
Chaturmas 2026: देवशयनी एकादशी के साथ 25 जुलाई 2026 से चातुर्मास की शुरुआत होने जा रही है. इस बार चातुर्मास पूरे 120 दिनों तक रहेगा और 21 नवंबर 2026 को देवउठनी एकादशी के दिन समाप्त होगा. हिंदू धर्म में यह अवधि आध्यात्मिक साधना, पूजा-पाठ, संयम और आत्मचिंतन का समय मानी जाती है.
मान्यता है कि देवशयनी एकादशी पर भगवान विष्णु चार माह के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं. इसी कारण विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, नामकरण और अन्य मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाता है. आइए जानते हैं चातुर्मास 2026 का धार्मिक महत्व, शुभ तिथियां, नियम और इस दौरान क्या करना चाहिए.
चातुर्मास 2026 तिथि: कब से कब तक रहेगा चातुर्मास?
ज्योतिषाचार्या एवं टैरो कार्ड रीडर नीतिका शर्मा के अनुसार, इस वर्ष देवशयनी एकादशी 25 जुलाई 2026 (शनिवार) को मनाई जाएगी. इसी दिन से चातुर्मास का आरंभ होगा और 21 नवंबर 2026 को देवउठनी एकादशी के साथ इसका समापन होगा. इस बार चातुर्मास की अवधि 120 दिनों की रहेगी.
देवशयनी एकादशी तिथि:
एकादशी तिथि प्रारंभ: 24 जुलाई 2026, सुबह 9:12 बजे
एकादशी तिथि समाप्त: 25 जुलाई 2026, सुबह 11:34 बजे
उदया तिथि के अनुसार व्रत: 25 जुलाई 2026
देवशयनी एकादशी से क्यों शुरू होता है चातुर्मास?
श्री लक्ष्मीनारायण एस्ट्रो सॉल्यूशन अजमेर की निदेशिका ज्योतिषाचार्या एवं टैरो कार्ड रीडर नीतिका शर्मा के अनुसार, देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु माता लक्ष्मी के साथ क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं. उनके विश्राम काल के दौरान सृष्टि के संचालन की जिम्मेदारी भगवान शिव संभालते हैं. इसलिए इन चार महीनों को विशेष तप, भक्ति और आत्मसंयम का काल माना गया है.
पौराणिक कथाओं के अनुसार, राजा बलि के वरदान के कारण भगवान विष्णु इस अवधि में पाताल लोक में उनके निवास स्थान पर विराजमान रहते हैं. इसी वजह से चातुर्मास को देवों के विश्राम का समय भी कहा जाता है.
चातुर्मास में विवाह और शुभ कार्य क्यों नहीं होते?
हिंदू परंपरा में किसी भी मांगलिक कार्य से पहले देवी-देवताओं का आह्वान किया जाता है. लेकिन चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं, इसलिए विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, जनेऊ, नामकरण और अन्य शुभ संस्कारों को टालने की परंपरा है. धार्मिक मान्यता है कि देवउठनी एकादशी के बाद ही दोबारा मांगलिक कार्य शुरू किए जाते हैं.
चातुर्मास के चार महीने और उनके प्रमुख पर्व:
चातुर्मास केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और त्योहारों के लिहाज से भी बेहद खास होता है.
सावन: भगवान शिव और विष्णु की आराधना का महीना.
भाद्रपद: श्रीकृष्ण जन्माष्टमी और गणेश चतुर्थी जैसे प्रमुख पर्व.
अश्विन: पितृ पक्ष, शारदीय नवरात्रि और विजयादशमी.
कार्तिक: दीपावली, देवोत्थान एकादशी और तुलसी विवाह.
इन्हीं महीनों में रक्षाबंधन, जन्माष्टमी, दशहरा और दीपावली जैसे बड़े त्योहार आने से सामाजिक और आर्थिक गतिविधियां भी तेज हो जाती हैं.
एकादशी पर चावल क्यों नहीं खाया जाता?
श्री लक्ष्मीनारायण एस्ट्रो सॉल्यूशन अजमेर की निदेशिका ज्योतिषाचार्या एवं टैरो कार्ड रीडर नीतिका शर्मा के अनुसार, महर्षि मेधा का अंश पृथ्वी में समाकर चावल और जौ के रूप में प्रकट हुआ था. इसलिए एकादशी के दिन इन्हें जीव स्वरूप मानकर ग्रहण नहीं किया जाता.
ज्योतिषीय दृष्टि से भी चावल में जल तत्व अधिक माना गया है, जिस पर चंद्रमा का प्रभाव रहता है. एकादशी पर चावल खाने से मन अधिक चंचल हो सकता है, जिससे व्रत और साधना में एकाग्रता प्रभावित होती है.
देवशयनी एकादशी व्रत का महत्व:
पद्म पुराण के अनुसार, जो श्रद्धालु देवशयनी एकादशी का व्रत श्रद्धा और नियमपूर्वक करते हैं, उन्हें भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है. इस दिन तिल, सोना, चांदी, हल्दी, गोपी चंदन और अन्न का दान अत्यंत पुण्यदायी माना गया है. वहीं द्वादशी तिथि पर व्रत का पारण कर जरूरतमंदों और ब्राह्मणों को भोजन कराने का भी विशेष महत्व बताया गया है.
चातुर्मास में किन नियमों का पालन करना चाहिए?
चातुर्मास आत्मअनुशासन और सात्विक जीवनशैली अपनाने का अवसर माना जाता है. इस दौरान इन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए—
- प्रतिदिन सुबह जल्दी उठकर स्नान, योग और ध्यान करें.
- सात्विक एवं सुपाच्य भोजन करें, तामसिक भोजन से बचें.
- रामायण, श्रीमद्भगवद्गीता और भागवत पुराण का नियमित पाठ करें.
- भगवान शिव और भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करें.
- जरूरतमंदों की सेवा और दान-पुण्य करें.
- बारिश के मौसम में पाचन शक्ति कमजोर होने के कारण हल्का और स्वच्छ भोजन लें.
- दिन में अधिक सोने और अनियमित दिनचर्या से बचें.
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