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आधुनिक हथियारों की रेस में भारत की कैसी तैयारी? CDS ने NDTV डिफेंस समिट में बताया | India how much prepared in race of modern weapons india chief of defence staff ns raja subramani explains in ndtv Summit


आधुनिक हथियारों की रेस में भारत की कैसी तैयारी? CDS ने NDTV डिफेंस समिट में बताया

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) एनएस राजा सुब्रमणि ने भारत की सैन्य क्षमता पर एनडीटीवी से विस्तार से बात की.

भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) एनएस राजा सुब्रमणि रविवार को एनडीटीवी डिफेंस समिट में पहुंचे. यहां उन्होंने भारत की सैन्य तैयारियों पर बात की. उन्होंने माना कि तकनीक हर हफ्ते बदल रही है और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने युद्ध के मैदान को बदलना शुरू कर दिया है. मगर उन्होंने भरोसा दिलाया कि भारतीय सैन्य बल ने इस क्षेत्र में भी काफी अच्छी प्रगति कर ली है.

एआई को लेकर भारत की सैन्य तैयारी

  1. भारत के शीर्ष सैन्य अधिकारी ने कहा कि वह AI को एक अवसर भी मानते हैं और एक चुनौती भी. NDTV के सीईओ और एडिटर-इन-चीफ राहुल कंवल, मैनेजिंग एडिटर शिव अरूर और सीनियर एग्जीक्यूटिव एडिटर आदित्य राज कौल से बात करते हुए जनरल सुब्रमणि ने कहा, “तीनों सेनाओं ने इस दिशा में काफी प्रगति की है. AI युद्ध के मैदान को हर तरह से बदल देगा, चाहे वह प्लानिंग हो, लॉजिस्टिक्स हो, निर्णय लेने में मदद हो या इंटेलिजेंस हो.  इसके लिए आपको कंप्यूट, डेटा, नेटवर्क और कुशल कर्मियों की आवश्यकता होती है. जहां तक ​​कंप्यूट की बात है, रक्षा बल राष्ट्रीय AI मिशन और MeitY (भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय) साथ मिलकर काम कर रहे हैं.”
  2. चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ ने कहा कि AI को पहले ही कुछ क्षेत्रों में लागू किया जा चुका है, विशेष रूप से ओपन-सोर्स इंटेलिजेंस और प्रेडिक्टिव इंटेलिजेंस के क्षेत्र में. उन्होंने कहा, “हम AI को शामिल करके अपने पुराने सिस्टम को स्मार्ट बनाने पर विचार कर रहे हैं और यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि हम जो नए सिस्टम खरीदें, उनमें यह सुविधा हो. AI को युद्ध के मैदान के अग्रिम मोर्चे पर भी काम करने में सक्षम होना चाहिए; केवल मुख्यालय में इसका होना काफी नहीं है. AI की सुविधा सैनिकों के पास होनी चाहिए. इसलिए मैं आपको विश्वास दिला सकता हूं कि सशस्त्र बल इस पर बहुत गंभीरता से विचार कर रहे हैं… हम इस पर निजी क्षेत्र की कंपनियों के साथ-साथ DRDO (रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन) के साथ भी काम कर रहे हैं.”
  3. एआई के खतरों से जुड़े सवालों पर सीडीएस ने कहा, “सबसे पहले, AI के इस्तेमाल को लेकर हमें यह बिल्कुल क्लियर होना होगा कि यह हमें विकल्प, काम करने के तरीके, प्रोडक्टिविटी और क्षमता तो देगा, लेकिन यह कमांडर की जगह फैसला नहीं लेगा. यह कमांडर को विकल्प देगा, और फैसला लेना कमांडर का काम होगा. आज कोई भी फोर्स या ऑर्गनाइडॉजेशन AI के बिना काम करने का जोखिम नहीं उठा सकती क्योंकि इसके बहुत सारे फायदे हैं. हालांकि, AI के हद से ज्यादा आगे बढ़ने, आपके काम में दखल देने, या हमारे साइबर नेटवर्क में घुसपैठ करने की चुनौती भी साफ तौर पर मौजूद है. इसके लिए, जब हम अपने AI सिस्टम का इस्तेमाल करेंगे, तो हम पक्का करेंगे कि जरूरी सुरक्षा उपाय मौजूद हों. हमें यह पक्का करना होगा कि उनमें कोई गड़बड़ी न हो. तीसरा, हमें अपने खुद के सॉवरेन AI सिस्टम विकसित करने होंगे. हालांकि, कुछ सिस्टम पहले से मौजूद हैं, लेकिन हम सेना में ऐसे छोटे लैंग्वेज मॉडल पर काम कर रहे हैं जो हमारी जरूरतों के हिसाब से सही हों.” जनरल ने कहा कि सेनाएं यह पक्का करने के लिए भी कदम उठा रही हैं कि वे साइबर मोर्चे पर मौजूद खतरों से प्रभावित न हों और अगर कोई हमला होता है, तो उसका पता लगाकर उसे नाकाम कर सकें.
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हथियार भारत की सेना को कैसे चाहिए

  1. लंबी दूरी के सटीक हमलों से युद्ध क्षेत्र के विस्तार पर प्रकाश डालते हुए, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल एनएस राजा सुब्रमणि ने कहा कि आधुनिक युद्धक्षेत्रों में उन्नत सेंसर और सुरक्षा बल दोनों की आवश्यकता हैं. जनरल सुब्रमणि ने कहा, “संघर्ष का क्षेत्र मोर्चे से लेकर पीछे तक और पूरी गहराई तक फैल गया है. कहीं भी कोई जगह सुरक्षित नहीं है. अगर लगातार निगरानी के कारण आप युद्धक्षेत्र में दिखाई देते हैं, तो आप निशाने पर आ जाएंगे, आप पर हमला होगा और आप मारे जाएंगे. इसलिए सुरक्षा बल, काउंटर-यूएएस और इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस सिस्टम अत्यंत महत्वपूर्ण हैं.”
  2. जनरल एनएस राजा सुब्रमणि ने कम लागत वाली ‘एट्रिशन वॉरफेयर’ (दुश्मन को धीरे-धीरे कमजोर करने वाली लड़ाई) का मुकाबला करने के लिए हाइब्रिड डिफेंस सिस्टम की जरूरत पर जोर दिया. चीफ ऑफ डिफेंस ने कहा, “युद्ध का अर्थशास्त्र बदल गया है क्योंकि सस्ती तकनीक अब गैर-सरकारी और छोटे समूहों तक भी पहुंच गई है. $30,000 के ड्रोन का मुकाबला $1 मिलियन की एयर डिफेंस मिसाइल से करना समझदारी नहीं है.” उन्होंने हाई-एंड प्लेटफॉर्म के साथ-साथ हार्ड-किल और सॉफ्ट-किल काउंटर-ड्रोन सिस्टम के मिले-जुले और कई स्तरों वाले सिस्टम की वकालत की.

सेना के थियेटराइजेशन का काम कहां तक पहुंचा

  1. सीडीएस ने सेना के थियेटराइजेशन पर भी बात की. उन्होंने बताया कि हम जब आज ‘जॉइंटनेस’ (मिलकर काम करने) की बात करते हैं, तो मैं इसे किसी पर थोपी गई चीज या सिर्फ़ प्रशासनिक जरूरत के तौर पर नहीं देखता. जॉइंटनेस ऑपरेशन के लिए जरूरी और रणनीतिक रूप से अहम है; मैंने पहले ही बताया है कि हमने अब तक क्या किया है और आगे क्या करने की जरूरत है. यह बात जमीनी स्तर पर सैनिक तक कैसे पहुंच रही है? हम जॉइंट स्ट्रक्चर, थिएटरलाइज़ेशन और इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड वगैरह पर काम कर रहे हैं, लेकिन युद्ध के मैदान में, कमांड और कोर के स्तर पर—जैसे नॉर्दर्न कमांड और वेस्टर्न कमांड में—आर्मी और एयर फ़ोर्स पहले से ही मिलकर काम कर रही हैं. वे इस बात पर तालमेल बिठा रही हैं कि ड्रोन का इस्तेमाल कैसे किया जाए, इलेक्ट्रॉनिक रूप से चुनौतीपूर्ण युद्ध के मैदान में कैसे लड़ा जाए, और दुश्मन के सिस्टम का मुकाबला करने या इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस सिस्टम के मामले में कैसे तालमेल बिठाया जाए.
  2. चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ ने आगे कहा, ‘मेरे से पहले डिफेंस सेक्रेटरी ने बताया कि हमने एयर फ़ोर्स और आर्मी के एयर डिफेंस सिस्टम को इंटीग्रेट कर लिया है, और ऐसा ही नेवी के मामले में भी किया गया है. इसलिए मुझे कोई शक नहीं है कि जॉइंटनेस और इंटीग्रेशन की यह बात सबसे निचले स्तर तक पहुंच चुकी है. लोग समझते हैं कि आज हममें से कोई भी अलग-अलग सर्विस के तौर पर या अलग-अलग प्लेटफॉर्म के तौर पर लड़ाई नहीं लड़ सकता. हमें अपनी सर्विस के अंदर और दूसरी सर्विस के साथ मिलकर, ‘सिस्टम ऑफ सिस्टम्स’ के तौर पर लड़ना होगा. जॉइंटनेस के मामले में यही स्थिति है. मैं आपको यकीन दिलाता हूं कि भारतीय सशस्त्र बल जॉइंट सोच रखते हैं, जॉइंट प्लानिंग करते हैं, लॉजिस्टिक्स के मामले में जॉइंट हैं और हम जॉइंट होकर ही लड़ेंगे.’
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डिफेंस सेक्टर के स्टार्टअप से क्या चाहती है सेना

  1. सीडीएस ने कहा कि हम भारतीय आर्म्ड फोर्सेज और डिफेंस सेक्टर के नए स्टार्टअप्स मिल-जुलकर काम कर रहे हैं. कई साल पहले, आर्म्ड फोर्सेज इंडस्ट्री से बात भी नहीं करती थीं, लेकिन अब हम इंडस्ट्री को पार्टनर मानते हैं, और मैंने पहले भी कहा है कि डिफेंस फोर्सेज के तौर पर हमारा काम टेक्नोलॉजिकल समाधान मांगना नहीं है. हमारा काम समस्या को बताना है, उन चीजों को बताना है, जो हम चाहते हैं, और इंडस्ट्री को उन चीजों के लिए टेक्नोलॉजिकल समाधान लाकर देना है. हमारी तरफ से हम इंडस्ट्री के साथ सहयोग कर रहे हैं, मिलकर काम कर रहे हैं, और मैं ज्यादा से ज्यादा लोगों से मिलता हूं, और मेरी टीम भी लोगों से मिलती है. हमने टेक्नोलॉजी के नजरिए से रोडमैप इंटरनेट पर डाला है. हमें पता है, और हम डिमांड सिग्नल और टेक्नोलॉजिकल सिग्नल भी देते हैं, जो हम भविष्य में देखना चाहते हैं. हम इंडस्ट्री और एकेडेमिया दोनों के साथ बहुत करीब से काम करते हैं. 
  2. चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ ने आगे कहा, ‘मैं चाहूंगा कि इंडस्ट्री जितनी जल्दी हो सके, प्रोटोटाइप से प्रोडक्ट की ओर बढ़े. हमारे साथ मिलकर काम करें और सुधार करें ताकि हम तेजी से और बड़े पैमाने पर चीजें लागू कर सकें. इंडस्ट्री से मेरी तीन मुख्य मांगें हैं – स्पीड, स्केल और वॉल्यूम. जहां तक ​​एकेडेमिया या रिसर्चर्स की बात है – और यह बात इंडस्ट्री और रिसर्चर्स दोनों के लिए है – तो मैं चाहूंगा कि आप प्रॉब्लम सॉल्वर्स बनें, न कि प्रॉब्लम क्रिएटर्स. सिर्फ़ प्रोडक्ट न दें, बल्कि हमारी समस्याओं का समाधान भी करें. हमारे साथ मिलकर काम करें, समस्याओं को सुलझाएं और नतीजों पर ध्यान दें. रिसर्च सिर्फ रिसर्च के लिए नहीं होनी चाहिए – हालांकि वह भी अच्छी बात है – लेकिन हमें ऐसी रिसर्च चाहिए जिसके नतीजे निकलें, और ऐसे नतीजे जो हमें चाहिए, जो तेजी से मिलें और जिन्हें बड़े पैमाने पर लागू किया जा सके. ‘

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