

श्रीकृष्ण का स्वरूप देखते ही मुकुट में मोरपंख और हाथों में बांसुरी की छवि मन में उभरती है. जन्माष्टमी के मौके पर कान्हा की इस मुरली को लेकर भक्तों के मन में कई सवाल रहते हैं. आखिर बांसुरी कृष्ण के जीवन और उनकी लीलाओं में इतनी खास क्यों मानी जाती है. आइए, आचार्य मदन मोहन से जानते हैं इसके आध्यात्मिक महत्व के बारे में.
ब्रह्मांडीय ध्वनि का प्रतीक है मुरली
आचार्य मदन मोहन ने बताया कि कृष्ण की बांसुरी को केवल संगीत का वाद्य यंत्र नहीं माना जाता, बल्कि यह ब्रह्मांडीय ध्वनि और आदि कंपन का प्रतीक है. बांसुरी से निकलने वाली मधुर धुन सृष्टि में मौजूद सामंजस्य की ओर संकेत करती है. आध्यात्मिक परंपरा में इसे ‘अनहद नाद’ से भी जोड़ा जाता है.
ईश्वर से जुड़ने का देती है संदेश
कहा जाता है कि कृष्ण की मुरली की धुन सुनकर गोपियां उनकी ओर खिंची चली आती थीं. आचार्य ने बताया कि इसका आध्यात्मिक अर्थ यह है कि ईश्वर की पुकार आत्मा को अपनी ओर आकर्षित करती है. बांसुरी की धुन मन को भीतर की शांति और दिव्यता का अनुभव करााने का संदेश देती है.
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प्रेम और भक्ति का प्रतीक है बांसुरी
उन्होंने आगे बताया कि श्रीकृष्ण की बांसुरी को प्रेम और भक्ति जगाने वाला प्रतीक भी माना जाता है. उनकी मुरली की धुन इंसानों के साथ पशु-पक्षियों को भी आकर्षित करने वाली बताई गई है. यही वजह है कि कृष्ण की बांसुरी को ईश्वरीय प्रेम और आकर्षण से जोड़कर देखाा जाता है.
समर्पण और अनासक्ति की सीख
आचार्य मदन मोहन ने बताया कि बांसुरी अपने भीतर कुछ नहीं रखती और जब कृष्ण उसे बजाते हैं तो उसमें से मधुर स्वर निकलता है. इसी तरह मनुष्य को भी अहंकार और अपनी इच्छाओं को छोड़कर ईश्वर के प्रति समर्पित होने की प्रेरणाा मिलती है. इसलिए कृष्ण की बांसुरी केवल संगीत नहीं, बल्कि भक्ति, प्रेम, समर्पण और आध्यात्मिक जागृति काा प्रतीक मानी जाती है.





