

नई दिल्ली:
बॉलीवुड के पुराने गानों की खासियत होती है उनकी मिठास जो सालों बाद भी कम नहीं होती है. पुराने समय के कुछ गीत अपनी आवाज और धुन की वजह से हमेशा दिल में बसे रहते हैं. आज हम बात करेंगे ऐसे ही दो गानों की ‘चौदहवीं का चांद हो’ और ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए’. जिसमें से एक गाना साल 1960 की फिल्म ‘चौदहवीं का चांद’ का हिस्सा था, तो दूसरा 1971 की फिल्म ‘आनंद’ का है. इन दोनों गाने के मूड एक दूसरे से बिल्कुल अलग हैं, दोनों की कहानियां अलग हैं, लेकिन इनका संगीत इनको खास बनाता है. ‘चौदहवीं का चांद हो’ और कहीं दूर जब दिन ढल जाए’ एक ही धुन नें बने हुए गीत हैं.
मोहम्मद रफी की आवाज में अमर हुआ ‘चौदहवीं का चांद’
साल 1960 में आई फिल्म ‘चौदहवीं का चांद’ का टाइटल आज भी पुराने गाने पसंद करने वालों की प्लेलिस्ट में आज भी शामिल हैं. आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे लोकप्रिय रोमांटिक गीतों में गिना जाता है. इस गाने को मोहम्मद रफी ने अपनी आवाज से सजाया था. इसके बोल शकील बदायंनी ने लिखे थे और इसका संगीत दिया था रवि ने. फिल्म में गुरु दत्त और वहीदा रहमान लीड रोल में थे. इस गाने में प्रेमिका की खूबसूरती की तारीफ जिस अंदाज में की गई है, वह आज भी लोगों को आकर्षित करती है.
‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए’ में वही पहाड़ी रंग, लेकिन बिल्कुल अलग एहसास
अब बात करें साल 1971 में आई फिल्म ‘आनंद’ के गीत ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए’ की तो इसे मुकेश ने अपनी बेहद भावुक आवाज में गाया था. गीत योगेश ने लिखा और संगीत सलिल चौधरी ने दिया. इस गाने में चौदहवीं का चांद वाला रोमांस नहीं है, बल्कि अकेलापन और याद है. इस गाने के बोल, संगीत और गायन ऐसा है कि ये सीधे दिल तक पहुंच जाता है. बता दें कि ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए’ की धुन पूरी तरह नई नहीं थी. सलिल चौधरी ने इसे अपने पुराने बंगाली गीत ‘अमय प्रसना कोरे ध्रुवतारा’ से बनाया था.
एक ही राग मे सजे दो गानें, दो अलग रंग और दो महान आवाजें
अब आप सोचेंगे कि ये दोनों गाने तो एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं. लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि इन दोनों गाने में राग पहाड़ी की मिठास है . जो इन दोनों गानों को आपस में जोड़ती है. दोनों ही गानों को सबसे खूबसूरत बनाता है राग पहाड़ी, लोक-संगीत जैसी मिठास दोनों में अलग-अलग इमोशंस को पैदा करती है. जहां ‘चौदहवीं का चांद हो’ में प्रेम और खूबसूरती को दिखाता है तो वहीं ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए’ में तन्हाई और याद का दर्द झलकता है. एक तरफ मोहम्मद रफी की आवाज सुनने वाले को महबूब की तारीफ में डुबो देती है, दूसरी तरफ मुकेश की आवाज जिंदगी की उदासी को महसूस करा देती है. शायद इसी वजह से 60 और 70 दशक के गीत आज की पीढ़ी को भी उतने ही पसंद आते हैं.
इन दोनों ही गानों मे बेहद सरल धुन में राग पहाड़ी की मिठास को पिरोया गया है. यही वजह है कि जिन लोगों को शास्त्रीय संगीत के बारे में ज्यादा पता नहीं है वो भी इन गीतों से आसानी से कनेक्ट कर पाते हैं. अगर आपको लगता है कि शास्त्रीय संगीत के बारे में ज्यादा लोग नहीं जानते हैं या जो संगीत के विशेषज्ञ हैं उन्हे ही इस बारे में पता है तो आपको जानकर हैरानी होगी कि इन रागों का गानों से बहुत गहरा कनेक्शन होता है. कई गाने जिनको आप मजे सुनते हैं उनमें भी रागों का प्रभाव देखने को मिलता है. आइए जानते हैं बॉलीवुड के वो गाने जो राग पहाड़ी पर बनाए गए हैं.
1. लग जा गले – साल 1964 में आई फिल्म वो कौन थी का गाना लग जा लगे जो सालों बाद भी लोगों की जुबान पर बना हुआ है. लता मंगेशकर ने इस गाने को अपनी सुरमयी आवाज से सजाया था. इस गीत में भी राग पहाड़ी का असर सुनने को मिलता है.
2. जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा- साल 1963 में आई फिल्म ताजमहल का गाना जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा को मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर की जुगलबंदी ने इसी राग की मिठास लिए हुए गाया है.
3. चाहूंगा मै तुझे सांझ सवेरे- साल 1964 में आई फिल्म दोस्ती का फेमस गाना जिसे मोहम्मद रफी ने अपनी आवाज से सजाया. इस गीत में भी राग पहाड़ी का इस्तेमाल किया गया है.
क्या है राग पहाड़ी?
राग पहाड़ी क्या है इसके बारे में NDTV ने डॉ अंकुर मिश्रा से बात की जो बनारस घराना में एक सितारवादक हैं.
“राग पहाड़ी एक फोक म्यूजिक से लिया गया है, जो पहाड़ों के लोक संगीत से है. फिर प्राचीन काल ने विद्वानों ने इसको थोड़ा ऑर्गेनाइज कर के इसको भारतीय शास्त्रीय संगीत में जोड़ लिया. इस राग को बहुत ज्यादा क्लासिक्ल म्यूजिक परफॉर्मेंस के बेस पर नहीं देखते हैं. पहाड़ी राग में छोटी चीजें जैसे सेमी क्लासिकल म्यूजिक और धुन जो होती हैं उसमें इस राग का ज्यादा इस्तेमाल होता है.
ठुमरियों, भजन, सितार और बासुंरी पर इसमें धुन बजाते हैं. एक राग के तौर पर एक बिलावल ठाठ के अंदर आता है. इसमें शुद्ध स्वरों का प्रयोग होता है. लेकिन एक धुन के तौर पर इसको थोड़ा फ्री स्टाइल में कर के इसमें सभी संगीत के 12 स्वरों का इस्तेमाल करते हैं. पहाड़ी राग एक बहुत ही मधुर और टचिंग स्केल है जो दिल को छू जाता है. एक मेलोडियस राग है जो काफी फेमस है”.
ये Video भी देखें: Haiwaan Review: अक्षय कुमार और सैफ अली खान की जोड़ी का कमाल या निराशा?





