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चीन तिब्बत का नाम लेकर अरुणाचल पर दावा करता है, पर तिब्बत भी तो उसका नहीं… पूरे विवाद की कहानी समझिए | india china arunachal Pradesh dispute Tibet history explained


नई दिल्ली:

अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन एक बार फिर बौखला गया है. भारत ने हाल ही में अरुणाचल प्रदेश की 27 जगहों को उनके भारतीय नामों के साथ आधिकारिक नक्शे में शामिल किया है. इसके बाद चीन हमेशा की तरह बौखला गया लेकिन भारत ने भी साफ कर दिया है कि अरुणाचल भारत का अभिन्न हिस्सा है. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने मंगलवार को कहा कि अरुणाचल भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है.

रणधीर जायसवाल ने चीन का नाम लिए बगैर कहा कि अरुणाचल भारत का एक अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है और यह एक तथ्य है और कोई भी चीज इस वास्तविकता को नहीं बदल सकती.

चीन 2017 से ही अपने नक्शे में अरुणाचल प्रदेश को बताता रहा है और बार-बार कई जगहों के नाम बदलने का हथकंडा अपनाता रहा है. इस बार जब भारत ने ही अपने क्षेत्र में नाम बदले तो चीन तिलमिला उठा. 

चीन दावा करता है कि अरुणाचल प्रदेश दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा है. भारत ने हमेशा से उसके दावे को खारिज किया है. दिलचस्प बात है कि चीन अरुणाचल को तिब्बत का हिस्सा बताता है लेकिन तिब्बत भी तो उसका नहीं है. तिब्बत पर उसने जबरदस्ती कब्जा किया था.

तिब्बत भी तो कब्जाया हुआ है!

चीन और तिब्बत के रिश्ते बेहद जटिल और विवादित रहे हैं. चीन दावा करता है कि 13वीं सदी से ही तिब्बत उसका हिस्सा रहा है. दूसरी तरफ, तिब्बत का कहना है कि वह कई सदियों तक एक स्वतंत्र देश था और चीन का उसपर लगातार अधिकार नहीं रहा.

तिब्बत के बौद्ध संस्कृति भी बाकी बौद्धों से अलग है. तिब्बत लंबे समय तक आजाद ही रहा है. और एक ऐसा दौर भी रहा है जब जम्मू-कश्मीर की डोगरा रियासत के सेनापति जनरल जोरावर सिंह ने बल्टिस्तान, स्कार्दू के साथ-साथ तिब्बत को भी जीत लिया था.

बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मंगोल राजा कुबलई खान ने युआन राजवंश की स्थापना की. इस राजवंश का चीन, तिब्बत, वियतनाम और कोरिया तक राज रहा. फिर 17वीं सदी में किंग राजवंश आया, जिसके तिब्बत के साथ अच्छे रिश्ते थे. 1909 में किंग की सेना ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया लेकिन तीन साल में ही तिब्बत ने उन्हें खदेड़ दिया. 1912 में 13वें दलाई लामा ने तिब्बत की आजादी की घोषणा की. 

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Photo Credit: AFP

लगभग 4 दशकों तक तिब्बत आजाद रहा. 1949 में चीन में कम्युनिस्ट शासन आने के बाद माओ त्से तुंग ने तिब्बत को अपना हिस्सा बताया. 1950 में चीन ने तिब्बत पर हमला कर उस पर कब्जा कर लिया. मई 1951 में तिब्बती नेताओं को चीन की शर्तों वाले एक समझौते पर दस्तखत करने के लिए मजबूर किया गया. समझौते के तहत तिब्बत की स्वायत्तता की गारंटी तो दी गई, लेकिन साथ ही ल्हासा में चीनी नागरिकों के आने और मिलिट्री हेडक्वार्टर बनाने की भी इजाजत दी गई.

आज पूरी दुनिया तिब्बत को चीन का ही मानती है. लेकिन तिब्बत के लोग आज भी चीन से आजादी के लिए संघर्ष कर रहे हैं. 

2010 के बाद से चीन ने तिब्बती नेताओं से कोई बातचीत नहीं की है. इंटरनेशनल कैंपेन फॉर तिब्बत का दावा है कि 2009 के बाद से 170 लोगों ने आजादी के लिए संघर्ष करते हुए आत्मदाह कर लिया. जुलाई 2020 में न्यूयॉर्क टाइम्स ने एक लेख लिखा था, जिसकी हेडिंग थी- ‘चीन का वह शहर जो आत्मदाह की वैश्विक राजधानी बन गया.’

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फिर अरुणाचल पर किस हद से दावा करता है?

चीन तिब्बत को ‘शीजांग’ और अरुणाचल प्रदेश को ‘जांगनान’ बताता है. चीन दावा करता है कि अरुणाचल दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा है और चूंकि तिब्बत उसका है, इसलिए अरुणाचल भी उसका हुआ.

लेकिन चीन ऐसा दावा करते 112 साल पहले हुए समझौते को भुला देता है. 1914 में शिमला में चीन, तिब्बत और ब्रिटिश इंडिया के बीच एक समझौता हुआ था. उस समय ब्रिटिश इंडिया के विदेश सचिव हेनरी मैकमोहन थे, जिन्होंने तिब्बत के साथ 890 किलोमीटर लंबी सीमा रेखा खींची थी. इसलिए इसे मैकमोहन लाइन कहा जाता है. उस समय तिब्बत पूरी तरह से आजाद मुल्क हुआ करता था.

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Photo Credit: IANS

आजादी के बाद भारत ने मैकमोहन लाइन को ही सीमा माना, लेकिन चीन ने इसे मानने से इनकार कर दिया. चीन दावा करता है कि 1914 में जब समझौता हुआ था, तब वह वहां था ही नहीं. वह यह भी कहता है कि तिब्बत चीन का हिस्सा है, इसलिए वह खुद से कोई फैसला नहीं ले सकता.

भारत और चीन 3,488 किलोमीटर लंबी सीमा साझा लगती है, जो तीन सेक्टर में बंटी है. इसमें से 1,346 किलोमीटर की सीमा अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम से लगती है. 

अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन के साथ दशकों से विवाद है और इस विवाद की वजह भी चीन ही है. विदेश मंत्रालय के मुताबिक, अरुणाचल की करीब 90 हजार वर्ग किलोमीटर की जमीन पर चीन दावा करता है. जबकि, अरुणाचल भारत का अटूट हिस्सा है.

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