

चीन वो करने की कोशिश में है जो भारत 3 साल पहले कर चुका है. अगले हफ्ते चीन Chang’e-7 मिशन लॉन्च करने वाला है. यह अब तक का चीन का सबसे जटिल चंद्र मिशन होगा. चीन चांद के साउथ पोल (दक्षिणी ध्रुव) के पास उतरना चाहता है, वहां मौजूद उन गड्ढों में जमी हुई पानी की तलाश करना चाहता है, जहां अरबों साल से सूरज की रोशनी नहीं पहुंची है. इस मिशन में इंसान नहीं जाएंगे. इसके बजाय एक रोबोट लैंडर, एक रोवर और एक ऐसा खास रोबोट भेजा जाएगा जो चांद की सतह पर उछलते हुए आगे बढ़ सकेगा.
यह मिशन चांद पर लंबे समय तक इंसानों को रखने की चीन की योजना की दिशा में एक बड़ा कदम होगा. चीन की योजना 2030 से पहले इंसानों को चांद पर उतारने और 2035 तक रूस के साथ मिलकर वहां एक रिसर्च स्टेशन बनाने की है. चलिए आपको सवाल-जवाब के जरिए चीन के Chang’e-7 मिशन के बारे में सबकुछ बताते हैं.
Chang’e-7 कहां जाएगा?
अगले हफ्ते Chang’e-7 को चीन के वेनचांग स्पेस लॉन्च साइट से Long March 5 रॉकेट के जरिए भेजा जाएगा. इसके साथ पानी की जांच करने वाले उपकरण, कैमरे और रडार समेत कई वैज्ञानिक उपकरण भी जाएंगे. चांद के ऑर्बिट में पहुंचने के बाद यह मिशन पहले साउथ पोल पर उतरने के लिए सही जगहों की जांच करेगा. इसके बाद वहां उतरने की कोशिश की जाएगी. एक संभावित जगह शैकलटन क्रेटर के किनारे के पास है. यह ऐसा गड्ढा है, जिसके कुछ हिस्सों में हमेशा अंधेरा रहता है. हालांकि, इसके ऊंचे और ऊबड़-खाबड़ किनारे पर लगभग लगातार सूरज की रोशनी पड़ती रहती है.
उछलने वाला रोबोट, वो भी अंधेरे गड्ढों में?
चांद के गड्ढों के किनारे काफी खड़े और ढलान वाले हैं. ऐसे में सामान्य पहियों वाला रोवर वहां आसानी से नीचे नहीं जा सकता. इसी समस्या के लिए Chang’e-7 एक खास उछलने वाला रोबोट भेजेगा. इस रोबोट में पानी के मॉलिक्यूल की जांच करने वाला उपकरण लगा होगा. यह अपने छोटे इंजन की मदद से अंधेरे गड्ढों के अंदर उड़कर जाएगा. वहां उतरने के बाद इसके छह मुड़ने वाले पैर इसे सहारा देंगे. इसके बाद यह फिर उछलकर सूरज की रोशनी वाले इलाके में वापस आएगा, ताकि अपनी बैटरी चार्ज कर सके.
चांद के साउथ पोल पर ही क्यों?
चांद के साउथ पोल (दक्षिणी ध्रुव) के पास मौजूद कुछ गड्ढों में अरबों साल से सूरज की रोशनी नहीं पहुंची है. वैज्ञानिकों का मानना है कि ये जगहें किसी गहरे फ्रीजर की तरह हो सकती हैं. इनमें बहुत पुराना पानी और कुछ खास केमिकल आज भी जमे हुए हो सकते हैं. नासा के मुताबिक, इन अंधेरे इलाकों में तापमान माइनस 203 डिग्री सेल्सियस तक गिर सकता है.
वहां पानी मिलना भविष्य में चांद पर इंसानों के ठिकाने बनाने के लिए बेहद जरूरी होगा. इससे पीने का पानी मिल सकता है, अंतरिक्ष यात्रियों के लिए ऑक्सीजन बनाई जा सकती है और यहां तक कि रॉकेट का फ्यूल बनाने में भी इसका इस्तेमाल हो सकता है. इससे पृथ्वी से बार-बार महंगी सप्लाई भेजने की जरूरत कम होगी.
भारत पहले ही कैसे इतिहास रच चुका?
अमेरिका, भारत और रूस की भी नजर चांद के साउथ पोल पर है. अभी तक केवल भारत ही 2023 में अपने चंद्रयान-3 के जरिए इस इलाके के पास उतर पाया है. आने वाले सालों में नासा का VIPER रोवर, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी का PROSPECT ड्रिलिंग पैकेज और जापान-भारत का LUPEX रोवर के भी चांद के साउथ पोल पर पहुंचने की उम्मीद है. यानी चांद पर पानी की तलाश की होड़ तेज होती जा रही है.
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