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PCPNDT एक्ट से जुड़े अपराधों में पुलिस नहीं दर्ज कर सकती FIR, जांच में भी दायरा: सुप्रीम कोर्ट | Police cannot register FIR offenses under PCPNDT Act Supreme Court



नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को फैसला सुनाया कि पुलिस आम तौर पर ‘प्री-कन्सेप्शन एंड प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्नीक्स (प्रोहिबिशन ऑफ सेक्स सिलेक्शन) एक्ट, 1994’ (PCPNDT एक्ट) के तहत भ्रूण के लिंग का पता लगाने से जुड़े अपराधों की जांच और एफआईआर नहीं कर सकती. कोर्ट ने कहा कि इस कानून के तहत तय किए गए अधिकारियों को ही ऐसे मामलों में मुख्य भूमिका निभानी चाहिए. जस्टिस संजय करोल, जस्टिस एन.के. सिंह और ए.जी. जस्टिस मसीह की बेंच ने कहा कि इस कानून के तहत पुलिस जांचकर्ता की भूमिका में नहीं है. हालांकि, उपयुक्त प्राधिकारी की जरूरत होने पर पुलिस सीमित और सहायक भूमिका निभा सकती है.

कोर्ट ने कहा कि इस अधिनियम के उद्देश्यों के तहत पुलिस जांचकर्ता नहीं है. जहां तक मुमकिन हो पुलिस की सहायता लेने से बचना चाहिए. अधिनियम के प्रावधानों के मुताबिक, उपयुक्त प्राधिकारी की जरूरत के मुताबिक पुलिस सिर्फ सहायक भूमिका निभा सकती है.

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले से सहमति जताई, जिसमें कहा गया था कि PCPNDT एक्ट के उल्लंघन के मामलों में पुलिस न तो जांच कर सकती है और न ही FIR दर्ज कर सकती है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि PCPNDT एक्ट से जुड़े मामले टेक्निकल नेचर के होते हैं. इनमें चिकित्सकीय जानकारी और विशेष संवेदनशीलता की जरूरत हो सकती है. इसलिए कानून के तहत पुलिस को प्राथमिक जांच एजेंसी नहीं बनाया गया है.

कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर पुलिस FIR दर्ज कर लेती है, तो PCPNDT एक्ट में निर्धारित प्रक्रिया के मुताबिक, उस FIR को उसके तार्किक निष्कर्ष तक ले जाना मुमकिन नहीं है. हालांकि, कोर्ट ने कहा कि यह प्रतिबंध सिर्फ PCPNDT एक्ट के अपराधों तक सीमित है. अगर इसी मामले में सामान्य आपराधिक कानून के तहत कोई अलग अपराध सामने आता है, तो पुलिस को उस स्वतंत्र अपराध की जांच और अभियोजन करने की शक्ति पर इसका असर नहीं पड़ेगा.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि PCPNDT एक्ट की धारा 17(4) के तहत उपयुक्त प्राधिकरण को अधिनियम के अपराधों के संबंध में शिकायत दर्ज कराने और उनकी जांच करने की जिम्मेदारी दी गई है. अधिनियम से जुड़े नियमों में भी जहां तक मुमकिन हो, पुलिस की कार्रवाई से बचने की बात कही गई है.  इसलिए पुलिस को मुख्य जांच एजेंसी नहीं माना जा सकता और वह सिर्फ उपयुक्त प्राधिकरण की जरूरत के मुताबिक सहायक भूमिका निभा सकती है.

कोर्ट ने PCPNDT एक्ट की धारा 28 का भी जिक्र किया. इसके तहत मजिस्ट्रेट किसी अपराध का संज्ञान तब तक नहीं ले सकता, जब तक उचित प्राधिकरण या कानून में अधिकृत किसी शख्स की ओर से शिकायत न की जाए.

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किस मामले में कोर्ट ने दिया फैसला?

मामला उत्तर प्रदेश के एक डॉक्टर से जुड़ा था, जिसके खिलाफ 2017 में पुलिस ने PCPNDT एक्ट के तहत FIR दर्ज की थी. डॉक्टर पर आरोप था कि वह अवैध रूप से भ्रूण का लिंग पता कराकर दंपतियों को कन्या भ्रूण को जन्म लेने से रोकने में मदद कर रहा था.

डॉक्टर ने हाईकोर्ट में मामला रद्द करने की मांग करते हुए दलील दी थी कि PCPNDT एक्ट के तहत FIR दर्ज नहीं की जा सकती, क्योंकि धारा 28 के तहत शिकायत दर्ज कराने का अधिकार उचित प्राधिकरण या अधिकृत व्यक्ति को है. उसका कहना था कि उसके मामले में FIR तहसीलदार की ओर से दर्ज की गई थी, जिसे उचित प्राधिकरण नहीं माना जा सकता.

उत्तर प्रदेश सरकार ने इसका विरोध करते हुए कहा था कि PCPNDT एक्ट में पुलिस द्वारा FIR दर्ज करने और जांच करने पर साफ तौर से कोई रोक नहीं है.

साल 2024 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस द्वारा शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी थी. हाईकोर्ट ने कहा कि PCPNDT एक्ट एक स्पेशल कानून है और इसमें जांच, तलाशी, जब्ती तथा शिकायत दर्ज करने की पूरी व्यवस्था मौजूद है, जिसे उचित प्राधिकरण द्वारा ही संचालित किया जाना है.

अब सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस द्वारा PCPNDT एक्ट के अपराधों की जांच नहीं किए जाने के हाईकोर्ट के निष्कर्ष को बरकरार रखा है. हालांकि, कुछ अन्य पहलुओं पर नए सिरे से फैसले के लिए मामले को हाईकोर्ट वापस भेज दिया गया है.

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