खबर

क्यों प्रशांत किशोर की जीत से ज्यादा भाजपा की हार के चर्चे, पटना से दिल्ली तक दिखेगा असर | how bjp lost is more in discussion than Prashant Kishore win in bankipur byelection



नई दिल्ली:

प्रशांत किशोर की बांकीपुर में जीत ने राजनीति में कौतूहल पैदा कर दिया है. आज सुबह तक जिस बांकीपुर विधानसभा सीट को भाजपा का गढ़ कहा जा रहा था, वहां से दोपहर तक प्रशांत किशोर विधायक चुन लिए गए. इस तरह बिहार की राजनीति ने एक तरफ नैरेटिव को बदला है तो वहीं समीकरणों में भी फेरबदल किया है. नैरेटिव इस लिहाज से कि यह सीट न सिर्फ भाजपा की गढ़ थी बल्कि पार्टी के मौजूदा अध्यक्ष नितिन नवीन के छोड़ने से खाली हुई थी. ऐसे में अध्यक्ष की सीट को ही न बचा पाने का जो नैरेटिव है, वह आने वाले समय में भाजपा को सदन से सड़क तक चुभेगा.

भाजपा बीते कई चुनावों से अपनी मशीनरी पर भरोसा करती रही है. उसकी यह रणनीति रही है कि मशीनरी को एक्टिव करके और चेहरों को आगे करके चुनाव लड़ा जाएगा. भले ही चुनाव में किसी को भी उम्मीदवार बना दिया जाए, सभी लोग उसका समर्थन करके एकजुट होकर जिताएंगे. हालांकि बांकीपुर और यहां तक कि दतिया में यह मशीनरी कमजोर होती दिखी है. बांकीपुर में नितिन नवीन खुद चुनाव में उतरे थे और कैंडिडेट भी उनका ही तय किया हुआ था. फिर भी हार मिली तो यह साफ है कि अब बड़े नेताओं के करिश्मे भर से जीतना मुश्किल है. 

पढ़ें: भाजपा को झटका, तेजस्वी को टेंशन; बांकीपुर में प्रशांत किशोर की जीत ने बदली बिहार की राजनीति

क्यों पीके के खिलाफ चुनाव लड़ना भाजपा के लिए हुआ थोड़ा मुश्किल

इसके अलावा बांकीपुर के नतीजे का असर गठबंधन सरकार पर भी पड़ेगा. भाजपा का सीएम राज्य में पहली बार बना है और जेडीयू अब जूनियर पार्टनर है. लेकिन इस नतीजे ने भाजपा के इकबाल को भी कमजोर किया है. वहीं नितिन नवीन को दिल्ली तक यह हार चुभेगी. यदि किसी राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट पर ही नतीजा विपरीत आए तो फिर यह रणनीति को लेकर सवाल उठने वाली बात है. माना जा रहा है कि बांकीपुर में सवर्णों का ही एक वर्ग प्रशांत किशोर के पक्ष में चला गया. पीके ऐसे नेता भी नहीं है, जिन पर जंगलराज का आरोप चस्पा किया जाए. 

यह भी पढ़ें: मोहन सरकार का स्ट्राइक रेट 50%, 4 उपचुनाव में 2 पर जीत और 2 पर हार के मायने क्या?

क्या सवर्णों का एक हिस्सा भाजपा से दूर गया है?

उनके खिलाफ मोटे तौर पर कोई भी आरोप नहीं चस्पा हो सकता क्योंकि वह पहली बार विधायक बने हैं. ऐसे में भाजपा के लिए उनके मुकाबले चुनाव लड़ना थोड़ा कठिन था. वहीं इसी बीच भरत तिवारी का एनकाउंटर, यूजीसी रूल्स का मामला और फिर जेन जी का आंदोलन जैसे वाकये हुए. माना जा रहा है कि इसके चलते भी भाजपा का कोर वोटर पहले की तरह उसके साथ मजबूती से डटा नहीं है. शायद इसका खामियाजा पार्टी को उठाना पड़ा. अब देखना होगा कि पार्टी का नेतृत्व कैसे काम करता है. 




Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button