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बालेन शाह सरकार पर नेपाल सुप्रीम कोर्ट के 3 जजों को धमकाने का आरोप: रिपोर्ट | Balen Shah accused of threatening three Nepal Supreme Court judges Report claims



नेपाल के पीएम बालेन शाह की सरकार पर बड़ा आरोप लगा है. तीन अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने नेपाल की न्यायपालिका में बढ़ते राजनीतिक दखल पर चिंता जताई है. उन्होंने चेतावनी दी है कि सरकार के हालिया कदमों से अदालतों की आजादी कम हो सकती है और कानून का शासन कमजोर पड़ सकता है. एमनेस्टी इंटरनेशनल, ह्यूमन राइट्स वॉच और इंटरनेशनल कमीशन ऑफ़ जूरिस्ट्स (ICJ) ने एक संयुक्त बयान में कहा कि एक एग्जीक्यूटिव ऑर्डिनेंस (कार्यकारी आदेश) के जरिए ‘कॉन्स्टिट्यूशनल काउंसिल एक्ट’ में किए गए बदलाव और सुप्रीम कोर्ट के सीनियर जजों पर कथित दबाव से न्यायिक आजादी के लिए गंभीर खतरा पैदा हो गया है.

इन संगठनों का कहना है कि मई में सरकार का ‘कॉन्स्टिट्यूशनल काउंसिल एक्ट’ में ऑर्डिनेंस के जरिए संशोधन करने का फैसला संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन है. साथ ही, इससे मुख्य न्यायाधीश समेत अहम संवैधानिक संस्थाओं में अधिकारियों की नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर भी चिंताएं पैदा हुई हैं.

द काठमांडू पोस्ट के अनुसार, इस संशोधन ने संवैधानिक परिषद के कोरम और वोटिंग से जुड़े नियमों को बदल दिया. यह परिषद अहम संवैधानिक पदों पर नियुक्तियों की सिफारिश करने के लिए जिम्मेदार संस्था है. मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि इन बदलावों से न्यायिक नियुक्तियों पर राजनीतिक असर पड़ने की संभावना बढ़ गई है, क्योंकि परिषद में सरकारी प्रतिनिधियों के पास पहले से ही बहुमत है. ICJ के सीनियर लीगल और पॉलिसी डायरेक्टर इयान सीडरमैन ने बयान में कहा, “न्यायपालिका की स्वतंत्रता कानून के शासन की नींव है और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए एक जरूरी सुरक्षा उपाय है.” उन्होंने कहा, “नेपाल की न्याय प्रणाली में कोई भी सुधार अदालतों की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और ईमानदारी को मजबूत करने वाला होना चाहिए, न कि उन्हें कमजोर करने वाला.”

सरकार के फैसलों पर कर रहे सुनवाई

इन समूहों ने मुख्य न्यायाधीश के तौर पर मनोज कुमार शर्मा की नियुक्ति पर भी सवाल उठाए. उनका कहना है कि यह नियुक्ति नेपाल की उस पुरानी परंपरा से अलग है, जिसके तहत सबसे वरिष्ठ कार्यरत न्यायाधीश को ही मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया जाता रहा है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट में तीन सीनियर जज अभी भी हैं, लेकिन संसदीय सुनवाई समिति की मंजूरी के बाद शर्मा को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया. संगठनों का कहना है कि उनके नामांकन के खिलाफ उठाई गई शिकायतों की कोई सार्थक सार्वजनिक जांच नहीं की गई.

इन समूहों का दावा है कि उन्हें विश्वसनीय रिपोर्ट मिली हैं कि सुप्रीम कोर्ट के तीन सीनियर जजों सपना प्रधान मल्ला, कुमार रेग्मी और हरि फुयाल पर महाभियोग की धमकी देकर इस्तीफा देने का दबाव डाला गया था. उन्होंने कहा कि उन्हें जजों के खिलाफ ऐसे किसी सार्वजनिक आरोप की जानकारी नहीं है जो महाभियोग के लिए संवैधानिक जरूरतों को पूरा करते हों. 

नेपाल के संविधान के तहत, महाभियोग की कार्यवाही शुरू होते ही जज को अपने-आप निलंबित कर दिया जाता है, जब तक कि संसद यह तय न कर ले कि आरोप सही हैं या नहीं. संगठनों ने चेतावनी दी कि सुप्रीम कोर्ट के तीन सीनियर जजों को निलंबित करने से कोर्ट के कामकाज पर काफी असर पड़ सकता है, खासकर ऐसे समय में जब वह सरकार के फैसलों और कार्यकारी कार्यों को चुनौती देने वाले महत्वपूर्ण संवैधानिक मामलों की सुनवाई कर रहा है.

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