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इतनी कमजोर होकर भी यूपी के पावर बैलेंस में क्यों अहम है हाथी की ‘चाल’? | Mayawati up election 2027 analysis bsp strength weakness



उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर बहुजन समाज पार्टी एक बार फिर 20 साल पुराने फॉर्मूले पर काम कर रही है. पार्टी चाहती है कि उसे ब्राह्मण समाज का एकमुश्त वोट फिर हासिल हो, इसके साथ उसे अपना परंपरागत दलित समाज का भी समर्थन मिल जाए. बसपा प्रमुख मायावती तो तमाम कार्यक्रमों के जरिए संदेश दे रही हैं कि बसपा सरकार के दौरान ही ब्राह्मणों और कमजोर तबके के आदमी को समान हिस्सेदारी मिली थी.

लेकिन इस पॉलिटिकल मैसेजिंग के बीच यह नहीं भूलना चाहिए कि यह कोई 20 साल पुराना उत्तर प्रदेश नहीं है और ना ही बसपा अब उतनी मजबूत रही है. 2007 में बसपा ने सरकार सिर्फ ब्रह्माण वोटों के दम पर नहीं बनाई थी बल्कि इसलिए भी बनाई थी क्योंकि तब बीजेपी यूपी की राजनीति में उतनी मजबूत नहीं थी. जनता के सामने दो ही विकल्प थे- सपा या बसपा. ऐसे में मुलायाम सिंह यादव के प्रति पनपे गुस्से का फायदा मायावती ने उठाया था और उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हो गया था.

मायावती का 20 साल पुराना फॉर्मूला हो रहा फेल?

लेकिन 20 साल बाद की स्थिति ऐसी है जहां पर बीजेपी काफी मजबूत हो चुकी है. ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में उसकी अच्छी उपस्थिति है. बड़ी बात यह है कि मायावती के कोट वोटबैंक में भी बीजेपी ने सेंधमारी की है. ऐसा देखा गया है कि मायावती का परंपरागत वोटबैंक 36 फीसदी के करीब बैठता है. यहां 13 फीसदी तो ब्राह्मण हैं और 23 फीसदी दलित. 2007 में जब मायावती ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी, तब उनकी पार्टी को 30.43 फीसदी वोट मिले थे.

अब यही परंपरागत वोटबैंक बिखर चुका है, पिछले तीन विधानसभा चुनावों ने भी इसी बात की तस्दीक की है. ऐसे में सवाल यह नहीं उठता की क्या हाथी एक बार फिर ऐसी चाल चलेगा कि वो यूपी की सत्ता पर काबिज हो जाए, बल्कि सवाल यह उठता है कि हाथी की चाल आखिर किस दल को सत्ता के करीब या सत्ता से दूर ले जा सकती है. जानकार भी मानते हैं आज की परिस्थिति में अपने दम पर सरकार बनाना बसपा के लिए मुश्किल हो सकता है, इसी वजह से बीजेपी और सपा इसी होड़ में लगी है कि कैसे इस वोटबैंक को पूरी तरह अपने पाले में खींचा जाए.

यूपी में बसपा का गिरता ग्राफ

उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों की बात करें तो दलितों का प्रभाव काफी ज्यादा रहता है, 84 सीटें तो उनके लिए आरक्षित हैं. इसके अलावा भी 150 के करीब सीटों पर दलितों की उपस्थिति निर्णायक साबित होती है. 2007 के विधानसभा चुनाव में 403 सीटों में से बसपा ने 206 सीटें हासिल की थी. उसका वोट शेयर 30.43 फीसदी रहा. लेकिन पांच साल बाद ही बसपा का वोट शेयर गिरकर 25.91 फीसदी पहुंच गया और सीटें रह गईं महज 80. 

2017 में तो उत्तर प्रदेश में बीजेपी की एकतरफा आंधी चली और बसपा का बुरा हाल हो गया. उस चुनाव में उसका वोट शेयर 22.72 फीसदी रहा और सीटें रह गईं 19. 2022 के विधानसभा चुनाव में मायावती को सबसे बड़ा झटका लगा जब उनका वोट शेयर 13.17 फीसदी पर सिमट गया. उस चुनाव में 403 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली बसपा सिर्फ एक पर जीत दर्ज कर पाई. बड़ी बात यह है कि 2027 के रण के लिए जिस ब्रह्माण समाज को अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश में मायावती लगी हैं, ऐसी ही रणनीति पर 2022 में भी काम किया गया था.

2022 में पूरे राज्य में प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन का आयोजन किया गया था. ब्राह्मणों को साधने के लिए मायावती ने 74 ब्राह्मण प्रत्याशियों को चुनावी मैदान में भी उतारा था. लेकिन वो रणनीति औंधे मुंह गिरी थी और बसपा सिर्फ एक सीट ही जीत पाई.

जाटव वोट का गणित- किसे फायदा?

यूपी का जाटव वोट आज भी काफी हद तक बसपा के साथ खड़ा है, लेकिन अब एक हिस्से में सेंधमारी हो चुकी है. 2012 में तो 85 फीसदी तक जाटव मायावती के साथ रहे, लेकिन 2022 आते-आते वो आंकड़ा 65 फीसदी रह गया. 2024 के लोकसभा चुनाव में तो सपा के पीडीए फॉर्मूले ने मायावती के तमाम समीकरणों को हिला दिया. तब सपा-कांग्रेस गठबंधन को 25 फीसदी के करीब जाट वोट हासिल हुआ और बसपा के पास 44 फीसदी के करीब रह गया.

जानकार मानते हैं कि जाटव वोट अगर ज्यादा शिफ्ट हुआ तो यूपी की राजनीत में बड़ा उलटफेर हो सकता है.  अगर सपा प्रमुख अखिलेश यादव को पीडीए के साथ 25-30 फीसदी जाटव वोट मिल जाए तो वे पूर्ण बहुमत के साथ सरकार भी बना सकते हैं. इसी तरह अगर बीजेपी गैर-जाटव दलित जैसे पासी, कोरी, धोबी वोट के साथ 25 से 30 फीसदी जाटव वोट हासिल कर ले तो वो भी ऐतिहासिक जनादेश प्राप्त कर सकती है. इसका सीधा मतलब है- मायावती सत्ता में वापसी करेंगी या नहीं, ये ज्यादा बड़ा सवाल नहीं है, असल सवाल ये है कि उनका कोर वोटर आखिर किसे सत्ता के ज्यादा नजदीक पहुंचा सकता है?




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