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मध्यप्रदेश EOW को 23 हजार शिकायतें, 1 प्रतिशत से भी कम मामले कोर्ट तक पहुंचे; अब मिली नई ताकत | mp eow new powers economic offences wing mp investigation speed bns vs ipc economic crime cases



मध्य प्रदेश सरकार ने आर्थिक अपराधों की जांच करने वाली अपनी प्रमुख एजेंसी आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) को नए आपराधिक कानूनों के अनुरूप अधिकार देने का फैसला किया है. करीब 49 साल पुरानी अधिसूचना में संशोधन कर अब EOW भारतीय दंड संहिता (IPC) की जगह भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत कार्रवाई कर सकेगा. हालांकि यह बदलाव कानूनी तौर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन इसके साथ ही EOW की कार्यप्रणाली को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं. 

पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि हजारों शिकायतें मिलने के बावजूद बहुत कम मामले जांच, एफआईआर और अदालत तक पहुंच पाते हैं. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नए अधिकार मिलने के बाद EOW की जांच की रफ्तार और परिणामों में भी बदलाव दिखाई देगा?

1977 की अधिसूचना में किया गया संशोधन

राज्य सरकार ने 31 मई 1977 को जारी उस अधिसूचना में संशोधन करने का निर्णय लिया है, जिसके आधार पर EOW की कानूनी शक्तियां निर्धारित थीं. मोहन यादव कैबिनेट ने 25 अगस्त को इस प्रस्ताव को मंजूरी दी. इसके बाद EOW अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 की प्रासंगिक धाराओं के तहत आर्थिक अपराधों की जांच और कार्रवाई कर सकेगा.

कानूनी बदलाव के साथ उठे बड़े सवाल

कानून में यह बदलाव तकनीकी रूप से जरूरी माना जा रहा है, क्योंकि देश में नए आपराधिक कानून लागू हो चुके हैं. लेकिन इस फैसले के साथ EOW के प्रदर्शन पर भी चर्चा शुरू हो गई है. विधानसभा में पेश आंकड़ों से पता चलता है कि शिकायतों और कार्रवाई के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है.

छह साल में 23 हजार से ज्यादा शिकायतें

विधानसभा में दिए गए लिखित जवाब के अनुसार, वर्ष 2020 से जून 2026 के बीच EOW को 23,261 शिकायतें प्राप्त हुईं. इनमें से केवल 3,018 शिकायतों को आगे की जांच के लिए दर्ज किया, जबकि 756 शिकायतें जांच के बाद बंद कर दी. इन आंकड़ों ने एजेंसी की कार्यप्रणाली और मामलों के निपटारे की गति पर सवाल खड़े कर दिए हैं.

इसी अवधि में प्राप्त शिकायतों के आधार पर केवल 258 आपराधिक मामले दर्ज किए गए. इतना ही नहीं, सिर्फ नौ मामलों में अदालत में चालान प्रस्तुत किया जा सका. इससे यह सवाल उठता है कि बड़ी संख्या में आने वाली शिकायतों में से कितनी वास्तव में न्यायिक प्रक्रिया तक पहुंच पाती हैं.

FIR तक नहीं पहुंच पाईं अधिकांश शिकायतें

फरवरी में विधानसभा में पेश एक अन्य जवाब के अनुसार, वर्ष 2020 से जनवरी 2026 के बीच EOW को भ्रष्टाचार और आर्थिक अपराधों से संबंधित 19,775 शिकायतें मिली थीं. इनमें से केवल 2,624 शिकायतें औपचारिक रूप से दर्ज की गईं और सिर्फ 566 मामलों में आपराधिक प्रकरण दर्ज हुआ. आंकड़े बताते हैं कि अधिकांश शिकायतें एफआईआर दर्ज होने के स्तर तक भी नहीं पहुंच सकीं.

विधानसभा में एक मामले का उल्लेख किया, जिसमें शिकायतकर्ता ने शपथपत्र और 342 पन्नों के दस्तावेज EOW को सौंपे थे. आरोपों की सीधे जांच शुरू करने के बजाय शिकायत को संबंधित विभाग के पास परीक्षण के लिए भेज दिया गया. इस मुद्दे पर विपक्ष ने सवाल उठाते हुए कहा कि जिस विभाग से शिकायत जुड़ी हो, उसी विभाग को जांच के लिए भेजना निष्पक्ष जांच की प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है.

दोषसिद्धि दर ने दिखाई दूसरी तस्वीर

वर्ष 2020 से 2025 के बीच अदालतों ने EOW के 70 मामलों में फैसला सुनाया. इनमें 40 मामलों में आरोपियों को दोषी ठहराया, जबकि 30 मामलों में आरोपी बरी हुए. इस आधार पर दोषसिद्धि दर करीब 57 प्रतिशत रही, जो जांच एजेंसी के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा सकता है.

हालांकि दोषसिद्धि दर अच्छी दिखाई देती है, लेकिन मामलों के निपटारे में लगने वाला समय चिंता बढ़ाता है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इन 70 मामलों में केस दर्ज होने से लेकर अंतिम फैसला आने तक औसतन 13 साल 7 महीने का समय लगा.

कुछ मामलों में तीन दशक बाद आया फैसला

EOW के पुराने मामलों पर नजर डालें तो कई मामलों में निर्णय आने में दो से तीन दशक तक का समय लग गया. वर्ष 1990 में दर्ज एक मामले का फैसला 33 साल बाद हुआ. इसी तरह 1995 के एक मामले में 28 साल, 1996 के मामले में 29 साल और 1999 के एक मामले में 26 साल बाद फैसला आया.

अब नजर नए बदलाव के असर पर

राज्य सरकार का मानना है कि नए कानूनों के अनुरूप किया गया यह संशोधन EOW को अधिक प्रभावी तरीके से काम करने में मदद करेगा. हालांकि आंकड़े बताते हैं कि एजेंसी के सामने सिर्फ कानूनी अधिकारों का नहीं, बल्कि जांच की गति, मामलों के निपटारे और शिकायतों के प्रभावी निष्पादन जैसी चुनौतियां भी हैं. ऐसे में आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि आधी सदी बाद हुआ यह बदलाव सिर्फ कानून की किताबों तक सीमित रहता है या फिर जांच व्यवस्था में भी कोई बड़ा सुधार लेकर आता है.





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