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अमेरिका में केस खारिज होने पर गौतम अदाणी- कानून पर भरोसा और बढ़ा, एक अध्याय खत्म हुआ, हमारी यात्रा लंबी | Gautam Adani on dismissal US Case said Faith in the law has strengthened further chapter has closed but our journey is long



अमेरिका में केस खारिज होने पर अदाणी ग्रुप के चेयरमैन, गौतम अदाणी ने अपनों की बात, अपनों के साथ की. इस कार्यक्रम में उन्होंने अपने लोगों से कहा, इस अच्छे समाचार ने निश्चित रूप से खुशी दी, लेकिन उससे भी अधिक उसने मुझे विनम्र बनाया. आप सब जानते हैं कि हमने शुरुआत से ही अपने ऊपर लगाए हुए आरोपों को स्पष्ट रूप से नकारा था, इसलिए आप शायद यह उम्मीद कर रहे होंगे कि मैं आज कहूंगा हमारा स्टैंड इंडिकेट हुआ, लेकिन नहीं मैं ऐसा नहीं कहूंगा. क्योंकि आज खुद को सही साबित करने से अधिक मेरे लिए उस पूरी यात्रा को विनम्र से याद करना महत्वपूर्ण है. एक ऐसी यात्रा जो कठिन थी, लेकिन जिसने मुझे बहुत कुछ सिखाया, बहुत कुछ समझाया. और सबसे बढ़ कर जीवन, लोगों और रिश्तों को एक नई दृष्टि से देखने का अवसर दिया. 

यह प्रोसेस लगभग दो साल तक चली. यात्रा कठिन भी था और पीड़ादायक भी थी. लेकिन उसने Rule of Law और न्याय व्यवस्था में मेरे विश्वास को और मजबूत किया. अपने सत्य पर विश्वास रखना जरूरी है. लेकिन अपने सत्य के लिए खड़ा भी होना पड़ता है और लड़ना भी पड़ता है. वह भी पूरी निडरता के साथ, और आज जब यह अध्याय समाप्त हो चुका है तो न्याय व्यवस्था में मेरा विश्वास पहले से और अधिक मजबूत हुआ है.

एक First Generation Entrepreneur के रूप में मैं यह भी कभी नहीं भूल सकता कि अदाणी की अपनी यात्रा भी रुल ऑफ लॉ से मिली उसी लेवल प्लेइंग फिल्ड और अवसरों की कहानी है. इस यात्रा ने मुझे अपने लोगों की शक्ति भी दिखाई, जब बाहर बहुत शोर था, तब हमारी Teams, Employees, Workers, Suppliers, Vender, Contractors और Partners चुपचाप अपना काम कर रहे थे. शायद इसलिए जिन वर्षों को हमारे लिए सबसे कठिन वर्ष कहा गया, वही हमारे ग्रुप के इतिहास के सबसे अच्छे वर्षों में रहा.

इसका क्रेडिट आप सभी को जाता है और इस यात्रा में इंसानियत हमारे विश्वास को और गहरा किया है. देश में जहां भी गया ऐसे लोग मिले, जिन्हें मैं जानता तक नहीं था. कोई हाथ पकड़कर कहता हम आपके साथ हैं, कोई कहता हम आपके लिए प्रार्थना कर रहे हैं. कई लोग बिना कुछ कहे केवल हाथ जोड़ लेते थे. उनका मुझसे कोई स्वार्थ नहीं था, केवल स्नेह था. उस स्नेह को मैं जीवन भर नहीं भूलूंगा.

मैं उन लोगों का भी आभारी हूं, जिन्होंने हमारी आलोचना की और कठिन प्रश्न पूछे. आलोचना को भी मैं हमेशा एक अवसर के रूप में देखता हूं. आलोचना का उद्देश्य है कुछ भी हो मेरे लिए वह अपने बेहतर देखने और खुद बेहतर बनाने का अवसर है.

मैं अंत में ईश्वर का आभार करता हूं, ईश्वर ने जीवन में मुझे मेरे अपेक्षा से भी बहुत अधिक ज्यादा दिया है. अच्छे समय भी दिए और कठिन परीक्षाएं भी. आज मैं यह नहीं पूछता कि यह परीक्षा क्यों आई. मैं इस बात के लिए आभारी हूं कि उसने मुझे कुछ और सीखने और कुछ और समझने और शायद कुछ और विनम्र बनने का अवसर दिया. आज जब मैं इस पूरे अध्याय को पीछे मुड़ कर देखता हूं तो मेरे मन में विनम्रता, आभार और इस यात्रा से मिली सीख है.

लेकिन साथियों यह रुकने का समय नहीं है. अपनी अचीवमेंट पर आराम करने का समय नहीं है. एक अध्याय समाप्त हुआ है. लेकिन हमारी यात्रा बहुत लंबी है, और हमारी जिम्मेदारी उससे भी बड़ी है, इसलिए आइये इस यात्रा की सीख के साथ और मेहनत करें और हर दिन बेहतर बने और मिलकर विकसीत भारत के सपने को साकार करें.

अंत में आपके विश्वास के लिए, आपके साथ के लिए, आपके स्नेह के लिए आप सभी का दिल से धन्यवाद करता हूं. जय हिन्द, जय भारत.
 




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