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UN सुरक्षा परिषद में भारत की पक्की जगह के लिए मोदी की BRICS में हुंकार, नेहरू के इनकार से रूस-चीन के इकरार तक | un security council india seatfrom nehru to modi hindi story brics summit 2026 turning point


कहते हैं समय का पहिया घूमता है. 12 सितंबर 2026 से फ्लैशबैक में चलिए और पहुंचिए साल 1945 में. दूसरा विश्वयुद्ध खत्म हो चुका है. हिटलर हार चुका है. अमेरिका-रूस-ब्रिटेन-फ्रांस विजेता बनकर उभरे हैं. मगर दुनिया युद्धों से तंग आ चुकी है. जीतने वाले भी मानते हैं कि इस विश्वयुद्ध से बहुत नुकसान हुआ है और अब दुनिया में शांति की जरूरत है. 24 अक्तूबर 1945 को इसी सोच के साथ संयुक्त राष्ट्र चार्टर लागू होने के साथ ही सुरक्षा परिषद का गठन हुआ.   

जब दो-दो चीन में उलझी दुनिया

इसकी पहली आधिकारिक बैठक 17 जनवरी 1946 को लंदन में आयोजित की गई थी. सुरक्षा परिषद के सदस्य बनाए गए अमेरिका, ब्रिटेन, सोवियत संघ, फ्रांस और चीन गणराज्य. उस समय शी जिनपिंग की पार्टी का चीन में शासन नहीं था. तब चीन का नाम होता था रिपब्लिक ऑफ चाइना. फिर 1949 में माओ के नेतृत्व में चीन में गृहयुद्ध हो गया और कम्युनिस्टों का शासन आ गया. उन्होंने फिर चीन का नाम रखा पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना. तब चीन की सत्ताधारी पार्टी और उसके समर्थक लोग चीन के ही एक द्वीप पर चले गए, जिसे ताइवान कहा जाता है. ये द्वीप भी 1945 तक जापान के कब्जे में था और दूसरे विश्वयुद्ध में हार के बाद चीन को मिला था. 1945 से 1971 तक ताइवान ही सुरक्षा परिषद में चीन के नाम से प्रतिनिधित्व करता रहा. मगर 25 अक्तूबर को फिर ताइवान को हटाकर चीन का नाम जोड़ा गया मतलब पुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना का.

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यही लाया भारत के लिए मौका

1949 से चीन की इसी ऊपापोह के कारण सुरक्षा परिषद में भारत के लिए मौका बना. इतिहास में दो प्रमुख अवसरों का उल्लेख मिलता है जब अनौपचारिक स्तर पर भारत को स्थायी सीट की पेशकश या चर्चा की बात सामने आई थी. पहला मौका मिला था 1950 में. तब चीन में माओ त्से-तुंग की कम्युनिस्ट क्रांति के बाद ताइवान (रिपब्लिक ऑफ चाइना) यूएन में बैठा था. तब अमेरिका की ओर से भारत को ताइवान की जगह भारत को यूएन सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट देने को लेकर अनौपचारिक चर्चा या संकेत दिया गया था. मगर भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इसे लेकर दिलचस्पी नहीं दिखाई. 

दूसरे देश ने भी दिया नेहरू को ऑफर

फिर 1955  में सोवियत संघ के तत्कालीन प्रीमियर निकोलाई बुल्गानिन ने भारत दौरे और पत्राचार में सुझाव दिया था कि सुरक्षा परिषद में भारत को स्थायी सदस्य बनाया जा सकता है मगर पंडित नेहरू ने इन अनौपचारिक प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया.नेहरू जी का मानना था कि मुख्य भूमि चीन (पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना) को बाहर रखकर भारत का उसकी जगह बैठना एशिया में स्थिरता के लिए ठीक नहीं होगा और इससे भारत-चीन के बीच गहरा तनाव पैदा होगा. दूसरा, भारत गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) की नीति पर चल रहा था. भारत को लगा कि अमेरिका या सोवियत संघ की इस चाल में फंसने से भारत शीत युद्ध के गुटबाजी संघर्ष का हिस्सा बन जाएगा.

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आखिर नेहरू क्यों नहीं माने 

नेहरू ने 1955 में संसद में इस पर स्पष्टीकरण भी दिया था. सितंबर 1955 में लोकसभा में बोलते हुए नेहरू ने स्पष्ट कहा था कि सुरक्षा परिषद की सीट के संबंध में कोई औपचारिक प्रस्ताव नहीं आया था, और अगर बात चीन की सीट की थी, तो वह सीट चीन (पीआरसी) का कानूनी और ऐतिहासिक हक था, जिसे भारत छीनना नहीं चाहता था. इसके बाद साल बीतते गए मगर भारत ने कभी सुरक्षा परिषद का सदस्य बनने में रुचि नहीं दिखाई. 1991 में शीत युद्ध की समाप्ति और भारत के आर्थिक उदारीकरण के बाद वैश्विक शक्ति संतुलन बदला. भारत ने आधिकारिक तौर पर 1994 में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के 49वें सत्र में सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए अपनी औपचारिक दावेदारी पेश की. उस समय पीवी नरसिम्हा राव भारत के प्रधानमंत्री थे.

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फिर कब से भारत ने शुरू किया प्रयास

फिर 2004 में G4 समूह का गठन हुआ. भारत ने ब्राजील, जर्मनी और जापान के साथ मिलकर G4 गुट बनाया. इस समूह का मुख्य उद्देश्य सुरक्षा परिषद में सुधार और आपस में स्थायी सदस्यता के लिए एक-दूसरे का समर्थन करना है. इसके बाद से भारत लगातार इंटर-गवर्नमेंटल नेगोशिएशंस प्रक्रिया के जरिए यूएनएससी सुधारों पर जोर दे रहा है. अमेरिका, रूस, ब्रिटेन और फ्रांस सार्वजनिक रूप से भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन कर चुके हैं, जबकि चीन विभिन्न शर्तों और प्रक्रियाओं की आड़ में इसे वीटो या बाधित करता आ रहा था. मगर आज ब्रिक्स समिट में चीन की मौजूदगी में ये घोषणा-पत्र में कहा गया कि भारत को सुरक्षा परिषद में महत्वपूर्ण भूमिका मिलनी चाहिए. 

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