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Success Story: मिड-डे मील वर्कर का बेटा बना लेफ्टिनेंट, बचपन में पिता की मौत, SSB में 8 बार फेल | Success Story lt hardeep singh gill motivational indian army officer


Success Story Surya Tiwari: इसे किसकी सक्‍सेस स्‍टोरी कहें? उस मां संतरो देवी की, जिन्होंने 20 साल पहले पति को खोने के बाद मजदूरी की, भूखे पेट रहकर बेटे को पढ़ाया और आज उसके कंधे पर लेफ्टिनेंट का स्टार सजा दिया? या फिर उस युवा हरदीप गिल की, जिसने बचपन में पिता का साया खोया, खेतों में पसीना बहाया, 8 बार रिजेक्शन का दंश झेला, लेकिन हार न मानकर आखिरकार भारतीय सेना में अफसर बनकर ही दम लिया? असल में, यह कहानी एक मां के त्याग और एक बेटे के कभी न टूटने वाले हौसले की महागाथा है.

मां-बेटे की यह जोड़ी हरियाणा के जींद जिले में नरवाना के अलीपुर गांव से है. हरदीप गिल ने 8 बार रिजेक्ट होने के बावजूद मैदान नहीं छोड़ा. और आखिरकार, उनकी 9वीं कोशिश ने लेफ्टिनेंट बनाकर इतिहास रच दिया.
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मां संतरो देवी का संघर्ष और अलीपुर का वो दौर

हरदीप का जीवन बचपन से ही बेहद कठिन परिस्थितियों में बीता. करीब 20 साल पहले उनके पिता का साया सिर से उठ गया था. उस वक्त हरदीप मात्र दो साल के थे और परिवार में तीन बड़ी बहनें भी थीं. पिता के जाने के बाद पूरे परिवार का बोझ मां संतरो देवी के कंधों पर आ गया. मां ने कभी हार नहीं मानी; उन्होंने गांव के सरकारी स्कूल में मामूली मानदेय पर ‘मिड-डे मील’ वर्कर के रूप में काम करना शुरू किया. स्कूल के काम के बाद वे दूसरों के खेतों में दिहाड़ी मजदूरी करतीं, ताकि बच्चों का पेट भर सकें और उन्हें पढ़ा सकें.

गांव के स्कूल से पढ़ाई और खुद भी खेतों में किया काम

हरदीप ने अपनी शुरुआती पढ़ाई गांव के ही स्कूल से पूरी की. आर्थिक तंगी के कारण नियमित कॉलेज जाने के बजाय उन्होंने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से दूरस्थ शिक्षा के जरिए बीए की डिग्री हासिल की. हरदीप ने भी अपनी मां के संघर्ष को करीब से देखा था. वे खुद भी उस दिन तक खेतों में मजदूरी और मेहनत का काम करते रहे, जिस दिन वे आखिरकार इंडियन मिलिट्री एकेडमी में शामिल होने के लिए रवाना नहीं हुए.

अग्निपथ योजना का झटका और 8 बार रिजेक्शन का दर्द

रक्षा सेवाओं की तैयारी के दौरान हरदीप को पहला बड़ा झटका तब लगा जब वे भारतीय वायु सेना में ‘एयरमैन’ के रूप में चुने गए थे. लेकिन ‘अग्निपथ योजना’ लागू होने के बाद वह भर्ती प्रक्रिया रद्द हो गई. किसी भी युवा के लिए यह मानसिक रूप से तोड़ने वाला पल था, लेकिन हरदीप ने हार मानने के बजाय और सेना में अधिकारी बनने का कठिन रास्ता चुना.

इसके बाद सर्विस सिलेक्शन बोर्ड के इंटरव्यू में उन्हें एक के बाद एक लगातार 8 बार रिजेक्शन का सामना करना पड़ा. आमतौर पर 8 असफलताएं किसी भी इंसान का मनोबल तोड़ देती हैं, लेकिन हरदीप ने हर रिजेक्शन को सुधार का मौका माना. वे हर बार अपनी गलतियों पर काम करते और दोगुनी तैयारी के साथ फिर सामने आ जाते.

हरदीप ने 9वीं बार SSB इंटरव्यू दिया और इस बार उन्होंने न सिर्फ इसे क्रैक किया, बल्कि CDS की ऑल इंडिया मेरिट लिस्ट में 54वीं रैंक भी हासिल की. IMA देहरादून से अपनी ट्रेनिंग पूरी करने के बाद, वे भारतीय सेना की 14वीं बटालियन, सिख लाइट इन्फैंट्री में लेफ्टिनेंट के रूप में कमिशंड हुए.

मेजर जनरल यश मोर का मार्गदर्शन

हरदीप की इस यात्रा में भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारी मेजर जनरल (डॉ) यश मोर (रिटायर्ड) का भी योगदान रहा, जिन्होंने इस प्रतिभावान युवा को मार्गदर्शन दिया. 14 द‍िसंबर 2025 में र‍िटायर्ड मेजर जनरल यश मोर ने सोशल मीड‍िया पर ल‍िखा क‍ि ”यह कहानी हिम्मत और पक्के इरादे की है. संतरो देवी की कहानी. उनके पति का निधन 20 साल पहले हो गया था, और वे अपने पीछे तीन बेटियां और 2 साल का हरदीप छोड़ गए थे. उन्होंने सरकारी स्कूल में बहुत कम वेतन पर ‘मिड-डे मील’ वर्कर के तौर पर काम किया. स्कूल के बाद, उन्होंने खेतों में मज़दूरी की और हरियाणा के जींद ज़िले के नरवाना के अलीपुर गांव में बहुत मुश्किल ज़िंदगी बिताई. आज लेफ्टिनेंट हरदीप गिल IMA से कमीशन प्राप्त कर रहे हैं. हरदीप ने गांव के स्कूल में पढ़ाई की और बाद में IGNOU से ग्रेजुएशन किया. IMA में शामिल होने से ठीक पहले के दिन तक उन्होंने खेतों में काम किया. इस युवा को गाइड करने में छोटी सी भूमिका निभाने की खुशी है. हमारी सेना की असली ताकत ग्रामीण युवा हैं, वे ही कल के लीडर बनेंगे. जय हिंद.

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