

BRICS दुनिया का सबसे ताकतवर ऊर्जा समूह बनने की पूरी क्षमता रखता है. दुनिया का कोई दूसरा समूह इसके आसपास भी नहीं आता. G20 भी ऊर्जा सुरक्षा पर काफी जोर देता है, लेकिन उसकी बनावट BRICS से बिल्कुल अलग है. BRICS के पास इस काम के लिए ज्यादा मजबूत ढांचा है. यहां तक कि उसका अपना बैंक भी है.
BRICS जिस एक क्षेत्र में सबसे अलग और बेहद ताकतवर नजर आता है, वह है ऊर्जा सुरक्षा. और यह ताकत इतनी बड़ी है कि BRICS सिर्फ अपने सदस्यों या भारत की ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा का सबसे भरोसेमंद गारंटर बनने की क्षमता रखता है.
अमेरिका के अलावा, जो दुनिया में तेल का सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता है, BRICS ही ऐसा समूह है जिसमें दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादकों, जैसे सऊदी अरब और रूस के साथ-साथ दुनिया के सबसे बड़े तेल और गैस आयातकों, जैसे चीन और भारत दोनों शामिल हैं.
इतना ही नहीं, प्राकृतिक गैस के भंडार के मामले में भी वह दुनिया में दूसरे नंबर पर है. प्राकृतिक गैस को बहुत से लोग हरित ईंधन भी मानते हैं. संयुक्त अरब अमीरात यानी UAE के पास करीब 113 अरब बैरल का तेल भंडार है और वह अपने तेल और गैस निर्यात के ढांचे को तेजी से बढ़ा रहा है.
भारत उसके लिए तेल और गैस के अहम बाजारों में से एक है. ब्राजील भी दुनिया का एक बड़ा तेल उत्पादक है. आज अगर आप सड़क पर किसी आम भारतीय से पूछें तो उसके लिए रूस का मतलब तेल निर्यात और भारत-चीन को तेल की सप्लाई से भी जुड़ा हुआ है. इसकी एक बड़ी वजह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से मॉस्को से तेल खरीदने को लेकर भारत पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों की लगातार तेज बयानबाजी भी है.
सऊदी अरब, रूस, ईरान, UAE और ब्राज़ील जैसे ऊर्जा-अधिशेष वाले देशों के लिए ऊर्जा सुरक्षा का मतलब है अपनी ऊर्जा की मांग को सुरक्षित रखना, क्योंकि तेल और गैस का निर्यात उनकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है. वहीं, चीन और भारत जैसे ऊर्जा की कमी वाले देशों के लिए ऊर्जा सुरक्षा का मतलब है तेल और गैस की सप्लाई को सुरक्षित रखना.
चीन और भारत दुनिया में तेल और गैस की सबसे ज्यादा भूख रखने वाली अर्थव्यवस्थाएं हैं. ये दोनों देश आज दुनिया में हाइड्रोकार्बन की मांग को आगे बढ़ाने वाले सबसे बड़े देशों में हैं. चीन दुनिया में तेल का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता और आयातक है, जबकि भारत तीसरे नंबर पर है.
भारत इस समय हर दिन करीब 52 लाख बैरल तेल आयात करता है. अनुमान है कि 2045 तक भारत को हर दिन करीब 80 लाख बैरल तेल आयात करना पड़ सकता है और यह भी संभव है कि यह स्थिति 2045 से पहले ही आ जाए. यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब भारत के नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में भी तेजी से विकास हो रहा है. चीन पहले ही हर दिन करीब 90 लाख बैरल तेल आयात करता है.
इसलिए ऊर्जा के मामले में BRICS के सदस्यों के बीच आपसी निर्भरता बिल्कुल साफ दिखाई देती है. एक तरफ ऐसे देश हैं जिनके पास ऊर्जा की भरपूर मात्रा है और दूसरी तरफ चीन और भारत जैसे देश हैं जिन्हें ऊर्जा की दरकार है.
लेकिन अभी यह रिश्ता ढीला, अनौपचारिक और बिना किसी पक्के ढांचे के है.
अब समय आ गया है कि BRICS के नेता इस रिश्ते को औपचारिक रूप दें और इसके लिए एक अलग अंतर-सरकारी मंच बनाएं. इससे एक-दूसरे के बीच तेल और गैस की खरीद-बिक्री आसान होगी. इसके साथ ही, देश अपनी-अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं में भी कारोबार कर सकेंगे. इससे दुनिया की मौजूदा व्यापार, वित्त और बैंकिंग व्यवस्था में जरूरी बदलाव लाने और उसे ज्यादा लोकतांत्रिक बनाने में भी मदद मिल सकती है.
भारत के लिए BRICS का मतलब अमेरिका या पश्चिमी देशों को चुनौती देना नहीं है. इसके उलट, 2047 तक विकसित भारत बनाने के लक्ष्य के लिए अमेरिका और पश्चिमी यूरोप भारत की अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों में बेहद अहम हैं. भारत अपनी राष्ट्रीय मुद्रा, यानी रुपये, की वैश्विक स्थिति और महत्व को मजबूत करना चाहता है, लेकिन वह किसी डी-डॉलराइजेशन अभियान का हिस्सा बने बिना ऐसा करना चाहता है.
इसीलिए QUAD भारत के लिए जितना अहम है, BRICS भी उतना ही अहम है. बल्कि अब समय आ गया है कि भारत यह भी सोचे कि QUAD के ऊर्जा के मामले में मजबूत देशों अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया और ऊर्जा की ज़रूरत वाले भारत और जापान के बीच ऊर्जा सुरक्षा की आपसी निर्भरता को कैसे औपचारिक बनाया जा सकता है.
भारत को दुनिया में अपना प्रभाव और अपनी अलग जगह खुद बनानी होगी. और इसमें ऊर्जा सुरक्षा की भूमिका सबसे अहम है. इसलिए भारत को BRICS, QUAD, G20 और ऐसे दूसरे सभी अंतरराष्ट्रीय समूहों की जरूरत है. लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा की जरूरतों के लिहाज से BRICS के पास सबसे ज़्यादा देने के लिए है.
यह एक पुरानी सच्चाई है कि जो दुनिया की तेल व्यवस्था को नियंत्रित करता है, उसके पास दुनिया को प्रभावित करने की सबसे बड़ी ताकत होती है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं. वह वेनेज़ुएला, वहां की शासन व्यवस्था की मदद करने के लिए नहीं गए थे. अब पूरी दुनिया जानती है कि उनकी दिलचस्पी वहां के तेल में थी.
वेनेज़ुएला के पास 303 अरब बैरल तेल का भंडार है, जो दुनिया में सबसे बड़ा है. ग्लोबल साउथ यानी विकासशील और उभरते देशों के बीच अब यह राय भी बढ़ रही है कि मौजूदा खाड़ी युद्ध के पीछे ईरान के विशाल तेल और गैस भंडार तक पहुंच सुरक्षित करने की कोशिश है. ग्रीनलैंड को लेकर पैदा हुआ तनाव भी ऐसा लगता है कि सिर्फ उस बर्फीले द्वीप पर नियंत्रण का मामला नहीं है, बल्कि वहां मौजूद तेल और गैस के भंडार भी इसकी एक बड़ी वजह हो सकते हैं.
हालांकि, यह सब कोई नई बात नहीं है. ब्रिटेन भी अपने साम्राज्य के दौर में कुछ ऐसा ही करता था. पूरा फारस की खाड़ी का इतिहास इसका गवाह है. दूसरे विश्व युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय तेल कारोबार में ब्रिटिश पाउंड की जगह अमेरिकी डॉलर ने ले ली. जाहिर है, अमेरिका नहीं चाहता कि उसकी मुद्रा की जगह कोई दूसरी मुद्रा या कई मुद्राओं का समूह ले ले.
इसलिए BRICS के नेताओं को अब देर नहीं करनी चाहिए. उन्हें एक ऐसा अलग मंच बनाना चाहिए जो आपस में एक-दूसरे की ऊर्जा सुरक्षा की जरूरतों का खयाल रख सके. यह सिर्फ BRICS देशों की अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए जरूरी नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया की आर्थिक सुरक्षा और खुशहाली के लिए भी अहम हो सकता है.
नरेंद्र तनेजा नई दिल्ली में रहने वाले जाने-माने वैश्विक ऊर्जा विशेषज्ञ हैं.





