Rolex S.A.’ रोलेक्स को सबसे बड़ी कामयाबी तब मिली, जब उसकी पहली वॉटरप्रूफ और डस्टप्रूफ घड़ी बनाई. इस घड़ी को ‘Oyster’ नाम दिया गया. अगले ही साल 1927 में मर्सिडिज ग्लीट्ज नाम की स्विमर ने इस घड़ी को पहनकर तैराकी की. 10 घंटे से ज्यादा समय तक तैरने के बाद भी घड़ी बिल्कुल सही-सलामत रही.
1931 में रोलेक्स ने ‘परपेचुअल रोटर’ वाले दुनिया के पहले ‘सेल्फ वाइंडिंग मैकेनिज्म’ का आविष्कार किया और इसका पेटेंट करवाया. यह वह तकनीक होती है, जिसमें घड़ी हाथ के हिलने से अपने आप चार्ज होती है और चलती है. आज हर ऑटोमैटिक घड़ी में इसी का इस्तेमाल होता है.
साल 1944 में पत्नी की मौत के बाद विल्सडॉर्फ ने ‘हैंस विल्सडॉर्फ फाउंडेशन’ नाम का एक प्राइवेट ट्रस्ट बनाया. 1960 में उनकी मौत के बाद से आज तक रोलेक्स का मालिकाना हक इसी ट्रस्ट के पास है.
सबसे सस्ती घड़ी कितने की?
रोलेक्स घड़ियों की कीमत सबसे ज्यादा होती है. इसकी सबसे सस्ती घड़ी की कीमत भी इतनी है कि इतने में तो एक कार आ सकती है.
रोलेक्स की वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के मुताबिक, इसकी सबसे सस्ती घड़ी की कीमत 6,22,800 रुपये है. ये रोलेक्स का ‘Oyster Perpetual 36’ मॉडल है. इसमें 904L स्टेनलेस स्टील का इस्तेमाल किया गया है, जो कई सालों तक इसकी चमक बरकरार रखेगी.
इसके बाद रोलेक्स की घड़ियों की कीमत करोड़ों में जाती है. इसकी सबसे महंगी घड़ी ‘Cosmograph Daytona’ है, जिसकी कीमत 1.49 करोड़ रुपये से भी ज्यादा है.

इस घड़ी में 18 कैरेट गोल्ड का इस्तेमाल हुआ है. इसमें एक बेजल है, जिसमें हीरे के 36 टुकड़े लगे हुए हैं. इसका अलॉय और ब्रेसलेट भी 18 कैरेट पिंक गोल्ड से बना है. यह पिंक गोल्ड, रोलेक्स ही बनाती है. यह घड़ी पूरी तरह से वॉटरप्रूफ है और दावा है कि पानी में 100 मीटर गहराई में जाने के बाद भी घड़ी को कुछ नहीं होगा.
हालांकि, यह सिर्फ शोरूम में बिकने वाली घड़ियों की कीमत है. नीलामी में जब रोलेक्स की घड़ियां बिकती हैं तो उसकी कीमत 150 करोड़ तक चली जाती है. उदाहरण के लिए, 2017 में अमेरिकी एक्टर पॉल न्यूमैन की रोलेक्स घड़ी Daytona नीलामी में 1.78 करोड़ डॉलर में बिकी थी. आज के हिसाब से देखा जाए तो भारतीय करंसी में यह रकम 170 करोड़ होती है. पॉल न्यूमैन को यह घड़ी उनकी पत्नी ने तोहफे में दी थी.
इतनी महंगी क्यों होती है इसकी घड़ी?
रोलेक्स की घड़ी सिर्फ समय नहीं बताती, बल्कि वह इसे पहनने वाले का स्टेटस और कामयाबी भी बताती है. रोलेक्स अपनी घड़ियों को बनाने में बहुत मेहनत और संसाधन लगाता है.
घड़ियों में सबसे अच्छी क्वालिटी के मटैरियल का इस्तेमाल किया जाता है, जो इसकी कीमत बढ़ाता है. रोलेक्स अपनी घड़ियों में 904L स्टेनलेस स्टील का इस्तेमाल करती है जो न सिर्फ बहुत महंगा होता है, बल्कि इसमें कई दशकों तक जंग भी नहीं लगती. इसे इतनी अच्छी तरह से पॉलिश किया जाता है कि इसकी चमक दशकों तक बनी रहती है. इसके अलावा, घड़ियों में गोल्ड और प्लेटिनम का इस्तेमाल भी होता है.

रोलेक्स अपनी घड़ियों का एक-एक पुर्जा अपनी फैक्ट्रियों में ही बनाता है. घड़ी बनाने का पूरा काम बारीकी से होता है. छोटी-छोटी चीजों में भी बेहतरीन परफॉर्मेंस पक्का करने की इस प्रक्रिया में बहुत समय और मेहनत लगती है. लेकिन रोलेक्स के लिए ‘सटीकता’ और ‘भरोसे’ से कम कुछ भी मंजूर नहीं है. रोलेक्स के मामले में ‘जितना पैसा, उतनी अच्छी चीज’ वाली बात बिल्कुल सही साबित होती है.
और रोलेक्स कमाती कितना है?
रोलेक्स खुद को नॉन-प्रॉफिट कंपनी बताती है और इसकी कमाई और खर्च का ब्योरा सार्वजनिक नहीं है. हालांकि, वर्ल्ड मेट्रिक्स की 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, रोलेक्स की ब्रांड वैल्यू 9.2 अरब डॉलर (88 हजार करोड़ रुपये) है. लेकिन दिलचस्प बात है कि इसका कोई इन्वेस्टर नहीं है.
इसका पूरा मालिकाना हक ‘हैंस विल्सडॉर्फ फाउंडेशन’ के पास है. इस फाउंडेशन में 8 ट्रस्टियों का एक बोर्ड है. कंपनी हर साल करोड़ों-अरबों कमा रही है और इसका पूरा मुनाफा सीदे फाउंडेशन के पास चला जाता है. यह स्विट्जरलैंड का सबसे मजबूत चैरिटेबल फाउंडेशन माना जाता है. लेजिट चेक के मुताबिक, 2022 में रोलेक्स का रेवेन्यू 9.7 अरब डॉलर था. कंपनी हर साल लगभग 10 लाख से ज्यादा घड़ियां बनाती हैं.

रोलेक्स की कमाई का एक बड़ा हिस्सा मशीनों के रखरखाव पर खर्च होता है. पिछले साल एक इंटरव्यू में कंपनी के सीईओ जीन-फ्रेडरिक डुफोर ने बताया था कि हमारे पास बहुत आधुनिक मशीनें और टूल हैं. ये 8 साल चलती हैं और इसके बाद इन्हें बदलने की जरूरत पड़ती है. उन्होने दावा किया था कि हर इन मशीनों को अपग्रेड करने के लिए लगभग 13 करोड़ डॉलर खर्च होते हैं.
रोलेक्स के फाउंडर हैंस विल्सफॉर्ड ने एक ऐसा मॉडल तैयार किया है, जो खुद को नॉन-प्रॉफिट बताते हुए भी खूब मुनाफा कमाती है. इस खास बिजनेस मॉडल की वजह से रोलेक्स ने बिना इन्वेस्टर्स के तरक्की की है.
इसकी हर घड़ी, चाहे कभी भी भी बनी हो, हमेशा खास बनी रहती है. लिमिटेड सप्लाई और ज्यादा डिमांड की वजह से सेकेंडरी मार्केट में घड़ियों की रीसेल वैल्यू बहुत ज्यादा होती है.





